मंगलवार 13 अक्टूबर 2026 - 19:47
बहरैन की 70 साल की कहानी: ब्रिटिश उपनिवेशवाद से लेकर उलमा के ख़िलाफ़ मुक़दमों तक

बहरैन के लेखक और राजनीतिक शोधकर्ता अब्बास अल-मुरशिद ने कहा है कि 1956 में राष्ट्रीय आंदोलन के नेताओं की गिरफ़्तारी और निर्वासन तथा आज बहरीन में कुछ उलमा के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे मुक़दमों के बीच ऐतिहासिक समानताएँ दिखाई देती हैं। उनके अनुसार, दोनों दौर की घटनाएँ न्यायपालिका की स्वतंत्रता और राजनीतिक फ़ैसलों के प्रभाव को लेकर अहम सवाल उठाती हैं।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अब्बास अल-मुरशिद ने मिरात अल-बहरैन में प्रकाशित अपने लेख में लिखा कि नवंबर 1956 में ब्रिटिश पुलिस ने बहरैन की राष्ट्रीय एकता समिति के नेताओं को गिरफ़्तार कर लिया था। ये नेता ब्रिटिश प्रभाव को समाप्त करने और शासन व्यवस्था में सुधार की माँग कर रहे थे। उन पर सरकार के ख़िलाफ़ साज़िश करने, अशांति फैलाने और देश की सुरक्षा को ख़तरे में डालने के आरोप लगाए गए थे।

अब्बास अल-मुरशिद के अनुसार, ब्रिटिश दस्तावेज़ों से पता चलता है कि इन नेताओं को निर्वासित करने की तैयारियाँ न्यायिक कार्यवाही पूरी होने से पहले ही शुरू हो गई थीं। 22 और 23 दिसंबर 1956 को विशेष अदालत में मुक़मे की सुनवाई हुई, जबकि 28 दिसंबर को अब्दुर्रहमान अल-बाकर, अब्दुल अज़ीज़ अश-शमलान और अब्दुल अली अल-अलियावात को सेंट हेलेना द्वीप पर निर्वासित कर दिया गया।

उन्होंने कहा कि मुक़मे की सुनवाई से पहले ही निर्वासन की व्यवस्था शुरू कर दिए जाने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता को लेकर सवाल उठते हैं।

राष्ट्रीय आंदोलन में मराजे की भूमिका

अब्बास अल-मुरशिद ने राष्ट्रीय एकता समिति के नेता सय्यद अली कमालुद्दीन का उल्लेख करते हुए कहा कि वे राष्ट्रीय आंदोलन और नजफ़ अशरफ़ के मराजे के बीच संपर्क का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम थे। ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और पत्रों के अनुसार, वे राष्ट्रीय एवं राजनीतिक गतिविधियों के संबंध में शेख अली काशेफ़ुल ग़ेता से मार्गदर्शन प्राप्त करते थे।

हालाँकि, सय्यद अली कमालुद्दीन उन नेताओं में शामिल नहीं थे, जिन पर विशेष अदालत में मुक़दमा चलाया गया था, लेकिन ब्रिटिश सलाहकार चार्ल्स बेलग्रेव की 16 जनवरी 1957 की रिपोर्ट के अनुसार, उन्हें बहरैन छोड़कर इराक़ जाने के लिए कहा गया था।

वर्तमान परिस्थितियों से समानता

अब्बास अल-मुरशिद ने अक्टूबर 2026 में बहरीन के कुछ उलमा, फ़ुक़हा और शिक्षकों के ख़िलाफ़ चलाए जा रहे मुक़दमों का उल्लेख करते हुए कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में भी न्यायिक कार्यवाही और आरोपियों के बचाव के अधिकारों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने शेख मुहम्मद सनक़ूर, शेख महमूद अल-आली और शेख अली अस-सद्दादी का उल्लेख करते हुए कहा कि इन व्यक्तियों का संबंध धार्मिक शिक्षा, नैतिक प्रशिक्षण और सामाजिक सुधार से है।

उनके अनुसार, अतीत में राष्ट्रीय आंदोलन के नेता राजनीतिक सुधारों, जनभागीदारी बढ़ाने और ब्रिटिश प्रभाव समाप्त करने की माँग कर रहे थे, जबकि आज कुछ उलमा धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों की रक्षा के लिए सक्रिय हैं।

अल-मुरशिद ने दोनों दौर की बाहरैनी राजनीतिक परिस्थितियों की तुलना करते हुए कहा कि अतीत में बहरीन पर ब्रिटिश प्रभाव प्रमुख था, जबकि आज इज़राइल के साथ संबंध सामान्य बनाने और क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधनों से जुड़े मुद्दे महत्त्वपूर्ण हैं।

उन्होंने दावा किया कि कुछ हिरासत में लिए गए उलमा इज़राइल के साथ संबंध सामान्य बनाने और बहरीन को ईरान के ख़िलाफ़ क्षेत्रीय युद्ध में शामिल करने के विरोधी हैं। उनके विचार में, इन रुख़ों के कारण की जा रही कार्रवाइयों के पीछे के उद्देश्यों की जाँच करना ज़रूरी है।

अब्बास अल-मुरशिद ने सवाल उठाया कि क्या उलमा के ख़िलाफ़ लगाए गए सुरक्षा संबंधी आरोप ठोस कानूनी आधार पर टिके हैं या धार्मिक एवं राष्ट्रीय मतभेदों को सुरक्षा का मुद्दा बनाया जा रहा है? उन्होंने कहा कि उनके विचार में, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसे राजनीतिक दबाव से सुरक्षित रखने का सवाल आज भी बहरीन में महत्त्वपूर्ण है।

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