ईरान की धरती पर लगभग 48 वर्ष पहले तानाशाही व्यवस्था के अंत के बाद इस्लामी क्रांति सफल हुई थी। उस समय से लेकर आज तक अमेरिका लगातार ईरान के पीछे पड़ा हुआ है और उसकी स्थिरता, अस्तित्व तथा विकास के रास्ते में तरह-तरह की अनुचित और अमानवीय बाधाएं खड़ी करता रहा है।
भारत में मस्जिदों को ध्वस्त करने या अतिक्रमण बताकर हटाने की मुहिम तेज होती जा रही है। देश के विभिन्न हिस्सों से मस्जिदों को गिराए जाने और उन्हें अतिक्रमण घोषित किए जाने की खबरें लगातार आती रहती हैं। अल्पसंख्यकों पर अत्याचार और संवैधानिक मूल्यों का उल्लंघन भी अब कोई नई बात नहीं रह गई है। यदि न्यायालय ही संविधान की रक्षा करने में असहाय दिखाई देने लगें, तो हालात की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है।
सरकार के ख़िलाफ़ पहले भी आंदोलन हुए हैं, लेकिन या तो उन पर ध्यान नहीं दिया गया या उन्हें बदनाम करके ख़त्म कर दिया गया। किसान आंदोलन एक साल से अधिक समय तक चला, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसान नेताओं से मुलाक़ात तक नहीं की।
नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के अवसर पर ईरान के राष्ट्रपति डॉ. मसूद पेज़ेश्कियान की भारत यात्रा एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक घटना है। इस यात्रा को केवल एक औपचारिक मुलाकात या अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भागीदारी तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। इसके पीछे ईरान और भारत के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक संबंधों की लंबी परंपरा भी है और बदलती हुई वैश्विक राजनीति की नई आवश्यकताएँ भी।
अगर आज हुर्मुज़ स्ट्रेट और बाब अल-मंदब की बात की जाए, तो क्षेत्रीय शक्ति के समीकरण में दोनों की निर्णायक भूमिका है। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में ईरान के पास दबाव बनाने का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साधन है, जबकि अंसारुल्लाह आंदोलन भी बाब अल-मंदब जलडमरूमध्य में ऐसी स्थिति तक पहुंच चुका है कि इस जलमार्ग के यमनी हिस्से पर उसका प्रभावी नियंत्रण है।