ताजा समाचार
अधिक देखी गई ख़बरें
गैलरी
لیستی صفحه سرویس هندی
-
बेअसत बाल शिविर में ईद-ए-सईद ग़दीर के अवसर पर समारोह का आयोजन
बेअसत बाल शिविर में ईद-ए-सईद ग़दीर के शुभ और आनंदमय अवसर पर एक सुंदर एवं उद्देश्यपूर्ण समारोह आयोजित किया गया।
-
जिहाद-ए-तबईन में महिला छात्राओं की भूमिका रणनीतिक और अत्यंत प्रभावशाली है
मदरसा-ए-इल्मिया-ए-तखस्सुसी ज़हरा (स) सारी की प्रिंसिपल ने कहा: महिला छात्राओं की भूमिका "जिहाद-ए-तबईन" में रणनीतिक और अत्यंत प्रभावशाली है और यह सामाजिक सामंजस्य को मजबूत करने, नरम जंग (सॉफ्ट वॉर) का मुकाबला करने और सांस्कृतिक एवं क्रांतिकारी संदेशों के प्रसारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
-
पश्चिमी सभ्यता, आधुनिकतावाद और नई जाहिलियत है / शिक्षकों का कर्तव्य नई इस्लामी सभ्यता…
मस्जिद-ए-जमकरान के मुतावल्ली हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन सय्यद अली अकबर अजाक़ नेजाद ने एक समारोह में कहा कि आज पश्चिम में कुछ ऐसे लोग हैं कि यदि उनके सामने इस्लाम की वास्तविकता को प्रस्तुत किया जाए तो वे उसे स्वीकार कर लेंगे।
-
दुनिया में न्याय और शांति के लिए धार्मिक नेताओं की महत्वपूर्ण भूमिका, भाईचारे और…
अंतर्राष्ट्रीय अकादमिक बैठक में वक्ताओं ने कहा है कि दुनिया में स्थायी शांति और न्याय की स्थापना के लिए धार्मिक नेताओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है, और इस उद्देश्य के लिए मानवीय भाईचारे, साझा मूल्यों और सामूहिक जिम्मेदारी को बढ़ावा देने पर गंभीरता से ध्यान देना आवश्यक है।
-
मौजूदा "हाइब्रिड युद्ध" में महिलाओं का समाज में उपस्थित होना एक धार्मिक कर्तव्य है
जामेअतुज़ ज़हरा (स) की सांस्कृतिक एवं प्रचार मामलों की प्रमुख ने मौजूदा संवेदनशील स्थिति में शिक्षकों के कर्तव्यों को स्पष्ट करते हुए शहीद मुताहरी (र) के विचारों पर पुनर्विचार करने, व्यावसायिक नैतिकता के पालन और आज के सामाजिक एवं सांस्कृतिक बदलावों में महिलाओं की प्रभावी भूमिका पर जोर दिया।
-
मअनवीयत और अक़्लानियत को पुनर्जीवित करने में मस्जिदों की भूमिका किसी पर छिपी नहीं…
जामेअतुज़्ज़हरा (स) की इस्लामी शिक्षा एवं प्रशिक्षण की वैज्ञानिक समिति की सचिव ने एक नोट में मअनवीयत और अक़्लानियत को पुनर्जीवित करने में मस्जिदों की अद्वितीय भूमिका पर जोर दिया है।
-
शहीद आयतुल्लाह ख़ामेनई के वक्तव्यों के प्रकाश में इस्लामी समाज में पुत्रियो का स्थान
इस्लामी समाज में लड़कियों की भूमिका, जिम्मेदारियों और स्थान के संदर्भ में इंक़िलाब के शहीद नेता के वक्तव्यों को फिर से सामने लाया गया है, जिनमें इस बात पर जोर दिया गया है कि लड़कियाँ न केवल समाज का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, बल्कि वे इसके निर्माण और विकास में मौलिक भूमिका निभा सकती हैं, बशर्ते वे अपनी इस्लामी पहचान, इफ्फत व हया और नैतिक मूल्यों को बनाए रखें।
-
युद्ध की स्थिति में जनता को जागरूक करना और उनका हौसला बढ़ाना उलेमा की महत्वपूर्ण…
हौज़ा / जामे अतुज़्ज़हेरा स.ल. के इस्लामी अध्ययन विभाग की प्रमुख डॉ. ज़हेरा शरीअत नासिरी ने कहा है कि युद्ध की स्थितियों में समाज के प्रभावशाली और शिक्षित लोगों की सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी जनता में सही जागरूकता पैदा करना और आशा को जीवित रखना है।
-
महिलाओ पर ध्यान देने और उनके लिए हमदर्दी ईमान को कैसे मज़बूत करती है?
हौज़ा ए इल्मिया और यूनिवर्सिटी के एक प्रोफेसर ने कहा: महिलाएँ भावनाओं की पहचान हैं, उनका वजूद बहुत बारीक है, इसीलिए जो लोग ईमान वाले हैं और जिनकी रूह ज़्यादा बारीक है, वे औरतों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, और जो औरतों पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, उनकी रूह ज़्यादा बारीक हो जाती है, इसलिए उनका ईमान भी मज़बूत होता है।
-
रमज़ान के महीने में महिलाओ के कर्तव्य और उनका अज़ीम सवाब
रमज़ान औरतों को अपनी कीमत पहचानने, अपनी ज़िम्मेदारी को इबादत समझने और अपनी भूमिका से समाज में रोशनी फैलाने का संदेश देता है। जब एक औरत खूबसूरत होती है, तो एक परिवार खूबसूरत होता है, और जब परिवार खूबसूरत होते हैं, तो पूरे देश में सुधार की लहर फैलती है।
-
छात्रो का सबसे ज़रूरी मकसद खुद को और समाज को बेहतर बनाना होना चाहिए
मदरसा नरजिसिया की प्रिंसिपल ने कहा: एक अच्छे स्टूडेंट में सेल्फ-कॉन्फिडेंस और खुद का ज्ञान होना चाहिए; उसका आखिरी मकसद खुद को और समाज को बेहतर बनाना होना चाहिए, क्योंकि इंसान को हमेशा की खुशी के लिए ज्ञान और काम, दो चीज़ों की ज़रूरत होती है।
-
हक़ की रक्षा और ज़ालिमों का विरोध करना, इंतज़ार करने वालो की विशेषता है
कुरान और हदीस के शोधकर्ता ने कहा: आख़ेरुज़ ज़मान मे इमाम महीद (अ) के ज़हूर की प्रतीक्षा करने वाले लोग ज़ालिमों के राज मे ज़बरदस्ती उनके आगे नही झुकते बल्कि आख़ेरुज़ ज़मान मे पेश आने वाली मुश्किलों का सामना करते है।
-
महदवी पीढ़ी का पालन पोषण कैसे किया जाए?
एजुकेशन एक्सपर्ट ने कहा: एक महदवी सोच वाली माँ और टीचर, सब्र, प्यार, जागरूकता और लगातार कोशिश करके, एक ऐसे बच्चे को पढ़ाती है जो उम्मीद रखने वाला, होश में रहने वाला, ज़िम्मेदार और इंतज़ार करने वाला इंसान हो; एक ऐसी पीढ़ी जो इंतज़ार को ठहराव के तौर पर नहीं बल्कि खुद और समाज के सुधार के तौर पर देखती है।
-
परिवारिक प्रशिक्षण | डांट डपट से बच्चे सुधरते नहीं है
अगर पिता लगातार बच्चे को डांटता है और घर का माहौल टेंशन से भरा रहता है, तो सही तरीका है कि बच्चे को स्किल्स सिखाएं और उसका साथ दें, न कि उसे डांटें। मां अपने शांत और असरदार लहजे से अपने पति को भी बच्चों की ट्रेनिंग के रास्ते पर चलने के लिए तैयार कर सकती है। नरमी से बात करने का असर सज़ा और बार-बार की सलाह से कहीं अघिक होता है।
-
क्या अल्लाह को हमारी नमाज़ की ज़रूरत है?
हौज़ा/ नमाज़ पढ़ना अल्लाह की कोई ज़रूरत नहीं है, बल्कि हमारे लिए अपने दिल और रूह को साफ़ करने और ज़िंदगी के सही रास्ते पर आगे बढ़ने का एक मौका है।
-
बचपन: परवरिश और व्यक्तित्व निर्माण का आधारभूत चरण
हौज़ा/ बचपन के हर स्टेज की अपनी खासियत होती है; शुरुआती सालों में माता-पिता से गहरा लगाव होता है, जबकि करीब नौ साल की उम्र में कलेक्टिव चेतना का बनना और ज़िम्मेदारी का महत्व साफ़ होने लगता है।
-
अखलाक़ वह चिराग है जो इंसान को उसकी कमज़ोरियों से वाकिफ़ कराकर उसे ठीक करता है: सुश्री…
हौज़ा / मदरसा बिंतुल हुदा (रजिस्टर्ड), हरियाणा ने Google Meet प्लैटफ़ॉर्म के ज़रिए हर साप्ताहिक ऑनलाइन दर्से अख़लाक ऑर्गनाइज़ किया, जिसमें बड़ी संख्या में छात्राओं और महिलाओं ने हिस्सा लिया; सुश्री मिर्ज़ा सना फ़ातिमा नजफ़ी ने दर्स दिया।
-
बच्चों के सवालों का सही जवाब कैसे दें? सात प्रभावित तरीके
हौज़ा/ बच्चे अपनी नैचुरल जिज्ञासा और कल्पना से अपने आस-पास की दुनिया को समझने की कोशिश करते हैं। अगर माता-पिता सब्र, आदर और आसान और समझने लायक तरीके अपनाएं, तो वे बच्चों के सवालों का सबसे अच्छे तरीके से जवाब दे सकते हैं।
-
बच्चियों की परवरिश के महत्वपूर्ण बिंदु
हौज़ा / इमाम मूसा काज़िम (अ.स.) की एक रिवायत से यह स्पष्ट होता है कि बच्चियों की परवरिश में छह वर्ष की उम्र के बाद विशेष नैतिक सीमाओं का पालन करना बेहद ज़रूरी है, ताकि बच्चों को संभावित नैतिक और जिन्सी विचलनों से सुरक्षित रखा जा सके।
-
पीढ़ियों के बीच अच्छाई और बुराई के ट्रांसमिशन का मुख्य सोर्स
हौज़ा / अगर एक माँ अपने बच्चे को सही शिक्षा देती है, तो वह पूरे देश की मुक्ति की नींव रख सकती है, और अगर इसका उल्टा हो, तो वही माँ गुमराही और भटकाव का कारण भी बन सकती है।