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अमेरिका एक बार फिर अपने वादे से मुकर गया!!
इतिहास गवाह है कि वास्तविक इस्लाम के मुजाहिद कभी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाते। उनका संबंध कर्बला से जुड़ा हुआ है। कर्बला वालों ने दुश्मन के सामने अपने सिर तो कटवा दिए, लेकिन कभी अपना सिर नहीं झुकाया।
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इतिहास के कटघरे में एक अबदी सवाल
हौज़ा / कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो सदियाँ बीत जाने के बाद भी कभी पुराने नहीं होते। समय की धूल उनकी चमक को धुंधला नहीं कर सकती, सल्तनतों की हैबत उनकी आवाज़ को ख़ामोश नहीं कर सकती और अकीदत के गहरे पर्दे भी उनकी हक़ीक़त को छिपा नहीं सकते। वे हर दौर में ज़िंदा रहते हैं, हर पीढ़ी के ज़मीर को झकझोरते हैं और हर इंसाफ़पसंद इंसान को अपने सामने जवाबदेह होने पर मजबूर कर देते हैं हज़रत अम्मार बिन यासिर रिज़वानुल्लाह तआला अलैह की शहादत भी ऐसा ही एक अबदी सवाल है।
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कर्बला का रास्ता कभी नहीं रुकता!
शिलमचा की धरती पर जब धमाकों की गूंज उठी, वातावरण बारूद की गंध से भर गया और हुसैन (अ) के दो प्रेमियों ने अपने खून से कर्बला के रास्ते को लाल कर दिया, तो शायद दुनिया ने सोचा होगा कि डर की ये लपटें ज़ायरीन के कदम रोक देंगी। लेकिन इतिहास ने एक बार फिर वही जवाब दोहराया, जो चौदह सौ साल पहले नैनवा के तपते हुए रेगिस्तान ने दिया था।
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ग़ैबत के ज़माने में उम्मत की धार्मिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ
हौज़ा / ध्यान देने वाली बात है कि अगर हमारे हालात और हमारे बुरे आमाल सैकड़ों साल पहले इमाम सादिक़ अ.स. को बेचैन हो कर रोने पर मजबूर कर सकती है तो क्या हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हम इस ग़ैबत के दौर में इन हालात और इन परेशानियों का अंदाज़ा लगा कर कम से कम जुमे के दिन सच्चे दिल से दुआए नुदबा को समझ कर पढ़ते हुए अपने हालात पर ख़ुदा आंसू बहाएं शायद इसी तरह हमारे दिल में इमाम ज़माना अ.स. का सच्चा इश्क़ और सच्ची मोहब्बत का जज़्बा पैदा हो जाए और हम किसी लम्हा भी उनकी याद से ग़ाफ़िल न होने पाएं
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जिन लोगों का अपना दामन ऐबों से भरा होता है, वही दूसरों की कमियों को फैलाते फिरते…
अमीरुल मोमिनीन हज़रत इमाम अली (अ) ने एक रिवायत में उन लोगों के बारे में बताया है जो दूसरों के ऐबों और कमियों को फैलाते हैं तथा इसके पीछे छिपे कारण को स्पष्ट किया है।
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अगर युद्ध अपने अंतिम और सबसे खतरनाक चरण तक पहुँच जाए!
युद्धों का फैसला हमेशा युद्धभूमि में नहीं होता। कई बार असली मुकाबला इस बात का होता है कि कौन-सा देश अपनी अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढाँचे, ऊर्जा, संचार व्यवस्था और राष्ट्रीय मनोबल को अधिक समय तक बनाए रख सकता है। इसलिए आज दुनिया में ईरान के बारे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उसके पास कितनी मिसाइलें हैं, बल्कि यह है कि यदि उसके बिजली संयंत्रों, तेल प्रतिष्ठानों, परिवहन व्यवस्था और संचार नेटवर्क को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया जाए, तो क्या वह अपना प्रतिरोध जारी रख पाएगा?
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इंटरनेट और डिजिटल स्पेस की निगरानी में अमेरिकी शासन शैली
11 सितंबर की घटना के बाद से व्हाइट हाउस के नेताओं ने यह दिखाया है कि इंटरनेट और डिजिटल स्पेस की क्षमताओं के उपयोग के तरीके के संबंध में वे अपनी शासन शक्ति के प्रयोग को लेकर बहुत गंभीर हैं और इस मामले में किसी प्रकार की ढील नहीं देते।
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मअरफ़त ए इमाम
"मअरफ़त-ए-इमाम" का अर्थ है इमाम को सही रूप से पहचानना, उनके इलाही मक़ाम को समझना, उनकी शिक्षाओं को जानना और उनकी आज्ञा का पालन करना। मआरफ़त केवल जानकारी प्राप्त करने का नाम नहीं है, बल्कि दिल से स्वीकार करने और अपने जीवन में उसके तक़ाज़ों को पूरा करने का नाम भी है।
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बात को आगे बढ़ाने से पहले उस पर विचार करें
अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) ने एक हदीस में इस बात पर ज़ोर दिया है कि किसी बात को आगे सुनाने से पहले उसे गहराई से समझना और उस पर विचार करना चाहिए।
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आज के दौर में हमारे चिराग़ ए हिदायत कौन है?
इस युग में हमारे लिए चिराग़ ए हिदायत और कशती ए नेजात हज़रत इमाम महदी, हुज्जत इब्न अल-हसन अल-अस्करी (अ) हैं। इस तथ्य के प्रमाण शिया परंपरा की विश्वसनीय पुस्तकों में स्पष्ट रूप से मिलते हैं।
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रोज़ी भी इंसान को तलाश करती है
अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) ने अपने पुत्र के नाम लिखे एक पत्र में रोज़ी की वास्तविकता तथा उसे प्राप्त करने के प्रयास में मन की शांति और अल्लाह पर भरोसा रखने की आवश्यकता को स्पष्ट किया है।
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शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की ज़िंदगी से जवानों के लिए कुछ अहम…
शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई का जीवन नौजवान पीढ़ी के लिए एक रोशन राहनुमा (मार्गदर्शक) है। उनका जीवन हमें बताता है कि जवानी महज़ एक उम्र नहीं, बल्कि जुर्रत (साहस), हिम्मत और पक्के इरादे का नाम है, जहाँ मस्लहतपसंदी (स्वार्थपरता) दम तोड़ देती है और उसूलपसंदी (सिद्धांतनिष्ठा) का दिया जल उठता है। आपके जीवन से जवानों के लिए
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अमेरिकी सैन्य अड्डे: क्या मुस्लिम देश अपनी संप्रभुता स्वयं बेच रहे हैं? क्या अब भी…
यह कितनी अफसोस की बात है कि दुनिया में मुसलमानों की आबादी ढाई अरब है, 57 इस्लामी देश हैं, लेकिन दुख की बात है कि 34 करोड़ की आबादी वाला अमेरिका 21 लाख सैनिकों के बल पर पूरे 57 मुस्लिम देशों पर अपना प्रभाव बनाए हुए है।
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क्या अहले बैत (अ) से प्रेम केवल हृदय की भावना और भावनात्मक लगाव है या एक धार्मिक…
शिया फ़िक़्ह में 'तवल्ला' और 'तबर्रा' केवल नैतिक सलाह नहीं हैं, बल्कि नमाज़ और रोज़े की तरह एक धार्मिक कर्तव्य हैं।
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भलाई में तुरंत अमल
इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) ने एक रिवायत में ईमान वालों को नेक कामों में जल्दी करने और उन्हें टालने से बचने की हिदायत दी है।
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नाफ़ेअ इब्ने हिलाल इब्ने नाफ़ेअ इब्ने हमल इब्ने सअद
हौज़ा / आप का पूरा नाम नाफ़ेअ इब्ने हिलाल इब्ने नाफ़ेअ इब्ने हमल इब्ने सअद अलअशीरा इब्ने मदहज अलजमली था। आप बुजुर्गे कौम और शरिफुन्नफ्स थे। मिल्लत की सरदारी और रियासत आप की खानदानी विरासत थी। आप बहादुर, कारी-ऐ-कुरान रावी-ऐ-हदीस और मुंशी-ऐ-कामिल थें।
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मतभेद एक स्वाभाविक और वैज्ञानिक मामला; लेकिन सीमा क्या है?
मतभेद अपनी जगह एक स्वाभाविक और वैज्ञानिक मामला है और विभिन्न व्यक्तित्वों के राजनीतिक या प्रशासनिक फैसलों पर आलोचना भी की जा सकती है। हालाँकि यह बात अत्यंत खेदजनक है कि कभी-कभी सोशल मीडिया पर व्यक्तित्वों के खिलाफ ऐसे संगठित प्रचार अभियान चलाए जाते हैं जिनका आधार शोध, न्याय और ईमानदारी के बजाय अफवाहों, अतिशयोक्ति और बदनामी पर होता है।
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सदी के अज़ीम शहीद; सर्वोच्च नेता सैयद अली खामनेई
28 फरवरी को सर्वोच्च नेता ने अपने जाननिसार साथियों, उच्च सैन्य कमांडरों, अपने सम्मानित परिवार, संतान, बेटी, बहू और क्रांतिकारी साथियों के साथ शहादत का प्याला पिया; यह घटना इस्लाम के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों और अविस्मरणीय स्मृतियों में गिनी जाती है।
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इमाम की मारफ़त क्यों ज़रूरी है?
सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि मारिफ़त से क्या मतलब है और इसके शाब्दिक अर्थ क्या हैं। इसके बाद यह बात स्पष्ट होगी कि हदीसों में मारिफ़त को इतनी अहमियत क्यों दी गई है और हमसे किस तरह की मारिफ़त मांगी गई है।
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इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इंसानियत के अज़ीम इन्क़िलाबी रहनुमा
तारीख़ में बहुत से लोगों ने हालात बदलने की कोशिश की, लेकिन वाक़ए कर्बला और इमाम हुसैन (अ) का नाम वह इकलौती मिसाल है जिसने हर दौर के मज़लूमों और सच्चे लोगों को रास्ता दिखाया है। इमाम हुसैन (अ) की जंग कोई सियासी जंग या कुर्सी की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह ज़ुल्म , नाइंसाफ़ी और इंसान की हुरमत की पामाली के ख़िलाफ़ एक बहुत बड़ा इन्क़िलाब था।