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  • अरबईन की पैदल यात्रा के दौरान कौन सा ज़िक्र पढ़ें?

    अरबईन की पैदल यात्रा के दौरान कौन सा ज़िक्र पढ़ें?

    हौज़ा / इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम की एक रिवायत में गुनाहगार के लिए इमाम हुसैन (अ.स.) की ज़ियारत के रास्ते का एक महत्वपूर्ण अमल बताया गया है।

  • ख़ुदा के नज़दीक सबसे पसंदीदा अमल

    ख़ुदा के नज़दीक सबसे पसंदीदा अमल

    अमीरुल मोमेनीन इमाम अली (अ) ने एक रिवायत में नमाज़ की फ़ज़ीलत और उसे वक़्त पर अदा करने की अहमियत की ओर इशारा फ़रमाया है।

  • लोकतंत्र का बदलता चेहरा और मुसलमानों के लिए सिमटती ज़मीन!

    लोकतंत्र का बदलता चेहरा और मुसलमानों के लिए सिमटती ज़मीन!

    भारत की लोकतांत्रिक पहचान उसके संविधान, बहुलतावाद और धार्मिक विविधता पर आधारित रही है। लेकिन नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के बाद इस लोकतांत्रिक ढांचे की बुनियादें कमजोर होती दिखाई देने लगीं। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत के लोकतांत्रिक और संवैधानिक मूल्यों पर सवाल उठे, क्योंकि अल्पसंख्यकों और वंचित वर्गों के लिए संवैधानिक समानता केवल एक सैद्धांतिक दावा बनकर रह गई।

  • इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत और ऐतिहासिक रुकावटें

    इमाम हुसैन (अ) की ज़ियारत और ऐतिहासिक रुकावटें

    तारीख गवाह है कि ज़ालिम हुक्मरान हमेशा कर्बला को ज़ुल्म और इस्तिबदाद के खिलाफ बेदारी, हक़गोई, आज़ादी और मुज़ाहिमत का मरकज़ समझते रहे। इसी लिए उन्होंने हर दौर में ज़ाइरिन-ए-इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की राह में रुकावटें खड़ी कीं, लेकिन इन तमाम मज़ालिम, पाबंदियों और सफ़ाकियों के बावजूद वे अपने मक़सद में कभी कामयाब न हो सके।

  • आशूरा की घटना आज तक क्यों ज़िंदा है?

    आशूरा की घटना आज तक क्यों ज़िंदा है?

     इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने 10 मुहर्रम 61 हिजरी को अपना सब कुछ क़ुर्बान करके यह साबित कर दिया कि दीन, हक़ और उसूलों पर कभी समझौता नहीं किया जा सकता।

  • पक्का ईमान ही इंसान को निडर बनाता है!

    पक्का ईमान ही इंसान को निडर बनाता है!

    आज तक जितनी भी महान हस्तियों का अन्यायपूर्वक ख़ून बहाया गया है, उसका मुख्य कारण यही रहा है कि या तो लोगों में सही समझ (बसीरत) की कमी थी या फिर ईमान कमज़ोर था। इसी कारण इंसान ज़ालिम से डरता है और उसके ख़िलाफ़ खड़ा नहीं हो पाता। इसलिए केवल एक अल्लाह पर अटूट ईमान ही इंसान को निडर बनाता है।

  • हक़ के बचाव में डट जाना

    हक़ के बचाव में डट जाना

     अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) ने एक रिवायत में बातिल के मुक़ाबले में डट जाने और स्थिरता पर ज़ोर दिया है।

  • अमेरिका एक बार फिर अपने वादे से मुकर गया!!

    अमेरिका एक बार फिर अपने वादे से मुकर गया!!

    इतिहास गवाह है कि वास्तविक इस्लाम के मुजाहिद कभी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाते। उनका संबंध कर्बला से जुड़ा हुआ है। कर्बला वालों ने दुश्मन के सामने अपने सिर तो कटवा दिए, लेकिन कभी अपना सिर नहीं झुकाया।

  • इतिहास के कटघरे में एक अबदी सवाल

    इतिहास के कटघरे में एक अबदी सवाल

    हौज़ा / कुछ सवाल ऐसे होते हैं जो सदियाँ बीत जाने के बाद भी कभी पुराने नहीं होते। समय की धूल उनकी चमक को धुंधला नहीं कर सकती, सल्तनतों की हैबत उनकी आवाज़ को ख़ामोश नहीं कर सकती और अकीदत के गहरे पर्दे भी उनकी हक़ीक़त को छिपा नहीं सकते। वे हर दौर में ज़िंदा रहते हैं, हर पीढ़ी के ज़मीर को झकझोरते हैं और हर इंसाफ़पसंद इंसान को अपने सामने जवाबदेह होने पर मजबूर कर देते हैं हज़रत अम्मार बिन यासिर रिज़वानुल्लाह तआला अलैह की शहादत भी ऐसा ही एक अबदी सवाल है।

  • कर्बला का रास्ता कभी नहीं रुकता!

    कर्बला का रास्ता कभी नहीं रुकता!

    शिलमचा की धरती पर जब धमाकों की गूंज उठी, वातावरण बारूद की गंध से भर गया और हुसैन (अ) के दो प्रेमियों ने अपने खून से कर्बला के रास्ते को लाल कर दिया, तो शायद दुनिया ने सोचा होगा कि डर की ये लपटें ज़ायरीन के कदम रोक देंगी। लेकिन इतिहास ने एक बार फिर वही जवाब दोहराया, जो चौदह सौ साल पहले नैनवा के तपते हुए रेगिस्तान ने दिया था।

  • ग़ैबत के ज़माने में उम्मत की धार्मिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ

    ग़ैबत के ज़माने में उम्मत की धार्मिक और सामाजिक ज़िम्मेदारियाँ

    हौज़ा / ध्यान देने वाली बात है कि अगर हमारे हालात और हमारे बुरे आमाल सैकड़ों साल पहले इमाम सादिक़ अ.स. को बेचैन हो कर रोने पर मजबूर कर सकती है तो क्या हमारी ज़िम्मेदारी नहीं बनती कि हम इस ग़ैबत के दौर में इन हालात और इन परेशानियों का अंदाज़ा लगा कर कम से कम जुमे के दिन सच्चे दिल से दुआए नुदबा को समझ कर पढ़ते हुए अपने हालात पर ख़ुदा आंसू बहाएं शायद इसी तरह हमारे दिल में इमाम ज़माना अ.स. का सच्चा इश्क़ और सच्ची मोहब्बत का जज़्बा पैदा हो जाए और हम किसी लम्हा भी उनकी याद से ग़ाफ़िल न होने पाएं

  • जिन लोगों का अपना दामन ऐबों से भरा होता है, वही दूसरों की कमियों को फैलाते फिरते हैं

    जिन लोगों का अपना दामन ऐबों से भरा होता है, वही दूसरों की कमियों को फैलाते फिरते…

    अमीरुल मोमिनीन हज़रत इमाम अली (अ) ने एक रिवायत में उन लोगों के बारे में बताया है जो दूसरों के ऐबों और कमियों को फैलाते हैं तथा इसके पीछे छिपे कारण को स्पष्ट किया है।

  • अगर युद्ध अपने अंतिम और सबसे खतरनाक चरण तक पहुँच जाए!

    अगर युद्ध अपने अंतिम और सबसे खतरनाक चरण तक पहुँच जाए!

     युद्धों का फैसला हमेशा युद्धभूमि में नहीं होता। कई बार असली मुकाबला इस बात का होता है कि कौन-सा देश अपनी अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढाँचे, ऊर्जा, संचार व्यवस्था और राष्ट्रीय मनोबल को अधिक समय तक बनाए रख सकता है। इसलिए आज दुनिया में ईरान के बारे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उसके पास कितनी मिसाइलें हैं, बल्कि यह है कि यदि उसके बिजली संयंत्रों, तेल प्रतिष्ठानों, परिवहन व्यवस्था और संचार नेटवर्क को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया जाए, तो क्या वह अपना प्रतिरोध जारी रख पाएगा?

  • इंटरनेट और डिजिटल स्पेस की निगरानी में अमेरिकी शासन शैली

    इंटरनेट और डिजिटल स्पेस की निगरानी में अमेरिकी शासन शैली

    11 सितंबर की घटना के बाद से व्हाइट हाउस के नेताओं ने यह दिखाया है कि इंटरनेट और डिजिटल स्पेस की क्षमताओं के उपयोग के तरीके के संबंध में वे अपनी शासन शक्ति के प्रयोग को लेकर बहुत गंभीर हैं और इस मामले में किसी प्रकार की ढील नहीं देते।

  • मअरफ़त ए इमाम

    मअरफ़त ए इमाम

    "मअरफ़त-ए-इमाम" का अर्थ है इमाम को सही रूप से पहचानना, उनके इलाही मक़ाम को समझना, उनकी शिक्षाओं को जानना और उनकी आज्ञा का पालन करना। मआरफ़त केवल जानकारी प्राप्त करने का नाम नहीं है, बल्कि दिल से स्वीकार करने और अपने जीवन में उसके तक़ाज़ों को पूरा करने का नाम भी है।

  • बात को आगे बढ़ाने से पहले उस पर विचार करें

    बात को आगे बढ़ाने से पहले उस पर विचार करें

    अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) ने एक हदीस में इस बात पर ज़ोर दिया है कि किसी बात को आगे सुनाने से पहले उसे गहराई से समझना और उस पर विचार करना चाहिए।

  • आज के दौर में हमारे चिराग़ ए हिदायत कौन है?

    आज के दौर में हमारे चिराग़ ए हिदायत कौन है?

    इस युग में हमारे लिए चिराग़ ए हिदायत और कशती ए नेजात हज़रत इमाम महदी, हुज्जत इब्न अल-हसन अल-अस्करी (अ) हैं। इस तथ्य के प्रमाण शिया परंपरा की विश्वसनीय पुस्तकों में स्पष्ट रूप से मिलते हैं।

  • रोज़ी भी इंसान को तलाश करती है

    रोज़ी भी इंसान को तलाश करती है

    अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) ने अपने पुत्र के नाम लिखे एक पत्र में रोज़ी की वास्तविकता तथा उसे प्राप्त करने के प्रयास में मन की शांति और अल्लाह पर भरोसा रखने की आवश्यकता को स्पष्ट किया है।

  • शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की ज़िंदगी से जवानों के लिए कुछ अहम सबक

    शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की ज़िंदगी से जवानों के लिए कुछ अहम…

    शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई का जीवन नौजवान पीढ़ी के लिए एक  रोशन राहनुमा (मार्गदर्शक) है। उनका जीवन हमें बताता है कि जवानी महज़ एक उम्र नहीं, बल्कि जुर्रत (साहस), हिम्मत और पक्के इरादे का नाम है, जहाँ मस्लहतपसंदी (स्वार्थपरता) दम तोड़ देती है और उसूलपसंदी (सिद्धांतनिष्ठा) का दिया जल उठता है। आपके जीवन से जवानों के लिए 

  • अमेरिकी सैन्य अड्डे: क्या मुस्लिम देश अपनी संप्रभुता स्वयं बेच रहे हैं? क्या अब भी सबक सीखने का समय नहीं आया?

    अमेरिकी सैन्य अड्डे: क्या मुस्लिम देश अपनी संप्रभुता स्वयं बेच रहे हैं? क्या अब भी…

    यह कितनी अफसोस की बात है कि दुनिया में मुसलमानों की आबादी ढाई अरब है, 57 इस्लामी देश हैं, लेकिन दुख की बात है कि 34 करोड़ की आबादी वाला अमेरिका 21 लाख सैनिकों के बल पर पूरे 57 मुस्लिम देशों पर अपना प्रभाव बनाए हुए है।