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रमज़ान के महीने की असली रूह सिर्फ़ रमज़ान के बारे में नहीं है, बल्कि पूरी ज़िंदगी…
रमज़ान के महीने का मतलब समझें। अल्लाह आपको हर साल एक महीना देता है ताकि आपको नेकी की ट्रेनिंग मिले। इसे अल्लाह समझें। रमज़ान सिर्फ़ बिना कुछ खाए-पिए दिन बिताने के बारे में नहीं है, बल्कि यह दूसरे गरीब, अनाथ और ज़रूरतमंद लोगों की भूख महसूस करने और उनके दर्द, दुख और तकलीफ़ को समझने के बारे में भी है।
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रोज़े के अहकाम | गर्भवति और स्तनपान कराने वाली महिलाओं के लिए हुक्म
अगर रोज़े की वजह से दूध सूख जाता है या कम हो जाता है और बच्चे को नुकसान होने का डर है, तो रोज़ा न रखें और आपको हर रोज़े के बदले किसी गरीब को एक मुद खाना देना होगा और फिर रोज़ों की क़ज़ा करनी होगी।
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रमज़ान अल मुबारक के चौथे दिन की दुआ
हज़रत रसूल अल्लाह स.ल.व.व.ने यह दुआ बयान फ़रमाई हैं।
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रमज़ान का महीना और अल्लाह की आज्ञा पालन की चाहत
इमाम हसन मुजतबा (अ) ने रमज़ान के महीने को मोमिनों के लिए अच्छे काम करने में एक-दूसरे से मुकाबला करने का ज़रिया बताया है।
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4 रमज़ान अल मुबारक 1447 - 22 फ़रवरी 2026
हौज़ा / इस्लामी कैलेंडरः 4 रमज़ान अल मुबारक 1447 - 22 फ़रवरी 2026
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दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करने का इस्लाम में हुक्म
हौज़ा / इंसान के जीवन में दूसरों के साथ लेन देन बहुत महत्वपूर्ण विषय है। इंसान के सामाजिक जीवन को बेहतर बनाने में सामाजिक संबंध बहुत महत्वपूर्ण हैं। इंसान एक सामाजिक प्राणी है और सामाजिक होने की मांग यह है कि इंसान अपने सामाजिक दायित्वों को पहचाने और उसे ठीक तरह से अंजाम दे। ईश्वरीय धर्म इस्लाम ने भी इस महत्वपूर्ण विशेषता पर बहुत ध्यान दिया है। इस्लाम धर्म के बहुत से आदेश सामाजिक संबंधों से विशेष हैं।
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शरई अहकाम | क्या कोई व्यक्ति मामूली कमज़ोरी की वजह से रोज़ा छोड़ सकता है?
कोई व्यक्ति मामूली कमजोरी की वजह से रोज़ा नहीं छोड़ सकता, लेकिन यदि कमजोरी इतनी अधिक हो कि उसे सामान्य रूप से सहन न किया जा सके, तो रोजा छोड़ने में कोई बुराई नहीं है।
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शैतानी सिफत लोगों के "तबाही के आइलैंड" में पश्चिमी सभ्यता की बदनामी का स्पष्ट सबूत
जेफ़री एपस्टीन केस को सिर्फ़ एक नैतिक स्कैंडल या निजी भटकाव तक सीमित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह केस असल में वेस्टर्न लिबरल डेमोक्रेसी के स्ट्रक्चर में पावर, पैसा, करप्शन और पॉलिटिकल सिक्योरिटी के आपस में जुड़े होने का सबसे साफ़ और घटिया उदाहरण है।
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रोज़े के चिकित्सीय और रूहानी फ़ायदे
पूरे दिन कुछ न खाने से खून की मात्रा कम हो जाती है, जिससे डायस्टोलिक प्रेशर कम होता है, जिससे दिल शांत और सुकून भरा रहता है।
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असली बदनसीब इंसान कौन है?
पैग़म्बर (स) ने रमज़ान के मुबारक महीने में एक रिवायत में असली बदनसीब इंसान का परिचय कराया।
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रमज़ान अल मुबारक के तीसरे दिन की दुआ
हज़रत रसूल अल्लाह (स)ने यह दुआ बयान फ़रमाई हैं।
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रमज़ान के पवित्र महीने में रोज़ा खोलने का सवाब
हज़रत इमाम रज़ा (अ) ने अमीरूल मोमिनीन (अ) से वर्णन किया हैं कि अल्लाह के रसूल ने एक खुतबे में कहा: ऐ लोगों! तुम में से जो कोई भी इस रोज़े के महीने में किसी रोज़ेदार को खाना खिलाएगा, अल्लाह उसे एक गुलाम को आज़ाद करने के बराबर सवाब देगा, और उसके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएँगे।
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3 रमज़ान अल मुबारक 1447 - 21 फ़रवरी 2026
हौज़ा / इस्लामी कैलेंडरः 3 रमज़ान अल मुबारक 1447 - 21 फ़रवरी 2026
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हर रोज़ वसीयत लिखने का हुक्म
हौज़ा / हज़रत रसूल अल्लाह स.ल.व. ने देख लिया कि लोगों को लश्करे ओसामा के साथ मदीने से बाहर भेजने की तदबीर नाकाम हो गई तो आपने तय किया कि हज़रत अली (अ) की इमामत के सिलसिले में अपनी 23 साला ज़िन्दगी में जो कुछ लोगों के सामने बयान किया है, उन सब को एक वसीयतनामे में लिख दिया जाये।
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साइंस की निगाह में रोज़े रखने के जिस्मानी फायदे
हौज़ा / आज हम लोग रमज़ान के मुबारक महीने मे एक दीनी कर्तव्य समझ कर रोज़े रखते हैं जो सही भी है लेकिन दीनी कर्तव्य और सवाब के अलावा भी रोज़े के बहुत से फ़ायदे हैं जिनमे से कुछ फ़ायदे हमारी सेहत व स्वास्थ से सम्बन्धित हैं।
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शरई अहकाम | यदि कोई व्यक्ति इस बात पर आश्वस्त है कि रोज़ा रखने से उसे कोई नुकसान…
अगर किसी व्यक्ति को भरोसा हो कि रोज़ा उसके लिए हानिकारक नहीं है और वह रोज़ा रखे और मगरिब के बाद उसे पता चले कि रोज़ा उसके लिए इतना हानिकारक था कि वह इसकी परवाह करता तो (एहतियाते वाजिब की बिना पर) उसे उस रोज़े की क़ज़ा करनी चाहिए।
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रमज़ान अल मुबारक के दूसरे दिन की दुआ
हज़रत रसूल अल्लाह स.ल.व.व.ने यह दुआ बयान फ़रमाई हैं। जिसमे आप (स) ने फ़रमायाः ख़ुदाया! मुझे इस महीने में अपनी ख़ुशनूदी से क़रीब कर दे और अपनी नाराज़गी और इंतक़ाम से दूर कर दे और तेरी (क़ुरआनी) आयतों की तिलावत करने की तौफ़ीक़ अता फ़रमा, ऐ रहम करने वालों में सबसे ज़ियादा रहम करने वाले।
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रमज़ान के महीने में जुमे की नमाज़ की फ़ज़ीलत और बरतरी
इमाम बाकि़र (अ) ने एक रिवायत में रमज़ान के मुबारक महीने में जुमे की नमाज़ की खास हैसियत और बेहतरी के बारे में बताया है।
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2 रमज़ान अल मुबारक 1447 - 20 फ़रवरी 2026
हौज़ा / इस्लामी कैलेंडरः 2 रमज़ान अल मुबारक 1447 - 20 फ़रवरी 2026
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अल्लाह की नेमतों को गुनाह में इस्तेमाल न करें
हौज़ा / इस बात का हमेशा ख़याल रखना चाहिए कि इन नेमतों को कैसे इस्तेमाल करें? आप की शारीरिक नेमत, आँख की नेमत, कान की नेमत, हाथ की नेमत, पांव की नेमत, ये सब अल्लाह की नेमतें हैं, वो नेमतें हैं कि जिनकी क़द्र व क़ीमत का इंसान कोई अंदाज़ा नहीं लगा सकता, ये इस क़द्र क़ीमती हैं कि किसी भी भौतिक मानदंड पर उनको तौला नहीं जा सकता।इन नेमतों को गुनाह में इस्तेमाल न करें।