रविवार 14 जून 2026 - 06:16
भारतीय जहाज़ों पर अमेरिकी आक्रामकता और हमारी वैश्विक साख तथा प्रतिष्ठा पर उसके प्रभाव

भारत एक ऐसे देश के रूप में उभरकर सामने आया था जो यूरोपीय उपनिवेशवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मुकाबले में उत्पीड़ित और वंचित लोगों का समर्थक था। आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक ओर उसे अपने राजनीतिक और आर्थिक मामलों में अमेरिकी संकेतों का इंतज़ार करना पड़ता है तथा अमेरिकी इच्छानुसार नीतियाँ अपनानी पड़ती हैं। अमेरिका जिस देश के साथ आर्थिक संबंध समाप्त करने को कहे, भारत को वही करना पड़ता है, चाहे उससे देश और जनता को कितना ही नुकसान क्यों न उठाना पड़े।

लेखकः डॉ सय्यद फ़ाइज़ बाक़री

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! ब्रिटिश उपनिवेशवाद की गिरफ्त से आज़ादी प्राप्त करने के बाद शीत युद्ध के दौर में गुटनिरपेक्ष आंदोलन में भारत के सही नेतृत्व और उचित रुख़ ने विश्व स्तर पर भारत की एक अत्यंत सकारात्मक छवि प्रस्तुत की थी। भारत एक ऐसे देश के रूप में उभरकर सामने आया था जो यूरोपीय उपनिवेशवाद और अमेरिकी साम्राज्यवाद के मुकाबले में उत्पीड़ित और वंचित लोगों का समर्थक था। लेकिन भारत के राजनीतिक परिदृश्य में आए परिवर्तनों, देश में लागू गलत नीतियों तथा धार्मिक तनाव और हिंसा के आधार पर राजनीतिक गलियारों तक पहुँच बनाने की प्रवृत्ति ने देश की अंतरराष्ट्रीय साख और प्रतिष्ठा को क्षति पहुँचाई। इसके परिणामस्वरूप भारत की विदेश नीति और वैश्विक प्राथमिकताएँ भी बदलने लगीं और देश धीरे-धीरे अमेरिका और इज़राइल के प्रभाव में फँसता चला गया।

इस राजनीति के कारण देश को लाभ होने के बजाय उसकी राजनीतिक स्थिति कमज़ोर पड़ने लगी, आर्थिक संबंध प्रभावित होने लगे और सामाजिक एकता को भी नुकसान पहुँचा। आज भारत एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ एक ओर उसे अपने राजनीतिक और आर्थिक मामलों में अमेरिकी संकेतों का इंतज़ार करना पड़ता है तथा अमेरिकी इच्छानुसार नीतियाँ अपनानी पड़ती हैं। अमेरिका जिस देश के साथ आर्थिक संबंध समाप्त करने को कहे, भारत को वही करना पड़ता है, चाहे उससे देश और जनता को कितना ही नुकसान क्यों न उठाना पड़े। राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अमेरिकी नीतियों को ध्यान में रखना पड़ता है, चाहे इससे पुराने संबंध खराब हों या अन्याय का साथ देना पड़े।

दूसरी ओर अमेरिका लगातार भारत का अपमान भी करता है। भारतीय नागरिकों को बेड़ियों में जकड़कर निर्वासित किया जाता है, जबकि चीन के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया जाता। भारत और उसके नेतृत्व का मज़ाक उड़ाया जाता है। इसी क्रम की एक नई घटना कुछ दिन पहले ओमान के तट के निकट सामने आई, जहाँ तेल ले जा रहे व्यापारिक जहाज़ ‘एमटी सीटे बेलो’ पर अमेरिकी नौसेना के हमले का असर पड़ा। इस जहाज़ पर कुल 24 भारतीय चालक दल के सदस्य सवार थे। हमले के बाद जहाज़ में अफरा-तफरी मच गई और तत्काल राहत एवं बचाव कार्य शुरू किए गए।

बचाव अभियान के दौरान 21 भारतीय नागरिकों को सुरक्षित बचा लिया गया, लेकिन तीन नाविक लापता हो गए थे। बाद में आधिकारिक रूप से उनकी मृत्यु की पुष्टि कर दी गई। मृतकों की पहचान डेक कैडेट आदित्य शर्मा, इंजन फिटर शिवानंद चौरसिया और मुख्य अभियंता पटनाला सुरेश के रूप में की गई।

सूचनाओं के अनुसार 8 जून को पलाऊ के ध्वज वाले तेल टैंकर ‘मेरी वैक्स’ को निशाना बनाया गया था, जिस पर 24 भारतीय नाविक सवार थे। इस हमले में सभी सुरक्षित रहे। इसके बाद 10 जून को ‘सीटे बेलो’ नामक एक अन्य टैंकर पर हमला हुआ, जिसमें 24 भारतीय नाविकों में से तीन की मृत्यु हो गई। गुरुवार को ‘जल वीर’ नामक एक और जहाज़ भी कार्रवाई की चपेट में आया, जिस पर 20 भारतीय नागरिक सवार थे।

अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार ‘जल वीर’ ने अमेरिकी निर्देशों का पालन नहीं किया था, जिसके बाद एक युद्धक विमान ने उसके इंजन वाले हिस्से पर दो मिसाइलें दागीं। अमेरिकी अधिकारियों का दावा है कि यह जहाज़ ईरानी तेल की ढुलाई करके अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा था।

इस अमेरिकी आक्रामकता ने भारत में राष्ट्रीय स्वाभिमान को झकझोर दिया और अमेरिकी दबंगई के विरुद्ध जनता में गहरा आक्रोश देखने को मिला। मीडिया ने भी जनभावनाओं को देखते हुए इस घटना की निंदा की और भारत सरकार ने कूटनीतिक स्तर पर प्रतिक्रिया व्यक्त की। नई दिल्ली में तैनात अमेरिकी कार्यवाहक राजदूत जेसन मैक्स को विदेश मंत्रालय ने तलब किया और इस मामले में भारत की चिंताओं से अवगत कराया।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने भी कहा कि भारतीय चालक दल के सदस्यों को लेकर चलने वाले व्यापारिक जहाज़ों के विरुद्ध अमेरिकी नौसेना की ऐसी कार्रवाइयाँ तत्काल बंद होनी चाहिए।

विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी अपने बयान में कहा कि उन्होंने मार्को रुबियो से बातचीत के दौरान खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी नौसैनिक हमलों के विरुद्ध भारत का कड़ा विरोध दोहराया। उनके अनुसार इन हमलों में तीन भारतीय नाविक मारे गए हैं और व्यापारिक जहाज़ों के विरुद्ध इस प्रकार की घातक कार्रवाइयाँ किसी भी स्थिति में उचित नहीं हैं।

इस बीच कांग्रेस ने भी इस मुद्दे पर मोदी सरकार को घेरा है। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने कहा कि पिछले कुछ दिनों में तीन अलग-अलग व्यापारिक जहाज़ अमेरिकी कार्रवाइयों का शिकार हुए हैं, जिनमें तीन भारतीय नाविकों की मृत्यु हुई, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस विषय पर एक शब्द भी नहीं कहा। उन्होंने आरोप लगाया कि समझौता-ग्रस्त प्रधानमंत्री ‘भारत माता’ के बेटों की रक्षा नहीं कर सकते, क्योंकि उनकी जान लेने वालों को नाराज़ करने का न तो उनमें साहस है और न ही शक्ति।

कांग्रेस ने सरकार से मांग की है कि वह इस मामले में प्रभावी कूटनीतिक कदम उठाए और जिम्मेदार लोगों से जवाब तलब करे। उनका कहना था कि जब किसी विदेशी शक्ति की कार्रवाई में भारतीय नागरिक मारे जाएँ तो प्रधानमंत्री को स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए।

इससे पहले भी कांग्रेस पार्टी अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों की निंदा कर चुकी है। पार्टी ने केंद्र सरकार से मांग की कि वह इस मामले में कूटनीतिक स्तर पर प्रभावी कार्रवाई करे और जिम्मेदारी तय कराए। कांग्रेस का कहना है कि यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ अपने संबंधों को कूटनीतिक सफलता के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तो फिर उन घटनाओं पर चुप्पी नहीं साधी जा सकती जिनमें भारतीय नागरिकों की जान गई हो।

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता जनाब इस्माईल बक़ाई ने भी भारतीय व्यापारिक जहाज़ों पर अमेरिकी हमलों की कड़े शब्दों में आलोचना करते हुए इसे अमेरिका की वर्तमान नीति का स्पष्ट प्रमाण बताया।

उन्होंने अपने बयान में कहा कि इन हमलों के परिणामस्वरूप कम से कम तीन भारतीय नागरिकों की मृत्यु हुई है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि अमेरिका “सशस्त्र लूट” और “राज्य-प्रायोजित समुद्री डकैती” जैसी नीति पर कायम है। उनके अनुसार यह व्यवहार न केवल गैर-जिम्मेदाराना है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित सिद्धांतों और नियमों के लिए भी खतरा बनता जा रहा है।

इस्माईल बक़ाई ने मृत भारतीय नाविकों के परिवारों और मित्रों के प्रति संवेदना व्यक्त करते हुए भारतीय जनता और भारत सरकार के साथ अपनी गहरी शोक-संवेदना प्रकट की।

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