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अमेरिका एक बार फिर अपने वादे से मुकर गया!!
इतिहास गवाह है कि वास्तविक इस्लाम के मुजाहिद कभी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाते। उनका संबंध कर्बला से जुड़ा हुआ है। कर्बला वालों ने दुश्मन के सामने अपने सिर तो कटवा दिए, लेकिन कभी अपना सिर नहीं झुकाया।
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कर्बला का रास्ता कभी नहीं रुकता!
शिलमचा की धरती पर जब धमाकों की गूंज उठी, वातावरण बारूद की गंध से भर गया और हुसैन (अ) के दो प्रेमियों ने अपने खून से कर्बला के रास्ते को लाल कर दिया, तो शायद दुनिया ने सोचा होगा कि डर की ये लपटें ज़ायरीन के कदम रोक देंगी। लेकिन इतिहास ने एक बार फिर वही जवाब दोहराया, जो चौदह सौ साल पहले नैनवा के तपते हुए रेगिस्तान ने दिया था।
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अगर युद्ध अपने अंतिम और सबसे खतरनाक चरण तक पहुँच जाए!
युद्धों का फैसला हमेशा युद्धभूमि में नहीं होता। कई बार असली मुकाबला इस बात का होता है कि कौन-सा देश अपनी अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढाँचे, ऊर्जा, संचार व्यवस्था और राष्ट्रीय मनोबल को अधिक समय तक बनाए रख सकता है। इसलिए आज दुनिया में ईरान के बारे में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह नहीं है कि उसके पास कितनी मिसाइलें हैं, बल्कि यह है कि यदि उसके बिजली संयंत्रों, तेल प्रतिष्ठानों, परिवहन व्यवस्था और संचार नेटवर्क को बड़े पैमाने पर निशाना बनाया जाए, तो क्या वह अपना प्रतिरोध जारी रख पाएगा?
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इंटरनेट और डिजिटल स्पेस की निगरानी में अमेरिकी शासन शैली
11 सितंबर की घटना के बाद से व्हाइट हाउस के नेताओं ने यह दिखाया है कि इंटरनेट और डिजिटल स्पेस की क्षमताओं के उपयोग के तरीके के संबंध में वे अपनी शासन शक्ति के प्रयोग को लेकर बहुत गंभीर हैं और इस मामले में किसी प्रकार की ढील नहीं देते।
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मअरफ़त ए इमाम
"मअरफ़त-ए-इमाम" का अर्थ है इमाम को सही रूप से पहचानना, उनके इलाही मक़ाम को समझना, उनकी शिक्षाओं को जानना और उनकी आज्ञा का पालन करना। मआरफ़त केवल जानकारी प्राप्त करने का नाम नहीं है, बल्कि दिल से स्वीकार करने और अपने जीवन में उसके तक़ाज़ों को पूरा करने का नाम भी है।
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आज के दौर में हमारे चिराग़ ए हिदायत कौन है?
इस युग में हमारे लिए चिराग़ ए हिदायत और कशती ए नेजात हज़रत इमाम महदी, हुज्जत इब्न अल-हसन अल-अस्करी (अ) हैं। इस तथ्य के प्रमाण शिया परंपरा की विश्वसनीय पुस्तकों में स्पष्ट रूप से मिलते हैं।
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शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई की ज़िंदगी से जवानों के लिए कुछ अहम सबक
शहीद रहबर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई का जीवन नौजवान पीढ़ी के लिए एक रोशन राहनुमा (मार्गदर्शक) है। उनका जीवन हमें बताता है कि जवानी महज़ एक उम्र नहीं, बल्कि जुर्रत (साहस), हिम्मत और पक्के इरादे का नाम है, जहाँ मस्लहतपसंदी (स्वार्थपरता) दम तोड़ देती है और उसूलपसंदी (सिद्धांतनिष्ठा) का दिया जल उठता है। आपके जीवन से जवानों के लिए
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हालिया क्षेत्रीय स्थिति पर एक विचारोत्तेजक लेख
अमेरिकी सैन्य अड्डे: क्या मुस्लिम देश अपनी संप्रभुता स्वयं बेच रहे हैं? क्या अब भी सबक सीखने का समय नहीं आया?
यह कितनी अफसोस की बात है कि दुनिया में मुसलमानों की आबादी ढाई अरब है, 57 इस्लामी देश हैं, लेकिन दुख की बात है कि 34 करोड़ की आबादी वाला अमेरिका 21 लाख सैनिकों के बल पर पूरे 57 मुस्लिम देशों पर अपना प्रभाव बनाए हुए है।
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क्या अहले बैत (अ) से प्रेम केवल हृदय की भावना और भावनात्मक लगाव है या एक धार्मिक कर्तव्य?
शिया फ़िक़्ह में 'तवल्ला' और 'तबर्रा' केवल नैतिक सलाह नहीं हैं, बल्कि नमाज़ और रोज़े की तरह एक धार्मिक कर्तव्य हैं।
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भलाई में तुरंत अमल
इमाम मुहम्मद बाक़िर (अ) ने एक रिवायत में ईमान वालों को नेक कामों में जल्दी करने और उन्हें टालने से बचने की हिदायत दी है।
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मतभेद एक स्वाभाविक और वैज्ञानिक मामला; लेकिन सीमा क्या है?
मतभेद अपनी जगह एक स्वाभाविक और वैज्ञानिक मामला है और विभिन्न व्यक्तित्वों के राजनीतिक या प्रशासनिक फैसलों पर आलोचना भी की जा सकती है। हालाँकि यह बात अत्यंत खेदजनक है कि कभी-कभी सोशल मीडिया पर व्यक्तित्वों के खिलाफ ऐसे संगठित प्रचार अभियान चलाए जाते हैं जिनका आधार शोध, न्याय और ईमानदारी के बजाय अफवाहों, अतिशयोक्ति और बदनामी पर होता है।
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सदी के अज़ीम शहीद; सर्वोच्च नेता सैयद अली खामनेई
28 फरवरी को सर्वोच्च नेता ने अपने जाननिसार साथियों, उच्च सैन्य कमांडरों, अपने सम्मानित परिवार, संतान, बेटी, बहू और क्रांतिकारी साथियों के साथ शहादत का प्याला पिया; यह घटना इस्लाम के इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण अध्यायों और अविस्मरणीय स्मृतियों में गिनी जाती है।
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इमाम की मारफ़त क्यों ज़रूरी है?
सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि मारिफ़त से क्या मतलब है और इसके शाब्दिक अर्थ क्या हैं। इसके बाद यह बात स्पष्ट होगी कि हदीसों में मारिफ़त को इतनी अहमियत क्यों दी गई है और हमसे किस तरह की मारिफ़त मांगी गई है।
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इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम इंसानियत के अज़ीम इन्क़िलाबी रहनुमा
तारीख़ में बहुत से लोगों ने हालात बदलने की कोशिश की, लेकिन वाक़ए कर्बला और इमाम हुसैन (अ) का नाम वह इकलौती मिसाल है जिसने हर दौर के मज़लूमों और सच्चे लोगों को रास्ता दिखाया है। इमाम हुसैन (अ) की जंग कोई सियासी जंग या कुर्सी की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह ज़ुल्म , नाइंसाफ़ी और इंसान की हुरमत की पामाली के ख़िलाफ़ एक बहुत बड़ा इन्क़िलाब था।
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ख़िताबत का मापदंड!
ख़िताबत केवल बोलने का नाम नहीं, बल्कि दिलों को जगाने की कला है। एक खतीब की महानता उसकी ऊँची आवाज़ से नहीं आँकी जाती, बल्कि इस बात से कि उसके शब्द श्रोताओं के दिल और दिमाग़ में कितनी गहराई से उतरते हैं। वह केवल ज़ुबान से नहीं बोलता, बल्कि अपने ज्ञान, चिंतन, निष्ठा, चरित्र, गरिमा और तर्क के माध्यम से संवाद करता है।
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बुज़दिल मुसलमान; मुस्लिम उम्मत के शरीर पर एक बेमेल पैबंद
कमज़ोर और भयभीत मुसलमान न केवल क़ुरआन की दृष्टि में कोई विशेष स्थान नहीं रखता, बल्कि वह उस मूल "सत्कर्म" (अमल-ए-सालेह) की भी उपेक्षा करता है, जिसे क़ुरआन सत्य के विरोधियों को क्रोधित करने वाला कार्य बताता है, और इस प्रकार वह स्थायी घाटे के मार्ग पर चल पड़ता है।
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हे शहीद रहबर! हे राह-ए-हुसैन (अ) के मुसाफिर, अलविदा!
आज हमने अपनी आँखों के आँसुओं के साथ आपके पवित्र पार्थिव शरीर को आपकी अंतिम विश्रामस्थली के सुपुर्द कर दिया। लेकिन आपका चिंतन, आपका चरित्र, आपका संकल्प और आपका संदेश कभी मिट नहीं पाएगा।
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रिकॉर्ड साज़ जनाज़ा; दुश्मन चिराग़ बुझाने चला था, लेकिन रोशनी और बढ़ा गया!
इतिहास कभी-कभी ऐसे दृश्य भी देखता है जो केवल एक घटना नहीं होते, बल्कि एक पूरे युग की व्याख्या बन जाते हैं। कुछ जनाज़े केवल एक व्यक्ति के अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे एक विचार, एक सिद्धांत और एक आंदोलन के साथ करोड़ों लोगों के नए संकल्प की घोषणा बन जाते हैं। ऐसे आयोजन इतिहास के पन्नों में अपनी संख्या से अधिक अपने संदेश, प्रभाव और महत्व के कारण हमेशा जीवित रहते हैं।
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शहीद ख़ामनेई और इस्लामी विकास
शहीद आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामनेई के इस्लामी विकास के सिद्धांत पर आधारित इस लेख में स्पष्ट किया गया है कि वास्तविक विकास केवल भौतिक प्रगति का नाम नहीं है, बल्कि वह एक ऐसी व्यापक सभ्यतागत व्यवस्था है जो एकेश्वरवाद (तौहीद), न्याय, आध्यात्मिकता, आत्मनिर्भरता और औपनिवेशिक प्रभुत्व से स्वतंत्रता पर आधारित है। इस लेख में कर्बला और आशूरा के आंदोलन के प्रकाश में इस्लामी विकास के विभिन्न पहलुओं तथा शहीद नेता के वैचारिक और व्यावहारिक संघर्ष का विस्तार से वर्णन किया गया है।
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ला तम्हू ज़िक्रना…; तुम हमारा ज़िक्र कभी मिटा नहीं सकोगे!
इतिहास में दर्ज कुछ वाक्य केवल शब्द नहीं होते, वे युगों का निर्णय बन जाते हैं। वे किसी एक सभा के लिए नहीं कहे जाते, बल्कि आने वाली सदियों के विवेक को जगाने के लिए बोले जाते हैं। शाम (सीरिया) के दरबार में जनाबे ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा का यह संक्षिप्त, किंतु युगों तक गूंजने वाला उद्घोष भी ऐसा ही एक वाक्य था: "ला तम्हू ज़िक्रना… तुम हमारा उल्लेख कभी मिटा नहीं सकोगे।"
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शहीद रहबर की अंतिम यात्रा: ईरानी राष्ट्र की निष्ठा और मुस्लिम उम्मत की एकता का अभूतपूर्व प्रतीक
राष्ट्रों के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जो अपने जीवन से अधिक अपनी मृत्यु के बाद जीवित समाजों की जागरूकता, चेतना और सामूहिक प्रतिबद्धता का मानक बन जाते हैं। ऐसे नेताओं का निधन या शहादत केवल एक व्यक्ति का संसार से विदा होना नहीं होता, बल्कि एक विचारधारा, एक वैचारिक परंपरा और एक सामूहिक पहचान के पुनर्स्मरण और नवीनीकरण का कारण बनता है।
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नई पीढ़ी की शिक्षा और कर्बला का संदेश
कर्बला की घटना हमें यह शिक्षा देती है कि सत्य की सफलता संख्या, संसाधनों या बाहरी शक्ति पर निर्भर नहीं होती, बल्कि सच्ची नीयत, ईमान और दृढ़ता उसकी वास्तविक नींव होती है।
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आयतुल्लाहिल उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी; इल्म, मरजेईयत, दूरदृष्टि और दृढ़ता का एक उज्ज्वल अध्याय
शिया इतिहास में कुछ ऐसी महान हस्तियाँ हुई हैं जिनकी सेवाएँ केवल शिक्षा-दीक्षा, फ़िक़्ह, इज्तेहाद या धार्मिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने अपने चरित्र, दूरदृष्टि और निर्भीकता से पूरे युग की दिशा तय की। आयतुल्लाहिल उज़्मा हाजी मुल्ला अली कनी ऐसी ही विलक्षण विभूतियों में से एक थे, जिन्होंने तेरहवीं और चौदहवीं हिजरी शताब्दी में ईरान के धार्मिक, शैक्षिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन पर गहरा और स्थायी प्रभाव डाला।
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इमाम-ए-ज़माना के इंतज़ार से ज़ुहूर तक का सफर!
शब्दार्थ की दृष्टि से "इंतज़ार" का अर्थ किसी प्रिय के आने की आशा करना है, लेकिन अहल-ए-बैत के मत में इंतज़ार का अर्थ इससे कहीं अधिक व्यापक है। यह आशा के साथ ज़िम्मेदारी, प्रेम के साथ आज्ञापालन और दुआ के साथ कर्म का नाम है।
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शबीह साज़ी नहीं, इंसान साज़ी की ज़रूरत है
यह सवाल सिर्फ़ एक जुमला नहीं, बल्कि हमारे इज्तिमाई ज़मीर से किया जाने वाला एक संजीदा सवाल है। हम आख़िर कहाँ जा रहे हैं? हमारी मंज़िल क्या है? हम किस सिम्त गामज़न हैं? बनाम-ए-अकीदत, बनाम-ए-अज़ादारी और बनाम-ए-हुसैन (अ.) हम क्या कुछ कर रहे हैं, और क्या कुछ करना भूल चुके हैं?
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“ऐ कूफ़ा वालों! कूफ़ा रो रहा था…”
गलियाँ रो रही थीं, बाज़ार रो रहे थे, औरतें सीना पीट रही थीं, पुरुष सिर झुकाए खड़े थे, बच्चे सिसक रहे थे। लेकिन इतिहास का सबसे बड़ा सवाल यह था कि जब हुसैन (अ) ज़िंदा थे तो तुम कहाँ थे?
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जिम्मेदार राष्ट्र!
शहीद सुप्रीम लीडर आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनेई (र), मशहद मुकद्दस में इमाम अली इब्न मूसा रज़ा अलैहिस्सलाम के पवित्र आंगन में उस समय विश्राम के लिए गए, जब वे अपनी कौम और राष्ट्र को अपने संदेश और कार्यों के माध्यम से जागरूक, एकजुट, दृढ़ संकल्पित और उत्साहित कर चुके थे।
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शहीद रहबर: एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचारधारा थे
अत्याचारी ने सोचा था कि एक व्यक्ति को शहीद करके वह पूरी क़ौम के हौसले को कमजोर कर देगा, एक नेतृत्व को समाप्त करके एक राष्ट्र को बिखेर देगा और अपने शैतानी उद्देश्यों को पूरा करने का रास्ता साफ कर लेगा। उसे विश्वास था कि सुप्रीम लीडर के बिना प्रतिरोध समाप्त हो जाएगा, आशा के दीपक बुझ जाएँगे और उसकी बुरी राजनीतिक योजनाएँ वास्तविकता बन जाएँगी। लेकिन इतिहास ने एक बार फिर साबित कर दिया कि अत्याचार की शक्ति केवल शरीरों को समाप्त कर सकती है, जबकि सत्य की वास्तविक शक्ति विचारों, विश्वास और सिद्धांतों में छिपी होती है। शरीर नष्ट हो सकते हैं, लेकिन विचारों को कभी मारा नहीं जा सकता; रहबर विदा हो सकते हैं, लेकिन उनका संदेश जीवित रहता है और यही संदेश राष्ट्रों के संकल्प को नया जीवन देता है।