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क्या ट्रंप सच में ईरान की महानता चाहता हैं या उसके नेचुरल रिसोर्स को खत्म करना चाहता हैं?
यह मामला न तो किसी टेम्पररी बहस का नतीजा है और न ही ऊपरी पॉलिटिकल भावनाओं का, बल्कि इस ग्लोबल पॉलिटिकल सिस्टम को समझने की एक गंभीर दिमागी कोशिश है, जहाँ पावर, इंटरेस्ट और मोरैलिटी के दावे आपस में गुंथ गए हैं। जब कोई बड़ी ग्लोबल पावर किसी आत्मनिर्भर देश के लिए अच्छी नीयत और महानता के दावे करती है, तो समझदार लोगों के लिए यह ज़रूरी हो जाता है कि वे इन दावों को सिर्फ़ बोलने वाली बातों तक सीमित न रखें, बल्कि उन्हें प्रैक्टिकल पॉलिसी और ठोस फैसलों के क्राइटेरिया पर परखें।
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अमेरिका की हक़ीकत और असलियत; इमाम खुमैनी (र) की नज़र में
बेशक, हज़रत अयातुल्ला सय्यद रूहुल्लाह मूसवी खुमैनी (र) मुस्लिम उम्माह के एक प्रैक्टिकल धार्मिक विद्वान, बहुत समझदार और दूर की सोचने वाले, एक महान संत और लीडर, और बहुत दयालु और हमदर्द लीडर थे। वह असल में इस्लाम धर्म और अहले-बैत और आइम्मा (अ) की ज़िंदगी के सच्चे मानने वाले और एक आज्ञाकारी और आज्ञाकारी मानने वाले थे।
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ईरान की हालिया घटनाओ में क्या हुआ?
हौज़ा / ईरान की जदीद तारीख़ में अगर कोई चीज़ तवातुर के साथ नज़र आती है, तो वो दहशतगर्दी के वाक़िआत हैं ऐसे वाक़िआत जिनमें आम शहरी, पढ़ा-लिखा तबक़ा, उलेमा, साइंसदान, दानिश्वर और रियासती ज़िम्मेदारान को मुनज़्ज़म अंदाज़ में निशाना बनाया गया। यह तमाम वाक़िआत क़त्ल-ए-आम नहीं थे, बल्कि टार्गेटेड दहशतगर्दी थी, जिसका मक़सद ईरान और उसके समाज को ख़ौफ़, अदम-ए-इस्तेहकाम और फ़िक्री मफ़लूजी की तरफ़ धकेलना था।
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ताली, ढोल या सलावत; धार्मिक खुशी का सही पैमाना क्या है?
धार्मिक सभाओं में ताली, ढोल बजाना, शोर और हंगामा और ऐसी हरकतें जिनसे सभा खून-खराबे और खेल जैसी लगे, शरियत की भावना के खिलाफ हैं और हमारे फ़ुक़्हा ने खुद इन मामलों से बचने पर ज़ोर दिया है। पवित्र पैगंबर (स) की हदीस का मतलब यह है कि जो ढोल बजाते हैं वे अंधे, गूंगे और बहरे होकर महशर के मैदान में उतरेंगे।
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आदर्श समाज की ओर (इमाम महदी अलैहिस्सलाम से संबंधित श्रृंखला) भाग - 61
पश्चिम और महदीवाद (भाग - 1)
मुक्तिदाता के आने और न्याय के प्रसार, ज़ुल्म के खिलाफ़, आदि जैसी विशेषताओ के बीच के संबंध ने हर धर्म के लोगों को हमेशा अपने मुक्तिदाता के आने में रूचि रखने पर मजबूर किया है। ज़ाहिर है, मुक्तिदाता के आने में रूचि और जोश कई कारणो से है। इनमें से, मीडिया सबसे प्रभावित कारणो में से एक है जो इस जोश और रूचि को बनाने में अहम भूमिका निभाता है।
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शरई अहकाम । ज्ञान प्राप्त करने में आलस और समय बर्बाद करने का हुक्म
समय अल्लाह की खास नेमत और कीमती पूँजी है। इसलिए, ज्ञान प्राप्त करने में आलस और समय बर्बाद करना किसी मोमिन की निशानी नहीं है।
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क्या युद्ध की उम्मीद है?
हौज़ा/इतने सारे देशद्रोह के बाद भी, इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान का लोहे की दीवार का विरोध और अमेरिका के लिए उसकी नफ़रत, ईरानी सरकार और अमेरिका के क्षेत्रीय हितों के बीच टकराव ने यह संभावना बढ़ा दी है कि दोनों के बीच टकराव का नेचर अब सिर्फ़ डिप्लोमैटिक या इकोनॉमिक नहीं रहेगा, बल्कि इसके मिलिट्री पहलू भी अहम हो सकते हैं।
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क्या वास्तव में युद्ध होने वाला है?
हौज़ा/ दुनिया भर में चिंता, परेशानी और खतरे की मौजूदा हालत ने मन में एक अजीब सा डर पैदा कर दिया है। ऐसा लगता है जैसे दुनिया एक अहम मोड़ पर है, और थोड़ी सी चूक इसे एक बड़े झगड़े की ओर धकेल सकती है। मिलिट्री मूवमेंट की बहुत ज़्यादा तेज़ी, जंग के बारे में तीखी बातें, और मीडिया में लगातार कमेंट्री की बाढ़—ये सब मिलकर ऐसा इंप्रेशन बनाते हैं कि जंग अब कोई दूर की बात नहीं बल्कि एक सच्चाई है जो किसी भी पल सामने आ सकती है।
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जब अल्लाह जीविका देता है, तो इंसान मज़दूरी क्यों तय करता है?
हौज़ा/तौहीद के नज़रिए से, अल्लाह ही असली देने वाला है और इंसान सिर्फ़ जीविका देने का एक माध्यम है। इंसानों को जीविका देना अल्लाह की मर्ज़ी पर है, उससे अलग और आज़ाद नहीं। इस बात को समझने से इंसान के दिल में भरोसा भी पैदा होता है और मेहनत, ज़िम्मेदारी और फ़र्ज़ का एहसास मतलब का बनता है।
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बच्चों के धार्मिक प्रशिक्षण के सुनहरे उसूल
हौज़ा / दीनी तरबीयत वास्तव में केवल उपदेश से शुरू नहीं होती, बल्कि माता-पिता के व्यावहारिक उदाहरण बनने और धर्म को विवेक, भावनाओं और दैनिक जीवन से जोड़ने के माध्यम से विकसित होती है।
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इमाम सज्जाद (अ) की माता के संबंध में दो ज़रूरी सवाल
हौज़ा / प्राचीन काल के सोर्सो में इमाम सज्जाद (अ) की माता का नाम शाहरबानू या शाह ज़ानन बताया गया है; हालाँकि, यह भी कहा जाता है कि इमाम (अ) के जन्म के समय ही उनकी मौत हो गई थी, जिसका मतलब है कि इमाम सज्जाद (अ) ने अपनी माता को नहीं देखा था।
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दरस-ए-अख़लाक़ :
अल्लाह की राह में ख़र्च करना बुनियादी उसूल है
हौज़ा / धन संपत्ति इकट्ठा करना और अल्लाह की राह में ख़र्च न करना, मूल्यों के ख़िलाफ़, एक गुनाह और शायद महापाप है।
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क्या 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति के पीछे फ्रांस का हाथ था?
हौज़ा/ ज़्यादातर कम पढ़े-लिखे, बिना रिसर्च के ऊपरी बातें करने वाले और इतिहास से अनजान लोग यह कहते हुए देखे जा सकते हैं कि ईरान की इस्लामिक क्रांति (कुछ के अनुसार, खोमैनी क्रांति) के पीछे फ्रांस का हाथ था। उनका तर्क है कि इमाम खोमैनी ने फ्रांस में क्रांति करवाई थी और वहीं से वह ईरान आए थे। इसके सबूत के तौर पर, आमतौर पर यह तस्वीर दिखाई जाती है जिसमें आप एयर फ्रांस के प्लेन से तेहरान लौट रहे होते हैं और प्लेन का फ्रेंच कैप्टन आपको सपोर्ट कर रहा होता है।
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आज के ज़माने की पढ़ाई से जुड़ी चुनौतियाँ और इस्लामिक शिक्षाओं का समाधान
हौज़ा / एजुकेशन किसी भी समाज के फ़िकरी, नैतिक और संस्कृति बनने का मेन पिलर है। आज के ज़माने में, जहाँ साइंटिफिक तरक्की, टेक्नोलॉजी और ग्लोबलाइज़ेशन ने एजुकेशन के लिए नई पॉसिबिलिटीज़ पैदा की हैं, वहीं कई फ़िकरी, नैतिक और सोशल चैलेंज भी पैदा हुए हैं। हालाँकि मॉडर्न एजुकेशन सिस्टम बहुत सारी जानकारी देता है, लेकिन कैरेक्टर बनाने, स्पिरिचुअल ट्रेनिंग और मोरल बैलेंस की बहुत कमी है।
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निसंदेङ, झूठ खत्म होने वाला ही है!
हौज़ा / इंसानी इतिहास का एक पक्का उसूल है कि झूठ कुछ समय के लिए शोर मचा सकता है, लेकिन वह कमज़ोर, खोखला और आखिर में अपनी फितरत में हार जाता है। कुरान की यह घोषणा केवल एक नैतिक सलाह नहीं है, बल्कि इतिहास का एक जीता-जागता कानून है। यही कानून हमें आज के दौर में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ ईरान के संघर्ष में पूरी ताकत से काम करता हुआ लगता है।
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शांति का लबादा और युद्ध की पुश्तपनाही; इज़राइल के लिए अमेरिकी पालिसीयो को तज़ाद
हौज़ा / वह बयानिया जिसके अंर्तगत अमेरिका स्वंय को केवल इज़राइल की सलामति को गारंटर और एक मुतावाज़िन शांति का ध्वजधारक व्यक्त करता है। कई समीक्षाकर्ताओ ने मानवधिकार के संगठनो और राजनीतिक विश्लेषको की ओर से कड़ी निंदा का निशाना बनाया जा रहा है। निंदा कर्ताओ के नज़दीक यह सिफारति लबादा हक़ीक़त मे उन गहरई और नियोजित पालीसीयो को छुपाने का प्रयास है जो इजराईल की विरोधाभासी गतिविधियो विशेषरूप से अधिकृत क्षेत्रओ मे कॉलोनीयो के विस्तार और फ़ौजी कार्रवाईयो को मज़बूत करती है।
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जो बच्चा अपने पिता से प्यार नहीं करता, वह पिता के दीन से भी प्यार नहीं कर सकता
हौज़ा / पिता को अपनी संतान का पहला दोस्त होना चाहिए उस पिता की दुर्भाग्य है जो अपने बच्चे का दूसरा दोस्त हो। क्या आप जानते हैं कि यह बच्चा क्या करता है? जो कुछ भी वह अपने पिता से सुनता है, वह अपने पहले दोस्त के पास ले जाता है। अगर उस दोस्त ने इसकी पुष्टि कर दी तो वह मान जाता है, नहीं तो नहीं मानता।
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दूसरे धर्मो में इमाम हुसैन अ.स.का सम्मान
हौज़ा / अमेरिका के मशहूर इतिहासकार एप्रोनिक वाशिंग्टन से लिखता है कि: इमाम हुसैन अ.स. यज़ीद के सामने झुक कर अपनी जान को बचा सकते थे, लेकिन इमामत की ज़िम्मेदारी इजाज़त नहीं दे रही थी कि आप यज़ीद जैसे इंसान को ख़लीफ़ा मानें, उन्होंने इस्लाम को बनी उमय्या के चंगुल से नजात दिलाने के लिए हर तरह की कठिनाइयों और मुश्किलों को हंसी ख़ुशी क़बूल कर लिया, चिलचिलाती धूप में तपते हुए जंगल में हुसैन ने हमेशा बाक़ी रहने वाली ज़िंदगी ख़रीद ली,
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इस पुत्र का नाम हारून (अ) के पुत्र के नाम पर रखें
हौज़ा / जब हज़रत अबा अब्दिल्लाहिल हुसैन (अ) का नाम रखा जा रहा था, जिब्राईल अमीन नाज़िल हुए और कहाः ऐ मोहम्मद (स) अल्लाह तआला आपको सलाम कहता है और फ़रमाता हैः अली आपके लिए वही स्थान रखते है जो हारून ने मूसा के लिए रखा था। इसलिए अपने इस पुत्र का नाम हारून के पुत्र के नाम पर रखें। रसूल अल्लाह (स) ने पूछाः हारून के पुत्र का नाम क्या था जिब्राईल ने उत्तर दिया शब्बीर फ़िर रसूल अल्लाह (स) ने फ़रमाया मेरी भाषा अरबी है इस पर जिब्राईल ने कहा फ़िर इसका नाम हुसैन रखें (जोकि शब्बीर का अरबी पर्चायवाची है)
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हज़रत यूनुस अलैहिस सलाम कितनी अवधि तक मछली के पेट मे रहे?
हौज़ा / हज़रत यूनुस की कहानी एक ऐसी अध्यात्मिक यात्रा की कहानी है जो अल्लाह के संदेश से आरम्भ होकर एक अचम्भित परिक्षा तक पहुंचती है, जो ईमान, पश्चातप और अल्लाह की हिकमत के गहरे हक़ाइक़ को व्यक्त करती है।
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इमाम ख़ुमैनी रह:
मुनाजात ए शाअबानिय्या तमाम आईम्मा (अ) की मुनाजात है
हौज़ा / इमाम ख़ुमैनी रह. जो स्वयं एक कामिल आरिफ की उत्तम मिसाल थे और जिन्होंने अपने नफ़्स को दुनिया की विनाशकारी चीज़ों से बाहर खींच लिया था, विभिन्न अवसरों पर आम लोगों और ज़िम्मेदार व्यक्तियों से मुलाकातों में वे उन्हें दुआ पढ़ने और आईम्मा अ.स. (अ.स.) से मन्कूल दुआओं में गहन चिंतन मनन करने की प्रेरणा दिया करते थे।
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ईरान की वर्तमान स्थिति और छात्रों का जिहाद ए तबईन एवं समाज में आशा पैदा करने में रहनुमा किरदार
हौज़ा / एक दीनी और क्रांतिकारी छात्र होने के नाते, जागरूक और जिम्मेदार पीढ़ी के रूप में, जिहाद ए तब्यीन धार्मिक और राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने और समाज में आशा पैदा करने में अग्रणी भूमिका निभानी चाहिए। यह संघर्ष न केवल आज की स्थिति को बदलने के लिए, बल्कि एक स्वतंत्र, न्यायपूर्ण और स्वायत्त भविष्य को सुनिश्चित करने के लिए अत्यंत आवश्यक है।
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आकाश से स्टार लिंक तक / सुन्नी छात्र का विचारत्मक लेख
हौज़ा / हाल के वर्षो मे हमने देखा कि जब उपनिवेशवाद ने ईरान के आंतरिक इस्तेहकाम को नुकसान पहुचाने के लिए ऐलन मस्क की स्टार लिंक सैटेलाइट का सहारा लिया तो जाहिरी रूप से लखता था कि धरती पर मौजूद कोई भी शक्ति खला से आने वाले इस डीजिटल सैलाब को नही रोक सकेगी।
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रजब महीने के अंतिम क्षणो मे बेहतरीन अमल
हौज़ा / रजब का महीना हर दौर और हर ज़माने मे बहुत ही क़द्र और मंज़ीलत का हामिल रहा है। इस महीने अल्लाह के औलिया ने अल्लाह से अपना संबंध मजबूत किया, लेकिन हमने क्या किया ? हमे दुआ करनी चाहिए कि हे अल्लाह हमे अपने औलिया की विशष ध्यान नसीब फ़रमा और अपने खालिस लुत्फ और करम से नवाज। हमे उन रहमतो और मगफ़िरतो से वंचित मत कर जो तूने इस महीने मे अपने औलिया को प्रदान की।
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आदर्श समाज की ओर (इमाम महदी अलैहिस्सलाम से संबंधित श्रृंखला) भाग - 60
गलत सोच के परिणामो मे मुकाबला कैसे करें ?
हौज़ा/ धार्मिक शिक्षाओं के प्रति बहुत ज़्यादा दुश्मनी के बावजूद, महदीवाद पर विश्वास और ध्यान दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। बौद्धिक और भावनात्मक क्षेत्रों में बढ़ती दिलचस्पी और ज़रूरत की भावना, जबकि एक बहुत अच्छी बात है, इसने असली और गहरी शिक्षाओं के साथ-साथ गलत सोच को भी सामने ला दिया है, और कुछ क्षणो के लिए वे कुछ भोले या पक्षपाती लोगों को आकर्षित करती हैं।
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दरस-ए-अख़लाक़:
ग़फ़लत से बाहर आना अल्लाह की रज़ामंदी हासिल करने की पहली सीढ़ी
हौज़ा / हम इंसानों की मुश्किल यह है कि हम अपनी ग़लतियों को भुला देते हैं। सुधार के लिए ज़रूरी मामलों की ओर से लापरवाही, अपने भीतर सुधार की ओर से लापरवाही है अगर ये लापरवाहियां ख़त्म हो जाएं और इरादा वजूद में आ जाए तो हर चीज़ में सुधार हो जाता है।
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पैग़म्बर (स) की बेसत का पहला तोहफ़ा
हौज़ा / एक इंसान की ज़िन्दगी का राज़ यही है,कि वह हर वक्त फ़र्ज़ की ओर ध्यान दें, ग़ैबी आवाज़ का इंतेज़ार और नज़र न आने वाले हाकिम, सर्वशक्तिमान, इख़्तियार रखने वाले, वजूद के हुक्म पर ध्यान देना, यह अस्ल विषय है और इसको क़ुरआन ने ग़ैब पर ईमान कहा हैं।
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हज़रत रसूल अल्लाह (स) की बेसत का मक़सद
हौज़ा / पैग़म्बरे इस्लाम की बेसत का सबसे अहम मक़सद लोगों को हिदायत का रास्ता दिखाना, जिस से लोगों को असली सुख, सफ़लता और निजात प्राप्त हो सके।