हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , दफ़्तर ए नुमाइंदगी आयतुल्लाहिल उज़्मा सैयद अली हुसैनी सिस्तानी, लखनऊ में जारी अशरे ए मजलिस-ए-अज़ा को संबोधित करते हुए आयतुल्लाह सिस्तानी के प्रतिनिधि हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन मौलाना सैयद अशरफ़ अली अल-ग़रवी ने कहा कि अल्लाह तआला ने इंसान को अक्ल जैसी महान नेमत प्रदान की है, ताकि वह अपनी ज़िंदगी को इलाही शिक्षाओं के अनुसार व्यवस्थित करे और नफ़्सानी ख़्वाहिशों की अंधी पैरवी से बच सके।
उन्होंने कहा कि क़यामत के दिन इंसान की सज़ा और जज़ा का आधार भी अक्ल का सही इस्तेमाल और उसकी रहनुमाई में अपनाई गई जीवन-शैली होगी। जो व्यक्ति अक्ल का अनुसरण करता है, वह फ़रिश्तों से भी ऊँचा मुक़ाम हासिल कर सकता है, जबकि अक्ल से मुंह मोड़ने वाला जानवरों से भी बदतर बन जाता है।
मौलाना ग़रवी ने विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि रहबानियत इंसान को वास्तविक अमन, सुकून और सुरक्षा नहीं दे सकती, क्योंकि अल्लाह ने इंसान को सामाजिक जीवन के लिए पैदा किया है।
उन्होंने कहा कि चाहे बादशाही व्यवस्था हो या लोकतांत्रिक व्यवस्था, दोनों ही इंसानियत की समस्याओं का पूर्ण और स्थायी समाधान देने में असफल रही हैं। यदि ऐसा न होता, तो लोगों को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों पर बाद में पछताना न पड़ता।
उन्होंने कहा कि केवल निज़ाम-ए-मुस्तफ़ा स.ल.ही ऐसा न्यायपूर्ण और व्यापक व्यवस्था है, जो इंसानियत को वास्तविक सफलता तक पहुंचा सकती है, जहाँ रंग, नस्ल, भाषा, धन और वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होता और सभी इंसानों को बराबर समझा जाता है।
उन्होंने नमाज़-ए-जमाअत की मिसाल देते हुए कहा कि इस्लाम ने अमीर-ग़रीब, गोरे-काले सभी को एक ही सफ़ में खड़ा करके मानवीय समानता का व्यावहारिक नमूना पेश किया है।
मौलाना ग़रवी ने हज़रत अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ.स.) के दौर-ए-हुकूमत का एक ऐतिहासिक वाक़िआ बयान करते हुए कहा कि जब एक यहूदी के साथ ज़िरह के मामले में विवाद अदालत तक पहुँचा, तो क़ाज़ी ने इमाम अली (अ.स.) को “अमीरुल मोमिनीन” कहकर संबोधित किया। इस पर इमाम अली (अ.) ने फ़रमाया कि अदालत में दोनों पक्षों के बीच किसी प्रकार का भेदभाव नहीं होना चाहिए और दोनों को समान दर्जा दिया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि पैग़म्बर-ए-अकरम हज़रत मुहम्मद (स.ल.) और इमाम अली (अ.ल) ने दुनिया को न्याय और इंसाफ़ का ऐसा व्यावहारिक निज़ाम दिया, जिसमें क़ानून की नज़र में सभी बराबर थे।
उन्होंने आगे कहा कि जो व्यक्ति और क़ौमें नबवी और अलवी जीवन-व्यवस्था का अनुसरण करती हैं, वे ज़ुल्म और तानाशाही के सामने न झुकती हैं और न ही अपने सिद्धांतों का सौदा करती हैं।इसी संदर्भ में उन्होंने इस्लामी जगत की महान धार्मिक हस्तियों की दृढ़ता का उल्लेख करते हुए कहा कि रहबर-ए-मुआज़्ज़म आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई ने हमेशा हक़, इंसाफ़ और मज़लूमों की हिमायत का परचम बुलंद रखा है।
उन्होंने शहादत को स्वीकार कर लिया, लेकिन अत्याचार और साम्राज्यवाद के सामने झुकना स्वीकार नहीं किया।
मौलाना सैयद अशरफ़ अली अल-ग़रवी ने आयतुल्लाहिल-उज़्मा सैयद अली हुसैनी सिस्तानी के ऐतिहासिक फ़तवे का भी उल्लेख किया और कहा कि इस दूरदर्शी कदम ने आतंकवादी संगठन ISIS के ख़िलाफ़ संघर्ष में निर्णायक भूमिका निभाई और बहुत कम समय में इस फ़ितने के अंत का मार्ग प्रशस्त किया।
आपकी टिप्पणी