हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान स्थित भारतीय दूतावास ने ‘स्वस्थ भविष्य के लिए आयुर्वेद’ के शीर्षक से राष्ट्रीय आयुर्वेद दिवस के अवसर पर एक कार्यक्रम आयोजित किया। इस कार्यक्रम में राजनयिकों, डॉक्टरों, मीडिया प्रतिनिधियों और पारंपरिक चिकित्सा में रुचि रखने वाले लोगों ने भाग लिया।
ईरान में भारत के राजदूत विश्वेश नेगी ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आयुर्वेद दिवस मनाने का उद्देश्य भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद के बारे में दुनिया को जानकारी देना और स्वास्थ्य के क्षेत्र में इसके महत्व को उजागर करना है। उन्होंने बताया कि भारत सरकार ने वर्ष 2016 में आयुर्वेद दिवस मनाने की शुरुआत की थी। इसका उद्देश्य बीमारियों से बचाव, स्वस्थ जीवनशैली और प्राकृतिक उपचार पद्धतियों के बारे में जागरूकता पैदा करना है।
भारतीय राजदूत ने ईरान और भारत के बीच पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में बढ़ते सहयोग का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत के आयुष मंत्रालय और ईरान के स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्रालय के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हो चुके हैं। इसका उद्देश्य औषधीय पौधों, पारंपरिक उपचार और दोनों देशों की साझा चिकित्सा विरासत से जुड़े क्षेत्रों में आपसी सहयोग को बढ़ावा देना है।
विश्वेश नेगी ने कहा कि पिछले एक दशक के दौरान आयुर्वेद के क्षेत्र में उल्लेखनीय आर्थिक विकास हुआ है। उनके अनुसार, वर्ष 2014 में आयुर्वेद से जुड़ी अर्थव्यवस्था 2.85 अरब डॉलर की थी, जो वर्ष 2023 में बढ़कर 43.4 अरब डॉलर हो गई।
उन्होंने जुलाई 2026 में नीति आयोग द्वारा जारी ‘आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए रणनीतिक रोडमैप’ का भी उल्लेख किया। इस योजना में शोध, शिक्षा, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और गुणवत्ता के क्षेत्र में आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर बढ़ावा देने के लिए विभिन्न उपाय सुझाए गए हैं।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए ईरान में इटली की राजदूत पाओला अमादेई ने भारत की अपनी यात्राओं के अनुभव साझा किए और भारत की संस्कृति तथा पारंपरिक चिकित्सा विरासत, विशेष रूप से आयुर्वेद, पर चर्चा की।
फारसी चिकित्सा के विशेषज्ञ डॉ. अली रज़ा यारगोली ने फारसी चिकित्सा और आयुर्वेद के बीच ऐतिहासिक और सैद्धांतिक समानताओं पर प्रकाश डाला। उन्होंने दोनों चिकित्सा पद्धतियों के बीच ऐतिहासिक संबंधों, साझा अवधारणाओं, शोध और भविष्य में सहयोग की संभावनाओं की समीक्षा की।
ईरानी स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मंत्रालय के ईरानी और पूरक चिकित्सा केंद्र के अंतरराष्ट्रीय मामलों के सलाहकार डॉ. अरमान ज़रगरान ने भी ईरान और भारत के बीच पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में सहयोग पर चर्चा की। उन्होंने दोनों देशों के बीच हुए समझौते और जारी संयुक्त गतिविधियों का उल्लेख किया।
डॉ. सोहराब देहक़ान ने भारत में आयुर्वेद के संबंध में अपनी शिक्षा और अध्ययन, इस चिकित्सा पद्धति के मूल सिद्धांतों और अपने अनुभवों के बारे में जानकारी दी।
वक्ताओं ने स्पष्ट किया कि आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा के विकल्प या उसके विरोध के रूप में पेश करने के बजाय एक पारंपरिक चिकित्सा पद्धति के रूप में देखा जाता है, जिसमें बीमारियों से बचाव, दैनिक जीवन की दिनचर्या, पाचन तंत्र, नींद और शरीर तथा मन के बीच संतुलन पर ध्यान दिया जाता है।
आयुर्वेद संस्कृत के दो शब्दों ‘आयुर’ और ‘वेद’ से बना है, जिनका अर्थ क्रमशः ‘जीवन’ और ‘ज्ञान’ है। यह भारत में हजारों वर्ष पहले विकसित हुई एक पारंपरिक चिकित्सा पद्धति है, जिसका उद्देश्य स्वस्थ लोगों के स्वास्थ्य को बनाए रखना और बीमारियों से राहत के लिए उपचार प्रदान करना है।

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