हौज़ा / शाम की वह सियाह रात थी जिसमें तारीकी भी ग़म-ए-अहले बैत अलैहिमुस्सलाम पर अश्कबार महसूस होती थी। खंडहरात की टूटी हुई दीवारें, ज़ंजीरों की झंकार, यतीम बच्चों की सिसकियाँ और बीबियों की दबीज़…