हज़रत इमाम हुसैन (अ.) को हज़रत सकीना (स.अ.) से बेहद मोहब्बत थी। यह मोहब्बत सिर्फ़ एक बाप की फ़ितरी शफ़क़त नहीं थी, बल्कि रूहानी उन्स, क़ल्बी वाबस्तगी और अहल-ए-बैत (अ.) के पाकीज़ा ख़ानदानी माहौल…
हौज़ा / शाम की वह सियाह रात थी जिसमें तारीकी भी ग़म-ए-अहले बैत अलैहिमुस्सलाम पर अश्कबार महसूस होती थी। खंडहरात की टूटी हुई दीवारें, ज़ंजीरों की झंकार, यतीम बच्चों की सिसकियाँ और बीबियों की दबीज़…