हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , यमनी पत्रकार और अलमसीरा चैनल के विश्लेषक अहमद अब्दुलवहाब अलशामी ने कहा कि हिज़्बुल्लाह को निरस्त्र करने की कोशिश वास्तव में 'ग्रेटर इज़राइल' की खतरनाक ज़ायोनी योजना को लागू करने का हिस्सा है।
उन्होंने सूरह अननिसा की आयत 102 का हवाला देते हुए कहा,काफिर चाहते हैं कि तुम अपने हथियारों और सामान से लापरवाह हो जाओ ताकि वे अचानक तुम पर टूट पड़ें। दुश्मन इसी मौके का इंतजार कर रहा है कि हिज़्बुल्लाह को हथियारों से वंचित करके लेबनान और क्षेत्र पर वर्चस्व हासिल कर सके।
उन्होंने आगे कहा कि दुश्मन चाहता है कि लेबनान में प्रतिरोध को निरस्त्र कर दिया जाए। इस साजिश के पीछे अमेरिका और ज़ायोनी सरकार हैं। उनका मकसद है कि हिज़्बुल्लाह को कमजोर करके लेबनान और पूरे क्षेत्र पर अपना कायम करें।
अलशामी ने कहा कि प्रतिरोध के हथियारों की बदौलत साल 2000 में दक्षिणी लेबनान को आजादी मिली और यही वह हथियार हैं जिन्होंने 2006 में ज़ायोनी सेना का डटकर मुकाबला किया। इसलिए हिज़्बुल्लाह को निरस्त्र करने की हर कोशिश वास्तव में 'ग्रेटर इज़राइल' की योजना का रास्ता साफ करने के लिए है।
यमनी विश्लेषक ने कहा कि अमेरिका और इज़राइल को उन हथियारों पर आपत्ति नहीं है जो उनके अपने कब्जे में हैं, बल्कि वे उन हथियारों से परेशान हैं जो आजाद इंसानों और सम्मानित मुजाहिदीन के पास हैं। यही हथियार वास्तविक शांति का साधन बनते हैं। दुश्मन इनसे डरता है क्योंकि ये उसकी आक्रामकता और वर्चस्व की राह में दीवार हैं।
अहमद अब्दुलवहाब अल-शामी के मुताबिक, हिज़्बुल्लाह के हथियार सिर्फ एक सैन्य ताकत नहीं बल्कि राष्ट्रीय अस्तित्व का प्रतीक हैं। अगर ये हथियार छीन लिए गए तो दुश्मन आगे बढ़ेगा और अगर ये बने रहे तो दुश्मन के गंदे मंसूबों की राह में रुकावट बनेंगे।
उन्होंने आगे कहा कि यमन का मानना है कि हिज़्बुल्लाह के हथियार सिर्फ लेबनान के नहीं बल्कि पूरी मुस्लिम उम्माह के हथियार हैं। ये सम्मान और शालीनता का प्रतीक हैं।
हिज़्बुल्लाह ने 2000 और 2006 में मुस्लिम उम्माह की इज्जत बचाई। आज पूरी इस्लामी उम्माह पर यह फर्ज बनता है कि वह प्रतिरोध और उसके हथियारों का समर्थन करे और उसकी रक्षा करे।
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