हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आयतुल्लाह सईदी ने वज़ारत-ए-दिफ़ा से जुड़े एक इदारे के कर्मचारियों से मुलाक़ात के दौरान कहा कि इस्लामी इंक़िलाब के बाद के हालात को देखते हुए यह साफ़ है कि दुश्मन अपनी ग़लत सोच और गलत तरीक़े की वजह से मुजाहिद और सरफ़राज़ ईरानी क़ौम की हक़ीक़त को समझ नहीं पा रहा है।
उन्होंने कहा कि दुश्मन यह नहीं समझता कि ईरानी अवाम ने वली-ए-ख़ुदा और इमाम-ए-ज़मान (अ.) के हक़ीक़ी नायब की क़ियादत में क़ियाम किया, इस इंक़िलाब और निज़ाम की हिफ़ाज़त के लिए बे-शुमार क़ुर्बानियाँ दीं, और आज भी पूरी इस्तेक़ामत के साथ उस पर क़ायम हैं।
आयतुल्लाह सईदी ने इस्लामी इंक़िलाब को एक शजर-ए-तैय्यबा (पाक दरख़्त) बताया और कहा कि यह दरख़्त दिन-ब-दिन ज़्यादा फलदार हो रहा है और आज इसका साया पूरे इलाक़े पर फैल चुका है।
मुतवल्ली-ए-हरम ने ज़ोर देकर कहा कि ईरान महाज़-ए-हक़ की नुमाइंदगी करता है, जबकि उसके दुश्मन महाज़-ए-बातिल से ताल्लुक़ रखते हैं। महाज़-ए-हक़ को वह नेअमत हासिल है जो बातिल के पास नहीं यानी अल्लाह की मदद और साथ। उन्होंने हज़रत मूसा और हज़रत इब्राहीम (अ.स.) की मिसाल देते हुए कहा कि तारीख़ में अंबिया-ए-इलाही को भी फ़िरऔन और नमरूद जैसे ज़ालिमों का सामना करना पड़ा, लेकिन आख़िरकार फ़तह हक़ ही हुई।
आयतुल्लाह सईदी ने कहा कि रहबर-ए-मुअज़्ज़म और मुल्क के ज़िम्मेदार हक़ की बात दुनिया की ताक़तों, ख़ास तौर पर अमरीका के सदर डोनाल्ड ट्रंप, तक पहुँचाने की कोशिश करते हैं, लेकिन वे भी फ़िरऔन और नमरूद की तरह हक़ को समझने से क़ासिर रहते हैं। उन्होंने कहा कि अल्लाह दुश्मनों को मोहलत देता है यह मोहलत कुछ लोगों के लिए तौबा और रुजू का ज़रिया बनती है, और कुछ के लिए और ज़्यादा गुमराही और ज़ुल्म का रास्ता खोल देता है।
आख़िर में उन्होंने कहा कि शोहदा ज़िंदा हैं और दीन-ए-ख़ुदा की मदद कर रहे हैं। अगर समाज में तक़वा-ए-इलाही को बुनियाद बनाया जाए और अहले-बैत (अ.स.) और शोहदा से तवस्सुल किया जाए, तो फ़र्द और समाज दोनों फ़िक्री और अमली तरक़्क़ी और बरकत का मुशाहिदा करेंगे।
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