हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,प्रमुख,जामिया इमाम जाफर सादिक अ.स.मौलाना सैयद सफदर हुसैन ज़ैदी ने कहां,आयतुललाह खामनेई प्रतिरोध के वैचारिक और व्यावहारिक शिल्पकार:आज के मध्य पूर्व Middle East में इस्लामी क्रांति के नेता आयतुल्लाहिल सैयद अली खामनेई का कुशल नेतृत्व एक मजबूत स्तंभ और निश्चित जीत के संदेश के साथ डटा हुआ है।
उन्होंने 'प्रतिरोध' Resistanceको केवल एक भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय एक 'सच्चे सिद्धांत' का रूप दे दिया और डर के बुतों को चकनाचूर कर दिया। उन्होंने मुस्लिम उम्मत को यह विश्वास दिलाया कि अमेरिका और इज़राइल की शक्ति अजेय नहीं है।
उनके नेतृत्व में ईरान 'रणनीतिक धैर्य' Strategic Patience से बाहर निकलकर सीधी जवाबी कार्रवाई के चरण में पहुँचा, जिसने दुश्मन के दबदबे को मिट्टी में मिला दिया।
इस्लामी एकता और जनप्रतिरोध।
उनकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि उन्होंने प्रतिरोध को सांप्रदायिकता sectarianism से अलग कर दिया। आज फिलिस्तीन के सुन्नी संगठन और लेबनान व इराक के शिया संगठन एक ही उद्देश्य के लिए एकजुट हैं, जो रहबर-ए-मुअज्जम के विजन का परिणाम है।
इज़राइल और उसके संरक्षक अमेरिका की सबसे बड़ी हार यह है कि वे आधुनिकतम तकनीक के बावजूद प्रतिरोध आंदोलनों के इरादों को तोड़ने में विफल रहा है। महीनों की भारी बमबारी के बाद भी इज़राइल हमास को खत्म करने या उसे निहत्था करने में नाकाम रहा, जो उसके सैन्य इतिहास की सबसे बड़ी विफलता है।
वैश्विक अलगाव और साम्राज्यवाद का आंतरिक संकट:
आज अमेरिका और इज़राइल न केवल युद्ध के मैदान में, बल्कि नैतिक मोर्चे पर भी हार चुके हैं। दुनिया भर की राजधानियों में होने वाले विरोध प्रदर्शन इस बात का प्रमाण हैं कि "मजलूमियत और दृढ़ता" के विमर्श (Narrative) ने पश्चिमी दुष्प्रचार को मात दे दी है।
इज़राइल आज वैश्विक स्तर पर जितना अकेला है, इतिहास में कभी न था। अंतरराष्ट्रीय अदालतों में युद्ध अपराधों के मामले उसकी नैतिक हार पर मुहर लगा रहे हैं। जहाँ एक ओर इज़राइल की अर्थव्यवस्था युद्ध के बोझ तले दबी है, वहीं ईरान ने प्रतिबंधों के बावजूद अपनी रक्षात्मक और वैज्ञानिक प्रगति को बनाए रखकर दुनिया को हैरान कर दिया है।
निष्कर्ष यह है कि वर्तमान परिस्थितियाँ इस वास्तविकता को दर्शाती हैं कि इस्लामी प्रतिरोध की जीत हुई है और साम्राज्यवादी ताकतें पीछे हटने पर मजबूर हैं। आयतुल्लाह खामनेई की दूरदर्शिता और प्रतिरोध बलों के अटूट बलिदानों ने यह साबित कर दिया है कि अब मध्य पूर्व के फैसले वाशिंगटन या तेल अवीव में नहीं, बल्कि इस क्षेत्र की स्वाभिमानी जनता के हाथों में होंगे। यह सच है कि बातिल (असत्य) मिट जाने के लिए ही है, और हक (सत्य) की दृढ़ता उसे मिटा कर ही दम लेती है।
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