मंगलवार 10 फ़रवरी 2026 - 14:48
22 बहमन को ईरानी जनता का अपने दुश्मनों पर पहले  से हमला शुरू हो जााएगाः मुहम्मद हुसैन किताबची

हौज़ा / काशान के इमाम-ए-जुमआ मुहम्मद हुसैन किताबची ने मुख़्तलिफ़ तब्क़ात के अवाम को 22 बहमन की रैली में भव्य भागीदारी की दावत देते हुए कहा, 22 बहमन कल ईरान की जनता की तरफ़ से दुश्मनों पर हमले से हमले की शुरुआत है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , काशान से क़मसर बख़्श के इमाम-ए-जुमआ ने 22 बहमन की राह-पैमाई में अवाम की पुरजोश मौजूदगी की अपील करते हुए यह बयान दिया।यौमुल्लाह 22 बहमन 1404 के मौक़े पर क़मसर बख़्श के इमाम-ए-जुमआ का पैग़ाम इस तरह है।

बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्रहीम
وَ لا یَطَؤُنَ مَوْطِئاً یَغِیظُ الْکُفَّارَ إِلَّا کُتِبَ لَهُمْ بِهِ عَمَلٌ صالِحٌ
और वे ऐसा कोई क़दम नहीं उठाते जो काफ़िरों को ग़ुस्सा दिलाए, मगर यह कि उस क़दम के बदले उनके लिए अमल-ए-सालेह लिखा जाता है।

हर साल 22 बहमन को अवाम की पुरशकूह और पुरजोश मौजूदगी, मुल्क-ए-अज़ीम व अज़ीज़ ईरान के तमाम अफ़राद के दरमियान हमआहंगी और मुक़द्दस इत्तिहाद की अलामत बन चुकी है। साथ ही यह जिब्हा-ए-मुक़ावमत की क़ौमों और दुनिया भर के तमाम आज़ादी-ख़्वाह इंसानों के लिए उम्मीद-आफ़रीन और आज़ादी-बख़्श रही है।

मौजूदा हालात को देखते हुए जब तारीख़ ए इस्लाम में कभी भी हक़ और बातिल के जिब्हों की सीधी टकराहट और सफ़ आराई आज जैसी न रही हो अगरचे अहले-बैत (अ) की नूरानी रिवायात ने इन दिनों की बशारत, और बातिल के मुक़ाबले में इस्तेक़ामत की फ़ज़ीलत, अहमियत और क़द्र-ओ-क़ीमत हमें पहले ही बता दी थी और ख़ुदावंदी वादा-ए-सादिक़ भी हम तक पहुँचा है।
وَنُرِیدُ أَنْ نَمُنَّ عَلَی الَّذِینَ اسْتُضْعِفُوا فِی الْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةً وَنَجْعَلَهُمُ الْوَارِثِینَ
और हम इरादा रखते हैं कि ज़मीन में दबाए गए लोगों पर एहसान करें, उन्हें रहनुमा बनाएँ और उन्हें वारिस ठहराएँ।

इसलिए इन नाज़ुक दिनों में जब हम आख़िरी हुज्जत-ए-इलाही के ज़ुहूर की तजस्सुस और उम्मीद रखते हैं ज़ालिमों के मुक़ाबले के मैदान में मौजूदगी और हक़ का दिफ़ा, कई गुना ज़्यादा अहमियत इख़्तियार कर जाता है।

इसी बुनियाद पर मैं क़मसर बख़्श के शहरों और गाँवों के तमाम दीन्दार और विलायत-मदार अफ़राद से अपील करता हूँ कि इस साल 22 बहमन की राह-पैमाई में अपनी पुरशोर मौजूदगी के ज़रिये इस इलाक़े की तारीख़ के सफ़्हे पर एक और बरग़-ए-ज़र्रीन दर्ज करें ताकि मुनज्जी-ए-आलम-ए-इंसानियत के ज़ुहूर के वक़्त आप इस पर फ़ख़्र कर सकें।

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