रविवार 15 मार्च 2026 - 13:44
यौम अलकुद्स;उम्मत ए मुस्लिमा के इत्तेहाद, बेदारी और मज़लूमों की हिमायत का पैगाम।मौलाना रेहान हैदर

हौज़ा / यौमुल कुद्स सिर्फ एक एहतेजाजी दिन नहीं है बल्कि यह उम्मत ए मुस्लिमा के इत्तेहाद, बेदारी और मजलूमों की हिमायत का एक आलमी पैगाम है। इस दिन के जरिए मुसलमानों को यह एहसास दिलाया जाता है कि वह फिलिस्तीनी अवाम की आजादी और इंसाफ के कियाम के लिए अपनी आवाज बुलंद करें।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,रमज़ानुल मुबारक के आखिरी जुमे को दुनिया भर में यौमुल कुद्स अकीदत और एहतेराम के साथ मनाया जाता है। इस दिन का मकसद फिलिस्तीन के मजलूम अवाम के साथ इजहारे एकजहती करना और बैतुल मुकद्दस की आजादी के लिए आवाज बुलंद करना है। मुख्तलिफ मुल्कों में इस मौके पर रैलियां, सेमिनार और इजतमाए मुनअकिद किए जाते हैं, जिनमें उलेमा, दानिशवर और अवाम बड़ी तादाद में शिरकत करते हैं।

उलमा ने अपने खिताबात में यह पैगाम दिया है कि यौमुल कुद्स उम्मते मुस्लिमा के लिए निहायत अहम दिन है, क्योंकि यह मुसलमानों को फिलिस्तीन के मसले की तरफ मुतवज्जा करता है और उन्हें अपने दीनी और अखलाकी फराइज की याद दिलाता है। इस दिन मुसलमान दुनिया भर में मजलूम फिलिस्तीनी अवाम की हिमायत का एलान करते हैं और जुल्म व नाइंसाफी के खिलाफ मुत्तहिद होने का पैगाम देते हैं।

उलेमा इस बात पर भी तवज्जा दिलाते हैं कि बैतुल मुकद्दस मुसलमानों का एक मुकद्दस शहर है और इसी शहर में वाके मस्जिदे अक्सा इस्लाम का मुकद्दस तरीन मकाम है। यौमुल कुद्स की अहमियत इस बात में भी है कि यह दिन मुसलमानों को अपने मुकद्दसात की हिफाजत और उनकी आजादी के लिए जद्दोजहद की याद दहानी कराता है।

यौमुल कुद्स सिर्फ एक एहतेजाजी दिन नहीं है बल्कि यह उम्मत ए मुस्लिमा के इत्तेहाद, बेदारी और मज़लूमों की हिमायत का आलमी पैगाम है। इस दिन के जरिए मुसलमानों को यह एहसास दिलाया जाता है कि वह फिलिस्तीनी अवाम की आजादी और इंसाफ के कयाम के लिए अपनी आवाज बुलंद करें।

वाजेह रहे कि यौमुल कुद्स मनाने की अपील 1979 में आयतुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी ने की थी, जिसके बाद से हर साल रमज़ान के आखिरी जुमे को यह दिन मनाया जाता है। इस दिन दुनिया के मुख्तलिफ मुल्कों में खुसूसी प्रोग्राम मुनअकिद होते हैं, जिनमें फिलिस्तीन की आजादी, मुसलमानों के इत्तेहाद और मजलूमों की हिमायत का पैगाम दिया जाता है।

यौमुल कुद्स की असल अहमियत यही है कि यह दिन मुसलमानों को बेदारी, इत्तेहाद और अपने मुकद्दसात के दिफा का शऊर देता है और फिलिस्तीन की आजादी की उम्मीद को जिंदा रखता है।

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