हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,कहा जाता है कि यह हमारे महान नेता और शहीद की आख़िरी तस्वीर है, जिसमें रमज़ान के दसवें दिन सुबह नौ बजे वे कुरआन की तिलावत में मग्न थे। इस दृश्य को देखकर मेरे मन में यह प्रश्न उठा कि हमारी ज़िंदगी का आख़िरी पल कैसा होगा?
वास्तव में मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं कि यह तस्वीर असली है या कृत्रिम बुद्धिमत्ता की रचना, क्योंकि यदि यह सच भी हो तो हमारे दिलों को और अधिक प्रभावित करती है। विभिन्न स्रोतों से, जिनमें हज़रत आका सैयद मुजतबा हफ़िज़हुल्लाह का प्रारम्भिक बयान भी शामिल है, यह बात नक़्ल की गई है कि उन्होंने कुरआन की तिलावत करते हुए ही शहादत पाई।
निस्संदेह यह वह अवसर है जब हमें किसी कोने में बैठकर सोचने की ज़रूरत है कि यदि हमें यक़ीन हो जाए कि कुछ ही क्षणों बाद हमें मार दिया जाएगा, तो हमारा व्यवहार क्या होगा?
यही वजह है कि इस महान क्रांतिकारी शहीद सरदार को ईरान का “मर्द‑ए‑बरतर” कहा जाता है।
“मर्द‑ए‑बरतर” से अभिप्राय उस व्यक्तित्व से है जो सबसे ऊँचा हो और अपने समकालीनों में बेमिसाल हो। कल्पना कीजिए, आपको सुरक्षा और सरकारी स्रोतों से बताया जाए कि आपको मार दिया जाएगा, लेकिन वह (शहीद) वज़ू करते हैं और फिर सुकून से कुरआन की तिलावत में लग जाते हैं।
वह इंसान जिसे अपनी मौत के क़रीब होने का एहसास हो जाता है, स्वाभाविक रूप से अपने सबसे महत्वपूर्ण कर्तव्यों को पूरा करने में लग जाता है। और यदि वह व्यक्ति रुतबा और मर्यादा में ऊँचा हो तो उसके कार्य भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
जिस हस्ती का उस विशेष दौर में ईरान, क्षेत्र, बल्कि शायद दुनिया में कोई सानी न था उसने अपने आख़िरी क्षण कुरआन के साथ गुज़ारे। इसका क्या रहस्य है? यही कि उसने कुरआन से बढ़कर किसी चीज़ को नहीं पाया।
क्योंकि कुरआन ईमान का स्रोत है, ईमान स्थिरता का ज़ामिन है, और स्थिरता ही फ़त्ह‑ए‑मुबीन का रास्ता खोलती है।
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