हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, जामेअतुज़्ज़हरा (स) की इस्लामी शिक्षा एवं प्रशिक्षण की वैज्ञानिक समिति की सचिव, सय्यदा ज़हरा हुसैनी ने एक नोट में आज ईरानी इस्लामी समाज में मअनवीयत और 'हमासा-आफ़रीन' (वीरतापूर्ण) अक़्लानियत को पुनर्जीवित करने में मस्जिदों के मूल्यवान भूमिका पर जोर दिया है।
इस नोट में लिखा है:
बिस्मिल्लाहिर्रहमानिर्राहीम
"وَ أَنَّ الْمَسَاجِدَ لِلَّهِ فَلاَ تَدْعُوا مَعَ اللَّهِ أَحَداً" (सूर ए जिन्न/18)
(और यह कि मस्जिदें अल्लाह के लिए हैं, अतः अल्लाह के साथ किसी और को मत पुकारो।)
मानवता की तौहीदी और सभ्यतापूर्ण यात्रा के लिए 'साधनों और प्रारंभिक चरणों की आवश्यकता होती है, और इस बीच 'सामाजिक क्रियाओं का स्थान और आधार' अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकताओं में से एक है, जिस पर शुद्ध इस्लाम की विचारधारा में (सभी तत्वों और स्तंभों पर व्यापक दृष्टि के साथ) व्यवस्थित दृष्टिकोण के तहत विशेष ध्यान दिया गया है, और 'मस्जिद को इस व्यक्तिगत और सामाजिक उत्कर्ष और विकास का आधार' माना गया है।
शहीद नेता आयतुल्लाह खामेनेई ने इस महत्वपूर्ण बिंदु की ओर इशारा करते हुए फरमाया है:
"मस्जिद नामक एक पहचान का निर्माण करना, पहले क़ुबा में और फिर मदीना में, इस्लामी समाज के गठन की शुरुआत में इस्लाम की सबसे सुंदर और सारगर्भित पहलों में से एक है: अल्लाह का घर और लोगों का घर; अल्लाह से मिलन का एकांत स्थल और लोगों के साथ मिलन का सार्वजनिक स्थल; ज़िक्र का केंद्र और आध्यात्मिक मेराज का स्थान तथा ज्ञान, जिहाद और सांसारिक प्रबंधन का क्षेत्र; पूजा का स्थान और राजनीति का आधार, ये परस्पर जुड़े हुए द्वैत हैं, जो इस्लामी मस्जिद की तस्वीर और अन्य धर्मों के प्रचलित पूजा स्थलों से उसके अंतर को उजागर करते हैं।" (18/7/89)
ऐतिहासिक परंपराओं में, विभिन्न विचारधाराओं में, मानवता के उद्धार के नेता और दावेदार तथा विभिन्न दृष्टिकोणों वाले स्वतंत्रता आंदोलनों ने समाजों के लिए अलग-अलग रणनीतियाँ निर्धारित कीं। कभी-कभी अहंकार और व्यक्तिवाद का झंडा बुलंद करके, केवल व्यक्ति-केंद्रित व्याख्या और औपनिवेशिक दृष्टिकोण को ही मुक्ति का एकमात्र रास्ता बताया गया। इसलिए उन्होंने विभिन्न तरीकों से अपनी सत्यता को प्रदर्शित करने और मनुष्य-प्रेमी लेकिन भौतिकवादी-केंद्रित रंग-बिरंगे नारे लगाने का प्रयास किया। लेकिन उनमें से कोई भी आज मानवता की खोई हुई चीज़ - जो 'तौहीद-केंद्रित आध्यात्मिकता' है, को दुनिया के प्यासे लोगों को नहीं दे सका।
आज मानवता के लिए जीवनदायिनी नुस्ख़ा इस्लामी समाजों के 'मस्जिद के केंद्र' में प्रदर्शित की गई है। शहीद नेता के कथन में आया है:
"इस्लामी मस्जिद में, ख़ालिस इबादत का जोश और आनंद, एक स्वच्छ, बुद्धिमत्तापूर्ण और स्वस्थ जीवन की प्रसन्नता के साथ घुलमिल जाता है, और व्यक्ति एवं समाज को उसके इस्लामी मापदंड के करीब ले आता है। मस्जिद, इस्लाम के मकतब के दृष्टिकोण और विचारधारा में दुनिया और आख़िरत के मिश्रण तथा व्यक्ति और समाज के जुड़ाव का प्रतीक है।" (18/7/89)
इसी कारण, इस्लाम में मस्जिद केवल व्यक्तिगत पूजा का स्थान नहीं थी, बल्कि हमेशा एक बुद्धि-केंद्रित और तर्कसंगत विचार के साथ तथा तौहीदी दृष्टिकोण पर आधारित होकर, समुदायों को एकता में पहुँचाती रही है, और व्यक्तिगत एवं सामूहिक आंदोलनों और क्रियाओं के प्रभाव को अल्लाह की अटूट शक्ति से जोड़कर कई गुना बढ़ा दिया है। इसी संबंध में शहीद नेता फरमाते हैं:
"मस्जिद महत्वपूर्ण है, यह एक आधार है; जैसा कि लोगों की जुबान पर प्रसिद्ध है, यह वास्तव में एक आधार है। न केवल इस या उस सामाजिक मुद्दे के लिए आधार, [बल्कि] मस्जिद सभी अच्छे कार्यों के लिए आधार हो सकती है; आत्म-निर्माण, मानव-निर्माण , हृदय की मरम्मत और दुनिया की मरम्मत तथा शत्रु का मुकाबला करने और इस्लामी सभ्यता के निर्माण के लिए तैयारी करने तथा व्यक्तियों की अंतर्दृष्टि (बसीरत) बढ़ाने के लिए; और इसी तरह मस्जिद ऐसा ही एक स्थान है। (31/5/95)
इस तरह की मस्जिद, उल्लिखित विशेषताओं के साथ, निश्चित रूप से आध्यात्मिकता, फज़ीलत, समानता, अक़्लानियत को मजबूत करके और सक्रिय एवं सही कार्यशैली के प्रसार के द्वारा 'इमाम और उम्मत के बीच जोड़ने वाली कड़ी' होगी, और विभिन्न पहलुओं में प्रतिरोध के केंद्र का गठन करेगी।
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