बुधवार 29 अप्रैल 2026 - 07:01
ईरान-अमेरिका तनाव पर ऑनलाइन सम्मेलन: ईरान और अमेरिका तनाव के परिप्रेक्ष्य में शांति और वार्ता की आवश्यकता पर बल

हैदराबाद, भारत में ईरान-अमेरिका तनाव के विषय पर एक ऑनलाइन सम्मेलन आयोजित किया गया; जिसमें वक्ताओं ने ईरान की रक्षा रणनीति और क्षेत्रीय प्रभावों पर चर्चा की।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हैदराबाद, भारत में ईरान-अमेरिका तनाव के विषय पर एक ऑनलाइन सम्मेलन आयोजित किया गया; जिसमें वक्ताओं ने ईरान की रक्षा रणनीति और क्षेत्रीय प्रभावों पर चर्चा की।

7 अक्टूबर 2023 को तूफान अल-अक्सा कार्रवाई के नाम पर तथाकथित रक्षा और युद्ध कौशल के झूठे दावे को झुठलाने वाले इज़राइल की आँखों में धूल झोंककर इज़राइल की कमर पर किए गए अत्यंत सफल वार ने शक्ति और धन के नशे में चूर दुनिया को हैरान और स्तब्ध कर दिया, तो 28 फरवरी 2026 को इज़राइल और अमेरिका द्वारा ईरान पर किए गए ज़ालिमाना हमले के जवाब में ईरान के अमेरिकी सैन्य अड्डों और इज़राइल के विभिन्न शहरों में किए गए ज़बरदस्त हमलों ने ज़ुल्म, ज्यादती, कत्ल और लूट-खसोट में पिछले सारे रिकॉर्ड तोड़ने वाले अमेरिकी और इज़राइली यहूदियों के दिल-दिमाग को झकझोर कर रख दिया है और ताकत एवं घमंड के मापदंड को भी तोड़-फोड़ दिया है। (इस पृष्ठभूमि में ईरान और ग़ज़ा के बीच से अल्लाह तआला ऐसे मुजाहिदों को उठाएगा जो उम्मत की बागडोर संभालने के लिए होंगे, जो उम्मत का इतिहास बदल देंगे और उम्मत-ए-मुस्लिमा का शानदार माजी फिर लौट आएगा।)

ये विचार पुराने शायर, अदीब और पूर्व जनरल सेक्रेटरी हल्क़ा-ए-अदब-ए-इस्लामी क़तर जनाब मोहसिन हबीब "मकतब-ए-सदरतुल-मुंतहा और मकतब-ए-ताजुल-क़ुरआन" के संयुक्त ऑनलाइन अजलास (सम्मेलन) से व्यक्त कर रहे थे।

इस अवसर पर अमेरिका से मौलाना डॉक्टर सैयद शाह समीउल्लाह हुसैनी बंदा नवाज़ी चिश्ती क़ादरी, सज्जादा नशीन और मुतवल्ली आस्ताना-ए-हज़रत सैयद शाह मलिक हुसैनी (र.) ने अमेरिका और ईरान पर विश्लेषण प्रस्तुत करते हुए कहा कि ईरान और अमेरिका का विवाद एक राजनीतिक वास्तविकता है, लेकिन मुसलमानों की असली परीक्षा यह है कि वे इसमें विभाजन का शिकार बनते हैं या एकता का प्रदर्शन करके हिकमत और न्याय की मिसाल कायम करते हैं। आज हमें पक्ष बनने के बजाय सिद्धांतों का पैरोकार बनना है। न्याय की बात करनी है, मानवता का साथ देना है, और हर हाल में शांति और भलाई का संदेश फैलाना है।

जनाब एम. ए. नजीब, राजदूत फॉर पीस ने कहा कि अमेरिका और ईरान के बीच तनाव वैश्विक शांति के लिए एक गंभीर चुनौती है, इसलिए दोनों देशों को चाहिए कि वे वार्ता और राजनयिक साधनों के माध्यम से विवाद को कम करने का प्रयास करें। ऐसे हालात में भारत सहित कई ज़िम्मेदार देश रचनात्मक भूमिका निभा सकते हैं, विशेष रूप से वे देश जो संतुलन, निष्पक्षता और राजनयिक संबंध रखते हैं। भारत की विदेश नीति में शांति, संवाद और पारस्परिक सम्मान को महत्व दिया जाता है, जिसके आधार पर वह तनाव कम करने में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। हालाँकि यह कहना अधिक उचित है कि वैश्विक शांति की स्थापना के लिए केवल एक देश नहीं, बल्कि अंतर्राष्ट्रीय समुदाय, क्षेत्रीय ताकतों और वैश्विक संस्थानों के संयुक्त प्रयास आवश्यक होते हैं।

सदारती भाषण देते हुए जनाब मोहम्मद वाहिद अली ख़ान, वरिष्ठ अधिवक्ता, हाई कोर्ट ने कहा कि ''वर्तमान दौर में समय की आवश्यकता है कि मुसलमान आपसी एकता, चेतना और ज़िम्मेदारी के साथ आगे बढ़ें। दुनिया के विभिन्न हिस्सों में पेश आने वाली चुनौतियों का सामना भावनाओं के बजाय हिकमत, धैर्य और सकारात्मक रणनीति से करना अधिक प्रभावी है। इस परिप्रेक्ष्य में सबसे मजबूत और टिकाऊ हथियार शिक्षा है, जो न केवल व्यक्ति को सशक्त बनाती है बल्कि पूरी क़ौम की दिशा भी निर्धारित करती है।''

मुख्य अतिथि अज़हर उमरी, वरिष्ठ पत्रकार, ज़िला अध्यक्ष उत्तर प्रदेश वर्किंग जर्नलिस्ट्स यूनियन, आगरा ने भाषण देते हुए कहा कि ईरान वर्तमान परिस्थितियों में संकल्प और उत्साह के साथ अपने रुख पर स्थित नज़र आता है, लेकिन यह वास्तविकता भी महत्वपूर्ण है कि किसी भी तनाव का निरंतरता बड़े पैमाने पर विवादों को जन्म दे सकती है। वैश्विक स्तर पर ऐसी आशंकाएँ जताई जाती हैं कि यदि स्थितियों पर समय पर काबू नहीं पाया गया तो यह विवाद और अधिक जटिल रूप धारण कर सकता है। इस नाजुक अवसर पर आवश्यक है कि सभी पक्ष धैर्य, हिकमत और गंभीरता का प्रदर्शन करें। भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय राजनयिक साधनों और वार्ता को प्राथमिकता देना ही टिकाऊ शांति की नींव बन सकता है। यही संदेश संबंधित संस्थानों, जिनमें ईरान के वाणिज्य दूतावास शामिल हैं, तक पहुँचना चाहिए कि वर्तमान परिस्थितियों में संयम और संवाद ही सबसे अच्छा मार्ग है। आज उम्मत और वैश्विक समुदाय दोनों के लिए यह समय एकता, बुद्धिमत्ता और ज़िम्मेदारी का है। यदि धैर्य, विचारशीलता और वार्ता को अपनाया जाए तो न केवल तनाव कम हो सकता है बल्कि एक शांतिपूर्ण और स्थिर भविष्य का मार्ग भी प्रशस्त किया जा सकता है।

सहायक प्रोफेसर डॉ. नजमा सुल्ताना ने अपने भाषण में कहा कि एकता का अर्थ केवल नारा नहीं है, बल्कि व्यावहारिक रूप से एक दूसरे का साथ देना, सहिष्णुता को बढ़ावा देना और सकारात्मक भूमिका निभाना है। यदि शिक्षा, अनुशासन और पारस्परिक सम्मान को अपनाया जाए तो न केवल वर्तमान चुनौतियों का सामना किया जा सकता है, बल्कि एक बेहतर और सम्मानित भविष्य भी गढ़ा जा सकता है।

ईरान के प्रतिष्ठित क़म विश्वविद्यालय से हाल ही में अपनी शिक्षा पूरी करके हैदराबाद आए हुए हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन मौलाना बासित अली ने अपने भाषण में कहा कि ईरान की वर्तमान राज्य की पहचान 1979 के ईरानी इस्लामी क्रांति के बाद एक इस्लामी गणराज्य की स्थापना हुई, जिसके बाद ईरान ने अपनी संप्रभुता, क्षेत्रीय प्रभाव और रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने पर विशेष ध्यान दिया। ''लड़ने की क्षमता'' के संदर्भ में ईरान को आम तौर पर इसकी रक्षा रणनीति, क्षेत्रीय प्रभाव और अपरंपरागत सैन्य तरीकों के आधार पर देखा जाता है। ईरान की सैन्य शक्ति में उसकी नियमित सेना के साथ-साथ इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) भी शामिल है, जो देश की रक्षा और क्षेत्रीय नीतियों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ईरान ने मिसाइल तकनीक, ड्रोन और रक्षा प्रणालियों में भी काफी प्रगति की है।

अब्दुल हामिद मन्नान, वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि ईरान के युवाओं ने जिस उत्साह और स्टेमिता (धैर्य एवं दृढ़ता) का प्रदर्शन किया है, वह ध्यान देने योग्य है। कठिन परिस्थितियों और अपने बुजुर्गों की कुर्बानियों के बावजूद उनका एकजुटता के साथ खड़ा होना उनके संकल्प और उत्साह की जीती-जागती निशानी है, हालाँकि ऐसे हालात में भावनाओं के साथ-साथ बुद्धिमत्ता और बसीरत (अंतर्दृष्टि) को भी ध्यान में रखने की अत्यधिक आवश्यकता है, ताकि किसी भी प्रतिक्रिया के प्रभावों को बेहतर ढंग से समझा जा सके। मजबूत राष्ट्र वही होते हैं जो एकता, चेतना और हिकमत के साथ आगे बढ़ते हैं।

सैयद शादाब अहमद रज़वी, संस्थापक एवं प्रिंसिपल मकतब-ए-सदरतुल-मुंतहा ने भाषण देते हुए कहा कि युद्ध के आरंभ में यह समझा जा रहा था कि ईरान के महत्वपूर्ण स्थानों और नेताओं को निशाना बनाकर उसे सरकार बदलने पर मजबूर किया जा सकता है; लेकिन ईरान ने अमेरिका के खाड़ी सहयोगियों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला करके जवाब दिया। फिर जैसे-जैसे लड़ाई तेज होती गई, ईरान ने फारस की खाड़ी को वैश्विक बाजारों से जोड़ने वाले संकीर्ण जलमार्ग (होर्मुज जलडमरूमध्य) के माध्यम से समुद्री यातायात में बाधा डालने की ओर अपना ध्यान केंद्रित कर लिया। इस कदम ने जल्द ही अमेरिका और उसके सहयोगियों पर बहुत अधिक दबाव डाला, जो होर्मुज जलडमरूमध्य के माध्यम से तेल और गैस की निर्बाध आपूर्ति पर निर्भर हैं। इस 40 दिवसीय युद्ध के दौरान ईरान के परमाणु हथियारों या उसकी परमाणु क्षमता से अधिक उसके द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य में जहाजों को रोकने का मामला चर्चा का विषय रहा।

डॉ. सैयद हबीब इमाम क़ादरी (संपादक, तारीख़-ए-दक्कन जर्नल) ने कहा कि क़ुरआन शांति, सहिष्णुता और संवाद को बढ़ावा देता है और सिखाता है कि शत्रुता के बावजूद न्याय का दामन हाथ से नहीं छोड़ना चाहिए। यही सिद्धांत अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में भी मार्गदर्शन प्रदान कर सकते हैं। यदि देश पारस्परिक सम्मान, सहिष्णुता और गंभीर वार्ता को प्राथमिकता दें तो तनाव को कम किया जा सकता है। इसी प्रकार, इस्लाम के इतिहास में सहाबा-ए-किराम का जीवन हमें यह शिक्षा देता है कि कठिन परिस्थितियों में भी एकता, धैर्य और हिकमत को अपनाया जाए। आज की दुनिया में भी इन्हीं सिद्धांतों को अपनाते हुए शांति, एकजुटता और पारस्परिक सहयोग को बढ़ावा देना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

इस अवसर पर एडवोकेट मोहम्मद इकरामुद्दीन मुर्तज़ा पाशा, सैयद शीरुद्दीन क़ादरी उर्फ़ मक़ीम पाशा (संयोजक सभा), अरशद हुसैन (सामाजिक कार्यकर्ता), अस्मा खातून, नाज़िमा सुल्ताना, साजिदा बेगम, मोहम्मद शबीर अहमद और अन्य सम्मानित व्यक्तित्व उपस्थित थे।

सैयद शादाब अहमद रज़वी ने सभी प्रतिभागियों का आभार व्यक्त किया। मौलाना सैयद शाह समीउल्लाह हुसैनी (सज्जादा नशीन) की हार्दिक एवं प्रभावशाली दुआओं से इस महत्वपूर्ण और समय पर आयोजित सम्मेलन का समापन सुंदर ढंग से हुआ।

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