हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, हौज़ा-ए-इल्मिया की उच्च परिषद के सचिवालय के प्रभारी हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन अहमद फर्रुख फाल ने क़ुम में 'उम्मते-मबऊस' मीडिया शिविर में कहा कि सड़कों पर लोगों की उपस्थिति युद्ध के मैदान में सफलता का रहस्य है। उन्होंने क़ुरआन की आयत "इन्नल्लाहा ला युग़ैयिरु..." का हवाला देते हुए कहा कि अल्लाह किसी क़ौम की स्थिति तब तक नहीं बदलता जब तक वह स्वयं अपनी स्थिति न बदले। यह बदलाव विलायत की ओर रुख़ करने से आता है, न कि उससे दूरी बनाने से।
फर्रुख फाल ने इस्लाम के शुरुआती इतिहास से सबक लेते हुए कहा कि पैग़म्बर (स) के बाद उम्मत ने नमाज़, रोज़ा, हज तो अपनाए, लेकिन विलायत को त्याग दिया। उन्होंने इमाम अली (अ) के उदाहरण से समझाया कि लोगों ने बाहरी तौर पर इमाम को चुना, लेकिन उनका साथ नहीं दिया, यहाँ तक कि जंग-ए-जमल और नहरवान जैसे युद्ध छेड़ दिए और इमाम को उन पर लानत करनी पड़ी। यही विलायत से फासला इस्लामी उम्मत के लिए इतिहास का काला अध्याय बना।
इस्लामी क्रांति को विलायत की पुकार का जीता-जागता उदाहरण बताते हुए उन्होंने कहा कि 1963 में इमाम खुमैनी (र) के आह्वान पर लोग अत्याचारी ताग़ूती शासन के ख़िलाफ़ उठ खड़े हुए। भारी शहादत के बावजूद लोग पीछे नहीं हटे और अंततः विजयी हुए। 8 साल के थौपे हुए युद्ध में हज़ारों तालिब-ए-इल्म ने पढ़ाई छोड़कर मैदान में जाना और यही जज़्बा आज भी देखने को मिलता है।
फर्रुख फाल ने कहा कि आज फिर उम्मत 'मबऊस'हो गई है। क़ुम और पूरे देश के अलग-अलग हिस्सों में लोग सड़कों पर मौजूद हैं, और यही उपस्थिति हमारी विजय की गारंटी है। क्रांति के दो इमामों (इमाम खुमैनी और शहीद ख़ामेनेई) ने लोगों को क्रांति का मालिक माना, और 47 साल बाद भी हमने अपनी ज़मीन का एक अंश नहीं खोया है।
इमाम अली (अ.) के समय अबू मूसा अशअरी की अनुचित वार्ता का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि नादान लोग दुश्मन की शैतानियतों में फँस जाते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हालाँकि हम सरकार और अधिकारियों पर भरोसा रखते हैं और वली-ए-फ़क़ीह के बिनाशर्त आज्ञाकारी हैं, फिर भी हर वार्ता में अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि दुश्मन को अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्रों का लंबा अनुभव है।
उन्होंने कहा कि ईरान एक ऐसी महाशक्ति है जिसे देखकर दुनिया की ताकतें हैरान हैं। हम न अतिवाद करते हैं, न उदासीनता। हमें रहबरी से न आगे बढ़ना है, न पीछे रहना है। असली रहस्य लोगों की सड़कों पर मौजूदगी है। जो लोग पश्चिम और अमेरिका (शैतान-ए-बुज़ुर्ग) की ताक़त पर विश्वास रखते हैं, उनके लिए क़ुरआनी आयत "कम मिन फि-अतिन क़लीलतिन..." याद दिलाई कि छोटी टोली अल्लाह की मदद से बड़ी टोली पर भारी पड़ जाती है।
हज़रत आयतुल्लाह सैयद मुजतबा ख़ामेनेई को प्रतिभाशाली व्यक्तित्व बताते हुए फर्रुख फाल ने कहा कि वे दशकों से शहीद रहबर के साथ रहे हैं और उनसे प्रशासनिक व राजनीतिक मामले सीखे हैं। पूर्ण विश्वास के साथ उनकी इताअत की जाती है। शहीद ख़ामेनेई (र) ने कभी अपने बच्चों को राजनीति में आने की अनुमति नहीं दी, लेकिन जब लोगों ने नए रहबर में यह क्षमता देखी, तो वे शांत हो गए – यह एक दिव्य चमत्कार है। शहादत ने जिन लोगों पर दुश्मन के लाउडस्पीकर असर कर चुके थे, उन्हें भी ग़मगीन कर दिया।
अंत में उन्होंने कहा कि जब समाज में दिव्य रहबरी होगी, लोग अल्लाह की ओर से प्रेषित होंगे, और सशस्त्र बल एकजुट होंगे, तो दिव्य सहायता से निश्चित विजय हमारी होगी। ईरान की क़ौम बाबसीरत है, इस्लामी निज़ाम सुरक्षित है, और हमने इस युद्ध में अल्लाह की नुसरत का चमत्कार देखा है।
आपकी टिप्पणी