हौज़ा न्यूज़ एजेंसी: लबनानी लेखिका और पत्रकार लतीफ़ा अल-हुसैनी ने बहरैन में मानवाधिकारों की गंभीर स्थिति पर चौंकाने वाला लेख लिखा है। उनके अनुसार, बहरीन में आज एक नए प्रकार का रंगभेद लागू किया जा रहा है, जहाँ लोगों को बिना किसी औपचारिक आरोप के निगरानी, धमकी, पीछा और घेराबंदी का सामना करना पड़ता है।
अल-हुसैनी ने लिखा है कि बहरैन में दर्द और पीड़ा को समझने के लिए नागरिक होना भी ज़रूरी नहीं है। हर कोई—चाहे वह मूल निवासी हो या बिना नागरिकता वाला—तानाशाही व्यवस्था के निशाने पर है। लोग ऐसी दमनकारी स्थिति में जी रहे हैं, जिसे वे कभी भूल नहीं सकते। सरकार उनके विचारों और मान्यताओं पर भी पूरा नियंत्रण रखना चाहती है।
उन्होंने बताया कि बहरीन की दिनचर्या में हर नागरिक लगातार आतंक के माहौल में जी रहा है। सुरक्षा तंत्र हर उस व्यक्ति पर टूट पड़ता है जो सरकार के लिए 'परेशानी' का सबब बने। नागरिकों को बार-बार तलब किया जाता है और सवाल किया जाता है: "तुमने ऐसा क्यों लिखा? यह क्यों कहा? उस पर आलोचना क्यों की?"
लबनानी पत्रकार के अनुसार, उम्रकैद, नागरिकता छीनने, साइबर अपराधों में संस्थागत गतिविधियाँ, और मीडिया में एकरंगी खबरें—ये सब केवल बहरीन की विशेषताएँ हैं। सबसे दर्दनाक बात यह है कि सैकड़ों साल पुरानी राष्ट्रीय पहचान भी छीनी जा रही है। यह सब क्यों? अल-हुसैनी कहती हैं, सिर्फ इसलिए कि देश का एक बड़ा हिस्सा अपने इस्लामी विश्वासों—खासकर अहल-ए-बैत और इमाम हुसैन की शिक्षाओं—पर अड़ा है। यह मान्यताएँ आज पुलिस राज्य के लिए 'लाल रेखा' बन गई हैं।
उन्होंने आगे कहा कि बहरैन में हर कोई गिरफ्तारी से नहीं, बल्कि इस बात से डरता है कि कहीं उसका नाम कड़ी सज़ाओं की सूची में न आ जाए। न्याय व्यवस्था अब लोगों के लिए सुरक्षित पनाहगाह नहीं रही। एक शब्द, एक रुख या एक संदेह किसी का भी भविष्य तबाह कर सकता है।
अल-हुसैनी ने चेतावनी दी है कि बहरैन को क्रूरता नहीं, बल्कि नरमी और निष्पक्षता की सख्त जरूरत है। राष्ट्र कठिनाइयों पर लंबे समय तक सब्र कर सकते हैं, लेकिन जब डर 'जीवन का तरीका' बन जाए, तो लोग खुद को छोड़ा हुआ और निराश महसूस करते हैं। यही आज बहरीन की वास्तविक तस्वीर है।
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