हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , क़ुम ए मुकद्दसा में हज़रत मासूमा स.ल. के रौज़े के अंदर स्थित शबिस्तान-ए-इमाम खुमैनी (रह.) में हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के विद्वानों और धार्मिक छात्रों का एक ऐतिहासिक समागम हुआ। इस समागम का उद्देश्य बहरैन, कुवैत और अमीरात सहित पूरे क्षेत्र में मज़लूम शियाओं के खिलाफ जारी अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करना था।
हौज़ा ए इल्मिया क़ुम के अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सैय्यद मुफीद हुसैनी कोहसारी ने अपने बयान का आगाज़ सूरह हूद की आयत नंबर 113
«وَلَا تَرْکَنُوا إِلَی الَّذِینَ ظَلَمُوا فَتَمَسَّکُمُ النَّارُ»
ज़ालिमों की ओर न झुको, अन्यथा जहन्नम की आग तुम्हें अपनी ओर खींच लेगी) से किया और घोषणा की कि ख़ामोशी ज़ुल्म पर मोहर-ए-क़बूल है।
उन्होंने अपने बयान में कई बिंदुओं की ओर इशारा किया:
पहला बिंदु: इंसान की इज़्ज़त को पामाल न किया जाए,बयान में कहा गया कि इस्लाम ने इंसान को "अशरफुल मख़लूक़ात" करार दिया है। अल्लाह का फरमान है: «وَلَقَدْ کَرَّمْنَا بَنِی آدَمَ» (बनी इसराइल, 70)। बहरैन में बिना सबूत के गिरफ्तारियाँ, यातनाएँ, जेलों में बर्ताव, धार्मिक संस्थानों पर प्रतिबंध और विद्वानों तथा छात्रों को निशाना बनाना इस्लाम के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ है। इन कार्यों से न केवल मानवीय गरिमा का हनन हो रहा है, बल्कि इस्लामी शिक्षाओं का मज़ाक उड़ाया जा रहा है।
दूसरा बिंदु: अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों की खुली खिलाफत,वक्ताओं ने बताया कि बहरैन सरकार ने वैश्विक संधियों के तहत यह आश्वासन दिया था कि वह अपने नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक स्वतंत्रता और महिलाओं के अधिकार देगी।
लेकिन व्यवहार में वहाँ प्रदर्शनों को हिंसा से कुचला जा रहा है, बोलने की स्वतंत्रता खत्म कर दी गई है, और धार्मिक अल्पसंख्यकों को सताया जा रहा है। यह सब 'मानवाधिकारों' और 'नागरिक एवं राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय संधि' की स्पष्ट उल्लंघना है।
तीसरा बिंदु: मुसलमानों में फूट डालने की साजिश
बयान में चेतावनी दी गई कि बहरीन में जो कुछ हो रहा है, वह कोई क्षेत्रीय संघर्ष नहीं बल्कि एक बड़ी अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है। उद्देश्य मुसलमानों को आपस में लड़ाना और उनका ध्यान असली दुश्मन से हटाना है। विद्वानों और छात्रों को निशाना बनाकर दरअसल जनता को उनके वास्तविक नेताओं से काटा जा रहा है। प्रतिभागियों ने स्पष्ट किया कि यह घटिया नीतियाँ सिर्फ इसराइल और अमेरिका के हित में हैं, जनता के नहीं।
चौथा बिंदु: शासकों के नाम पैग़ाम-ए-इबरत
उन्होंने बहरैन और खाड़ी शासकों को संबोधित करते हुए कहा कि इतिहास गवाह है कि जिस सरकार ने अपनी जनता के दर्द को नहीं समझा, उसका अंजाम विनाश के अलावा कुछ नहीं।
ज़ुल्म और हिंसा से कभी कोई सत्ता मजबूत नहीं हुई, बल्कि उसकी जड़ें कमज़ोर पड़ जाती हैं। उन्होंने नेक ख़्वाही के साथ कहा कि अभी भी समय है कि अपनी नीतियों की समीक्षा की जाए और मज़लूमों के साथ न्याय किया जाए। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब ये सरकारें आंतरिक रूप से ढेर हो जाएँगी।
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