शुक्रवार 3 जुलाई 2026 - 06:04
आशूरा का शिक्षात्मक संदेश: कर्बला हमेशा के लिए एक स्कूल क्यों है?

कर्बला की घटना केवल इतिहास की एक घटना नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा व्यापक शिक्षालय है, जो हर दौर में इंसानियत को नई-नई सीख देता है। हुज्जतुल इस्लाम मोहसिन क़राअती ने कर्बला के शिक्षात्मक पहलुओं, संकट के समय हज़रत ज़ैनब (स) की महान भूमिका और मोमिन के इमाम हुसैन (अ) के हरम से आध्यात्मिक संबंध पर प्रकाश डाला है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, आशूरा की घटना केवल एक ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि एक ऐसा संपूर्ण शिक्षात्मक विद्यालय है जो हर युग में मानवता को नई शिक्षाएँ देता है। सांस्कृतिक-समाजिक पत्रिका "उफ़ुक़-ए-ख़ानवादह" में प्रकाशित एक लेख में हुज्जतुल इस्लाम मोहसिन क़राअती ने कर्बला के शिक्षात्मक पहलुओं, संकट प्रबंधन में हज़रत ज़ैनब (स) के उच्च स्थान और इमाम हुसैन (अ) के हरम के साथ एक मोमिन के आध्यात्मिक संबंध की चर्चा की है। प्रस्तुत पाठ उसी विश्लेषण का एक अंश है।

हमें इमाम हुसैन (अ) के परिचय और उनके संदेश पर एक विशेष शिक्षण संस्थान स्थापित करना चाहिए। वहाँ "संकट प्रबंधन" का विषय भी पढ़ाया जाए और हज़रत ज़ैनब (स) के जीवन को एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया जाए। सोचिए, एक ऐसी महिला जो अपने वतन से दूर थी, कैद में थी, जिसके दो बेटे और दो भाई कर्बला में शहीद हो गए। उसी दिन उसके परिवार के अठारह अन्य सदस्य भी शहीद हुए। उसके ख़ेमे जला दिए गए।

प्यास, भूख और भीषण गर्मी ने भी उन्हें बहुत कष्ट दिया। लेकिन इन सबके बावजूद वह डटकर खड़ी रहीं और लोगों को संबोधित करती रहीं।

कर्बला की घटना हमें अनगिनत सीख देती है। वास्तव में यह एक बहुत बड़ा शिक्षात्मक विद्यालय है। उदाहरण के लिए, इस्लामी नियम के अनुसार यात्रा के दौरान नमाज़ दो रकअत (क़स्र) पढ़ी जाती है। लेकिन यदि कोई इमाम हुसैन (अ) के हरम में हो, तो वह पूरी चार रकअत नमाज़ पढ़ सकता है। इसका संदेश यह है कि यह स्थान तुम्हारा अपना घर है। यदि तुम ज़रीह के पास पहुँच जाओ, तो पूरी नमाज़ अदा कर सकते हो। इसी प्रकार मस्जिदुल हराम, मस्जिदुन्नबी और मस्जिद-ए-कूफ़ा में भी पूरी नमाज़ पढ़ी जाती है। मस्जिदुल हराम अल्लाह की इबादत का प्रतीक है, मस्जिदुन्नबी पैग़ंबरी का, मस्जिद-ए-कूफ़ा विलायत का और इमाम हुसैन (अ) का हरम शहादत का प्रतीक है। अर्थात विलायत, शहादत और नुबुव्वत—इन सभी के अपने गहरे संदेश हैं। इमाम हुसैन (अ) का हरम ऐसा स्थान है जिसे अपना घर समझा गया है, इसलिए वहाँ पूरी नमाज़ पढ़ी जाती है।

हर मिट्टी को चूमना उचित नहीं माना गया है, लेकिन कर्बला की मिट्टी को चूमना निषिद्ध नहीं है। बल्कि जब कोई बच्चा जन्म ले, तो उसके होंठों से कर्बला की मिट्टी का तबर्रुक लगाना चाहिए। और जब कोई वृद्ध होकर इस दुनिया से चला जाए, तो उसे दफ़्न करते समय उसकी ठोड़ी के पास कर्बला की मिट्टी रखी जाए। इसका अर्थ यह है कि कर्बला जन्म से लेकर मृत्यु तक इंसान के साथ जुड़ी रहती है।

कर्बला प्यास की याद भी दिलाती है। इसलिए जब भी पानी पियो, इमाम हुसैन (अ) को सलाम करो। यह आदत इंसान के चरित्र और संवेदनशीलता पर कितना गहरा शिक्षात्मक प्रभाव डालती है।

 मोहसिन क़राअती

स्रोत: सांस्कृतिक-सामाजिक पत्रिका "उफ़ुक़-ए-ख़ानवादह"

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