बुधवार 23 सितंबर 2026 - 06:54
दुश्मन के हमलों की जड़ अमेरिका की महाशक्ति वाली स्थिति का पतन है।हुज्जतुल इस्लाम सरबाज़ ज़ादेह

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम सरबाज़ ज़ादेह ने क्षेत्र में हो रहे रणनीतिक बदलावों का ज़िक्र करते हुए कहा कि ईरान इस्लामी ऊर्जा बाज़ारों, अमेरिकी अर्थव्यवस्था और आधुनिक रक्षा साधनों पर नियंत्रण के माध्यम से युद्ध को अमेरिका की धरती तक ले जाने में सफल हुआ है। यह वर्चस्ववादी व्यवस्था के निश्चित पतन का संकेत है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , आज सुबह सप्ताह-ए-दिफ़ा-ए-मुक़द्दस के अवसर पर शहीदों की कब्रों की सफाई के कार्यक्रम में इमाम सज्जाद (अ.स.) रिवोल्यूशनरी गार्ड्स, हर्मज़गान में वली-ए-फ़क़ीह के प्रतिनिधि हुज्जतुल इस्लाम सरबाज़ादा ने नैतिक बुराइयों से आत्मा को शुद्ध करने की आवश्यकता पर ज़ोर दिया।

उन्होंने कहा कि इस्लामी दृष्टिकोण से किसी मुसलमान के अंदर कंजूसी और बदअख़लाक़ी दोनों गुण एक साथ होना संभव नहीं है। इंसान में इनमें से कोई एक गुण हो सकता है, लेकिन एक मोमिन के अंदर दोनों का एक साथ होना उसकी इंसानियत और बंदगी के रास्ते से अत्यधिक दूरी को दर्शाता है।

उन्होंने आगे कहा कि कंजूसी से आशय दूसरों की सफलता, तरक़्क़ी और विकास से दुखी होना है। किसी दूसरे की सफलता से दुखी होने से न तो इंसान को कोई लाभ मिलता है और न ही दूसरे की सफलता कम होती है। हसद और दूसरों की तरक़्क़ी से परेशान होना बहुत बुरी विशेषता है। इसलिए इंसान को अपने नफ़्स को इन बुराइयों से पाक करना चाहिए।

हुज्जतुल इस्लाम सरबाज़ादेह ने क़ुम के धार्मिक महत्व का उल्लेख करते हुए कहा कि सदियों पहले इमामों, विशेष रूप से इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) ने क़ुम को छात्रों और उलमा के लिए पनाहगाह और सुरक्षित स्थान होने की ओर संकेत किया था।

हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) के दफ़्न से पहले भी ज़करिया बिन आदम, अली बिन इब्राहीम और ज़करिया बिन इदरीस जैसे महान शिया विद्वान क़ुम में दफ़्न थे, लेकिन हज़रत मासूमा (स.अ.) की दफ़्न के बाद क़ुम की विशेष पहचान और अधिक स्पष्ट हुई।

उन्होंने कहा कि किसी अन्य इमामज़ादे के बारे में मासूमीन (अ.स.) की ओर से इतनी अधिक ताकीद, जन्म और दफ़्न से संबंधित भविष्यवाणियाँ तथा उनकी ज़ियारत के लिए जन्नत के बराबर सवाब का उल्लेख नहीं मिलता। हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) का क़ुम की ओर सफ़र कोई साधारण या आकस्मिक पारिवारिक यात्रा नहीं था, बल्कि यह एक उद्देश्यपूर्ण और जागरूक यात्रा थी। गंभीर बीमारी के बावजूद उन्होंने क़ुम जाने पर ज़ोर दिया। अगर हज़रत मासूमा (स.अ.) का वजूद न होता तो आज क़ुम इस भव्य रूप में शिया सभ्यता और ज्ञान का केंद्र न बनता। इसलिए हम सभी हज़रत मासूमा (स.अ.) के ऋणी हैं।

उन्होंने कहा कि “न पूर्व, न पश्चिम” के नारे के साथ इस्लामी गणराज्य ने उस व्यवस्था के संतुलन को चुनौती दी। इसी वजह से दोनों गुटों ने ईरान को कमजोर करने के लिए एकजुट होकर उसका सामना किया।

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि जिस देश के पास उस समय कांटेदार तार तक बनाने की क्षमता नहीं थी, उसने इमाम ख़ुमैनी (र.) के नेतृत्व और जनता के संघर्ष के बल पर आठ वर्षों तक पूरी साम्राज्यवादी दुनिया का सामना किया और दुश्मन युद्ध से अपमानजनक स्थिति में बाहर निकला।

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