बुधवार 30 सितंबर 2026 - 10:41
कुछ सामूहिक गुनाहों का परिणाम किसी राष्ट्र के लिए गंभीर आपदाएं हो सकता है।हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन इस्माईल तकीपुर

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन इस्माईल तकीपुर ने “राष्ट्रीय/सामूहिक गुनाह” की अवधारणा की ओर संकेत करते हुए कहा कि बुराई और अत्याचार के सामने चुप्पी साध लेना किसी समाज से उसकी नेमतों के छिन जाने और उस पर गंभीर आपदाओं के आने का कारण बन सकता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन इस्माईल तकीपुर ने “राष्ट्रीय/सामूहिक गुनाह” की अवधारणा की ओर संकेत करते हुए कहा कि बुराई और अत्याचार के सामने चुप्पी साध लेना किसी समाज से उसकी नेमतों के छिन जाने और उस पर गंभीर आपदाओं के आने का कारण बन सकता है।

हज़रत अबुल हसन (अ.स.) मदरसा-ए-इल्मिया, आमुल के शिक्षक और धार्मिक विशेषज्ञ हुज्जतुल इस्लाम वल-मुस्लिमीन इस्माईल तकीपुर ने सरी में हौज़ा न्यूज़ के संवाददाता से बातचीत में “सामूहिक गुनाह” के विषय पर कहा कि बुराई और अत्याचार के सामने खामोश रहना किसी राष्ट्र से उसकी नेमतों के छिनने और उस पर गंभीर मुसीबतों के आने का कारण बन सकता है।

सामूहिक गुनाह और खामोशी का खतरा:

उन्होंने कहा कि गुनाह केवल व्यक्तिगत गलतियों तक सीमित नहीं है। कभी-कभी कोई राष्ट्र या उसका प्रभावशाली वर्ग वर्षों तक बुराई और अत्याचार के सामने चुप रहता है और कोई प्रतिक्रिया नहीं देता।

उन्होंने कहा कि यह खामोशी स्वयं एक प्रकार का “सामूहिक गुनाह” है। क़ुरआन के सिद्धांत के अनुसार:

“إِنَّ اللَّهَ لَا يُغَيِّرُ مَا بِقَوْمٍ حَتّىٰ يُغَيِّرُوا مَا بِأَنْفُسِهِمْ”

निस्संदेह अल्लाह किसी क़ौम की स्थिति को तब तक नहीं बदलता, जब तक वे स्वयं अपनी स्थिति को न बदलें।

उन्होंने कहा कि समाज में व्यापक रूप से होने वाले गुनाह और अत्याचार के सामने चुप्पी बड़ी नेमतों के समाप्त होने और गंभीर आपदाओं के आने का कारण बन सकती है।

इतिहास से सबक: खामोशी की कीमत:

आमुल के धार्मिक मदरसों के शिक्षक ने ऐतिहासिक उदाहरण देते हुए तेहरान में हुई कुछ घटनाओं का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि महान मुज्तहिद शेख़ फ़ज़लुल्लाह नूरी (रह.), जो स्वयं संवैधानिक आंदोलन के संस्थापकों में शामिल थे, अंग्रेज़ समर्थित पश्चिमी विचारधारा वाले धड़े का साथ न देने के कारण गलत तरीके से संविधान-विरोधी करार दिए गए और उन्हें फांसी दे दी गई।

उन्होंने कहा कि उस समय लोग केवल तमाशाई बने रहे और इस तरह एक सामूहिक गुनाह के भागीदार बने, जिसके परिणामों का उन्हें सामना करना पड़ा। उन्होंने कहा कि इसके बावजूद आज भी कुछ लोग उस महान विद्वान के बारे में वही अनुचित आरोप दोहराते हैं।

उन्होंने एक अन्य उदाहरण के रूप में अहमद शाह क़ाजार से रज़ा ख़ान को सत्ता हस्तांतरण का उल्लेख किया, जिसे मजलिस-ए-मुअस्सिसान ने मंज़ूरी दी थी। उन्होंने इसे भी एक व्यापक सामाजिक गुनाह का उदाहरण बताया और कहा कि इसके प्रभाव कई दशकों तक समाज को झेलने पड़े।

अम्र बिल-मअरूफ़ छोड़ने का परिणाम:

मदरसा-ए-इल्मिया अबुल हसन (अ.स.) के शिक्षक ने सूरह अल-अनफ़ाल, आयत 25 का हवाला देते हुए कहा:

وَاتَّقُوا فِتْنَةً لَا تُصِيبَنَّ الَّذِينَ ظَلَمُوا مِنْكُمْ خَاصَّةً”

उस फितने से बचो जो केवल तुममें से ज़ालिमों को ही नहीं पहुँचेगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार, आपसी संघर्ष और अम्र बिल-मअरूफ़ यानी भलाई का आदेश देने को छोड़ देने के परिणामस्वरूप आने वाली सज़ा केवल अत्याचारियों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि जब वह आती है तो व्यापक रूप से सबको प्रभावित कर सकती है।

उन्होंने कहा कि चूंकि कुछ सामाजिक गतिविधियां और उनके सामने की गई खामोशी सामूहिक स्वरूप रखती हैं, इसलिए उनके परिणाम भी व्यापक हो सकते हैं, भले ही समाज के सभी लोगों ने उनमें सीधे तौर पर भाग न लिया हो।

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