हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,इमाम ए जुमआ भादी शाहगंज;मौलाना सय्यद मासूम रज़ा कैफी ने 9 अक्टूबर 2026 को जुमआ के ख़ुत्बे में कहां,तमाम तारीफ़ें उस अल्लाह के लिए हैं, जिसने इंसान को पैदा किया, उसे अक्ल और समझ अता की और इल्म के ज़रिए उसे बुलंदियों तक पहुँचने का रास्ता दिखाया। दुरूद-ओ-सलाम हो रसूले इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा (स.ल.) और उनके पाक अहलेबैत (अ.स.) पर। मोमिनीन! किसी भी कौम की असली तरक्की सिर्फ़ दौलत, इमारतों और संसाधनों से नहीं होती, बल्कि उसकी तरक्की का बुनियादी राज़ शिक्षा, अच्छे अख़लाक़ और समाज की इस्लाह में छिपी है।
उन्होने कहां, इस पैग़ाम में हमारे लिए एक अहम सबक़ है कि अगर हम अपनी आने वाली नस्लों को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो हमें उनके इल्म, किरदार और तर्बियत पर विशेष ध्यान देना होगा। क़ुरआन-ए-मजीद की पहली वही में अल्लाह तआला ने फ़रमाया:इक़रा बिस्मि रब्बिकल लज़ी ख़लक़” यानी “पढ़ो अपने उस रब के नाम से जिसने पैदा किया।” (सूरह अल-अलक़, 96:1)। इससे शिक्षा की अहमियत और इंसान की ज़िंदगी में इल्म की बुनियादी हैसियत का पता चलता है।

इल्म हासिल करना और जाहिलियत को दूर करना:
अज़ीज़ाने गिरामी! इस्लाम ने इल्म को इंसान की बुलंदी का ज़रिया क़रार दिया है। इल्म वह रोशनी है जो इंसान को सही और ग़लत, हक़ और बातिल तथा इंसाफ़ और ज़ुल्म के बीच फ़र्क़ करना सिखाती है। हमारे मज़हब में क़ुरआन और अहलेबैत (अ.स.) की तालीमात के साथ-साथ ज़रूरी दुनियावी शिक्षा हासिल करना भी समाज की बेहतरी के लिए बेहद अहम है। इमाम अली (अ.) से मंसूब मशहूर हिकमत है कि इल्म दौलत से बेहतर है, क्योंकि इल्म तुम्हारी हिफ़ाज़त करता है, जबकि दौलत की हिफ़ाज़त तुम्हें करनी पड़ती है।
हमें अपने बच्चों को स्कूल, कॉलेज और दीनी तालीमी इदारों तक पहुँचाने की कोशिश करनी चाहिए। किसी बच्चे का शिक्षा से महरूम रह जाना केवल एक परिवार का नुकसान नहीं, बल्कि पूरी कौम के भविष्य के लिए चिंता का विषय है। इसलिए हर माँ-बाप, शिक्षक, उलेमा और समाज के ज़िम्मेदार लोगों को मिलकर ऐसा माहौल बनाना चाहिए, जिसमें हर बच्चा इल्म हासिल कर सके और अपनी सलाहियतों को समाज की ख़िदमत में इस्तेमाल कर सके।
समाज की इस्लाह और अच्छे अख़लाक़:
शिक्षा का मक़सद केवल डिग्री हासिल करना या नौकरी पाना नहीं, बल्कि इंसान को बेहतर इंसान बनाना भी है। अगर किसी समाज में पढ़े-लिखे लोग तो हों, लेकिन उनमें सच्चाई, ईमानदारी, इंसाफ़, हमदर्दी और ज़िम्मेदारी का एहसास न हो, तो ऐसी शिक्षा समाज की तमाम समस्याओं का हल नहीं बन सकती। अल्लाह तआला क़ुरआन में फ़रमाता है: “इन्नल्लाहा ला युग़य्यिरु मा बि-क़ौमिन हत्ता युग़य्यिरू मा बि-अनफ़ुसिहिम” यानी “बेशक अल्लाह किसी क़ौम की हालत नहीं बदलता, जब तक वे ख़ुद अपनी हालत न बदलें।” (सूरह अर-रअद, 13:11)।
यह आयत हमें अपनी व्यक्तिगत और सामाजिक ज़िंदगी में सुधार लाने की दावत देती है। हमें झूठ, ग़ीबत, आपसी नफ़रत, नाइंसाफ़ी और दूसरे की हक़तलफ़ी से बचना चाहिए। इमाम अली (अ.स.) की सीरत हमें सिखाती है कि इंसाफ़, अमानतदारी और कमज़ोरों के अधिकारों की हिफ़ाज़त एक नेक समाज की बुनियाद हैं। जब हम अपने किरदार को बेहतर बनाएँगे, तभी हमारी कौम की इस्लाह का रास्ता आसान होगा।
अहलेबैत (अ.स.) की तालीमात और समाज की ज़िम्मेदारी:
अहलेबैत (अ.स.) की ज़िंदगी इल्म, अमल, इंसाफ़ और इंसानियत का बेहतरीन नमूना है। इमाम जाफ़र सादिक़ (अ.स.) की तालीमात ने लोगों को ज्ञान हासिल करने, हक़ को पहचानने और सही अमल अपनाने की प्रेरणा दी। इमाम हुसैन (अ.स.) की कुर्बानी हमें सिखाती है कि समाज की इस्लाह के लिए सच्चाई, इंसाफ़ और दीन की बुनियादी क़द्रों पर क़ायम रहना ज़रूरी है।
आज हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम मस्जिदों, इमामबाड़ों, मदरसों और दूसरे सामाजिक इदारों को शिक्षा, अख़लाक़ी तर्बियत और जनकल्याण का केंद्र बनाएँ। उलेमा का काम लोगों को दीन की सही समझ देना है, शिक्षकों का काम नई नस्लों को ज्ञान और चरित्र देना है और माँ-बाप की ज़िम्मेदारी बच्चों को अच्छी तर्बियत देना है।

साथ ही, समाज के साहिब-ए-हैसियत लोगों को चाहिए कि वे ज़रूरतमंद विद्यार्थियों की पढ़ाई में मदद करें, ताकि आर्थिक मजबूरी किसी बच्चे की शिक्षा में रुकावट न बने। यही अहलेबैत (अ.स.) की मोहब्बत का एक अहम तक़ाज़ा है कि हम उनकी तालीमात को अपनी ज़िंदगी में उतारें।
नौजवानों की तर्बियत और कौम का मुस्तक़बिल:
मौलाना ने कहां, किसी भी कौम की असली ताक़त उसके नौजवान होते हैं। अगर नौजवान इल्म, हुनर, अच्छे अख़लाक़ और अपने दीन से वाबस्तगी रखते हों, तो कौम का भविष्य रोशन हो सकता है। लेकिन अगर हमारी नई नस्ल शिक्षा से दूर हो जाए, अपना वक़्त बेफ़ायदा कामों में गुज़ारे और अपनी ज़िम्मेदारियों को भूल जाए, तो समाज की तरक्की प्रभावित होती है।
क़ुरआन-ए-मजीद में अल्लाह तआला फ़रमाता है: “रब्बि ज़िद्नी इल्मा” यानी “ऐ मेरे रब! मेरे इल्म में इज़ाफ़ा फ़रमा।” (सूरह ताहा, 20:114)। यह दुआ हमें हमेशा ज्ञान में वृद्धि की कोशिश करने की प्रेरणा देती है। नौजवानों को चाहिए कि वे दीनी और दुनियावी शिक्षा हासिल करें, अपने माता-पिता का सम्मान करें, उस्तादों की क़द्र करें, समाज के कमज़ोर तबक़ों की मदद करें और तकनीक तथा आधुनिक ज्ञान को सकारात्मक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल करें। साथ ही, हमें बेटियों की शिक्षा पर भी उतना ही ध्यान देना चाहिए, क्योंकि शिक्षित और अच्छी तर्बियत पाने वाली महिलाएँ परिवार और समाज की बेहतरी में अहम भूमिका निभाती हैं।
मौलाना सैयद मासूम रज़ा कैफ़ी ने कहां, हमें यह बात अपने दिलों में बिठा लेनी चाहिए कि कौम की तरक्की केवल भाषणों और नारों से नहीं होगी, बल्कि उसके लिए लगातार अमल करना होगा। हर मोहल्ले में शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए, ग़रीब बच्चों की मदद की जाए, नौजवानों को सही राह दिखाई जाए, आपसी इख़्तिलाफ़ात को हिकमत और भाईचारे से हल किया जाए और समाज में इंसाफ़ तथा इंसानियत को फ़रोग़ दिया जाए।
अल्लाह तआला सूरह अल-माइदा, आयत 2 में नेकी और तक़वा के कामों में एक-दूसरे की मदद करने का हुक्म देता है। इसलिए हमें एक-दूसरे का सहारा बनना चाहिए और समाज की इस्लाह को अपनी साझा ज़िम्मेदारी समझना चाहिए। आइए, हम अहद करें कि अपने बच्चों को शिक्षा दिलाएँगे, अपने अख़लाक़ को बेहतर बनाएँगे और ज़रूरतमंदों की मदद करेंगे। परवरदिगार! हमें इल्म-ए-नाफ़े, नेक अमल और अच्छे अख़लाक़ की दौलत अता फ़रमा। हमारी कौम में इत्तेहाद, मोहब्बत और भाईचारा क़ायम फ़रमा। हमारी नई नस्लों को दीनी और दुनियावी शिक्षा से आरास्ता फ़रमा और हमें समाज की इस्लाह करने वालों में शामिल फ़रमा। आमीन, या रब्बल आलमीन।
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