गुरुवार 17 सितंबर 2026 - 12:07
नई पीढ़ी की तरबीयत से कौम का उज्ज्वल भविष्य

हौज़ा / हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सय्यद ऐनुल हुसैन नजफी ने कहां,नई नस्ल किसी भी कौम का भविष्य होती है। अगर बच्चों और युवाओं की सही धार्मिक, नैतिक और सामाजिक तर्बियत की जाए तो आने वाली पीढ़ी मजबूत विचार, अच्छे अख्लाक और ज़िम्मेदारी की भावना के साथ समाज की सेवा कर सकती है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन सय्यद ऐनुल हुुुसैन नजफी से एक इंटरव्यू हुआ इस मौके पर उन्होंने सामाजिक और पारिवारिक जिम्मेदारियां की ओर विस्तार से प्रकाश डाला,और कहां,नई नस्ल किसी भी कौम का भविष्य होती है। अगर बच्चों और युवाओं की सही धार्मिक, नैतिक और सामाजिक तर्बियत की जाए तो आने वाली पीढ़ी मजबूत विचार, अच्छे अख्लाक और ज़िम्मेदारी की भावना के साथ समाज की सेवा कर सकती है।

इंटरव्यू कुछ इस तरह है:

हौज़ा न्यूज़ : मौलाना साहब सलामुन अलैकुम हमारा पहला सवाल,आज के दौर में नई नस्ल की सही तर्बियत को इतना महत्वपूर्ण क्यों माना जा रहा है?

मौलाना सय्यद ऐनुल हुुुसैन नजफी : नई नस्ल किसी भी कौम का भविष्य होती है। अगर बच्चों और युवाओं की सही धार्मिक, नैतिक और सामाजिक तर्बियत की जाए तो आने वाली पीढ़ी मजबूत विचार, अच्छे अख्लाक और जिम्मेदारी की भावना के साथ समाज की सेवा कर सकती है। कुरआन में अल्लाह फरमाता है:
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا قُوا أَنفُسَكُمْ وَأَهْلِيكُمْ نَارًا
ऐ ईमान वालों! अपने आपको और अपने घरवालों को उस आग से बचाओ, जिसका ईंधन इंसान और पत्थर हैं।
सूरह अत-तहरीम, 66:6 इस आयत से यह स्पष्ट होता है कि अपनी और अपने परिवार की सही तर्बियत हमारी महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारियों में शामिल है।

हौज़ा न्यूज़ : बच्चों की तर्बियत में माता पिता की क्या भूमिका है?

मौलाना सय्यद ऐनुल हुुुसैन नजफी : बच्चे सबसे पहले अपने घर से सीखते हैं। माता-पिता का व्यवहार, बातचीत, इबादत, सच्चाई और दूसरों के साथ अच्छा बर्ताव बच्चों के व्यक्तित्व पर गहरा असर डालता है। इमाम अली (अ.) से मंसूब मशहूर रिवायत है कि बच्चे का दिल खाली जमीन की तरह होता है, उसमें जो डाला जाए उसे स्वीकार कर लेता है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों को केवल पढ़ाई तक सीमित न रखें, बल्कि नमाज, कुरआन, अहले-बैत (अ.स.) की मोहब्बत अच्छे अख्लाक और इंसानियत की शिक्षा भी दें।

हौज़ा न्यूज़ : अहले-बैत (अ.स.) की तालीम नई नस्ल की तर्बियत में किस तरह मददगार हो सकती है?

मौलाना सय्यद ऐनुल हुुसैन नजफी : अहले बैत (अ.स.) की सीरत हमारे लिए मुकम्मल तरबीयती नमूना है। इमाम हुसैन (अ.स.) की जिंदगी हमें इज्जत, सब्र, इंसाफ और सत्य के लिए दृढ़ रहने का संदेश देती है। इमाम अली (अ.स.) की सीरत हमें ज्ञान, न्याय और इंसानियत सिखाती है। अगर बच्चों को अहले-बैत (अ.स.) की सीरत केवल घटनाओं के रूप में नहीं बल्कि उनके जीवन के व्यावहारिक आदर्शों के रूप में समझाई जाए तो उनके अंदर अच्छे चरित्र और ज़िम्मेदारी की भावना पैदा हो सकती है।

हौज़ा न्यूज़ : आज सोशल मीडिया और इंटरनेट के दौर में बच्चों की तर्बियत के सामने क्या चुनौतियां हैं?

मौलाना सय्यद ऐनुल हुुसैन नजफी : आज बच्चों और युवाओं के पास जानकारी के बहुत से स्रोत हैं। यह अवसर भी है और चुनौती भी। हर जानकारी सही नहीं होती। इसलिए बच्चों को केवल मोबाइल और इंटरनेट से दूर करना समाधान नहीं, बल्कि उन्हें सही और गलत जानकारी में फर्क करना सिखाना जरूरी है। उन्हें यह समझाना होगा कि किसी खबर या वीडियो को बिना जांचे आगे बढ़ाना उचित नहीं है। साथ ही माता-पिता और शिक्षक बच्चों के साथ संवाद बनाए रखें, ताकि वे अपनी परेशानियां और सवाल खुलकर साझा कर सकें।

हौज़ा न्यूज़ : स्कूल और धार्मिक संस्थाएं नई नस्ल की तर्बियत में क्या भूमिका निभा सकती हैं?

मौलाना सय्यद ऐनुल हुुसैन नजफी : स्कूल बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र है और मदरसे, मस्जिदें तथा धार्मिक संस्थाएं उन्हें धार्मिक और नैतिक मार्गदर्शन देती हैं। दोनों के बीच सकारात्मक तालमेल जरूरी है। शिक्षक बच्चों की मानसिकता और उम्र के तकाजों को समझें और धार्मिक मार्गदर्शन करने वाले लोग भी नई नस्ल के सवालों और आधुनिक परिस्थितियों को समझें। केवल आदेश देने के बजाय संवाद और तर्क के माध्यम से बच्चों को धर्म की खूबसूरती समझाना अधिक प्रभावी हो सकता है।

हौज़ा न्यूज़ : कुरआन और इस्लामी तालीम बच्चों के चरित्र निर्माण में किस तरह भूमिका निभाती है?

मौलाना सय्यद ऐनुल हुुुसैन नजफी : कुरआन इंसान के पूरे जीवन के लिए मार्गदर्शन देता है। बच्चों को कुरआन की आयतें याद कराने के साथ-साथ उनका अर्थ और जीवन में उनका इस्तेमाल भी समझाना चाहिए। अल्लाह तआला सूरह अल-अहज़ाब में रसूल-ए-अकरम (स.ल.) को हमारे लिए आदर्श बताते हुए फरमाता है: "यकीनन तुम्हारे लिए रसूलुल्लाह में बेहतरीन नमूना है। (सूरह अल-अहज़ाब, 33:21)। शिया रिवायतों में भी अहले-बैत (अ.स.) की तालीम और उनकी सीरत से जुड़ाव को विशेष महत्व दिया गया है। इसलिए नई नस्ल को कुरआन और अहले-बैत (अ.स.) की शिक्षाओं से जोड़ना उनके अखलाकी और आध्यात्मिक विकास का महत्वपूर्ण माध्यम है।

हौज़ा न्यूज़ : अंत में माता-पिता, शिक्षकों और समाज के लिए आपका क्या संदेश है?

मौलाना सय्यद ऐनुल हुुुसैन नजफी : हमें यह समझना होगा कि बच्चों की तर्बियत केवल माता-पिता की जिम्मेदारी नहीं बल्कि पूरे समाज की साझा जिम्मेदारी है। बच्चों को समय देना, उनकी बात सुनना, उनके सवालों का सम्मान करना और अपने अमल से उनके सामने अच्छा उदाहरण पेश करना जरूरी है। हम चाहते हैं कि हमारी नई नस्ल ईमानदार, शिक्षित, जिम्मेदार और अहले-बैत (अ.स.) की शिक्षाओं से जुड़ी हुई हो तो हमें आज से ही उनकी तर्बियत पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। आज के बच्चों की सही तर्बियत ही कल की मजबूत और बेहतर कौम की बुनियाद है।

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