हौजा / हज़रत आयतुल्लाहिल उज़्मा सय्यद अली ख़ामेनेई ने एक सवाल के जवाब में यह वज़ाहत फ़रमाई है कि किन सूरतों में एक ही वुज़ू से कई फ़र्ज़ नमाज़ें अदा की जा सकती हैं।
हौज़ा / गुस्ल-ए-जुमा हालांकि एक मुअक्कद मस्तहब है, लेकिन वुजू का स्थान नहीं ले सकता। इसलिए फर्ज़ नमाज़ या किसी भी ऐसे काम के लिए जिसमें पाकीज़गी की शर्त हो, वुजू ज़रूरी है। केवल गुस्ल-ए-जनाबत…