हौज़ा / मौला! आज हम फिर आपके दर पर खड़े हैं। मगर इस बार हमारी आवाज़ में सिर्फ दुआ नहीं, एक जलता हुआ दर्द है। एक सुलगती हुई फ़रियाद है। एक ऐसा कर्ब है जो सदियों से हमारे सीनों में दफ़्न है!