कर्बला हमें यह नहीं सिखाती कि केवल रोया जाए—बल्कि यह सिखाती है कि पहचाना जाए, समझा जाए, और फिर निर्णय लिया जाए। क्योंकि हर युग का मनुष्य अपनी जगह एक छोटे से कर्बला में खड़ा होता है।