हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लिमीन तबातबाई अश्क़ज़री ने मशहद में बातचीत करते हुए कहा कि इमाम सज्जाद (अ.स.), इमाम हुसैन (अ.स.) के बाद इमामत के पद पर आसीन हुए और उन्होंने अपना पूरा जीवन विशिष्ट गुणों के साथ व्यतीत किया।उन्होंने बताया कि इमाम सज्जाद (अ.स.) के प्रमुख उपनामों में से एक ज़ैनुल आबिदीन है, जो स्वयं रसूल-ए इस्लाम हज़रत मुहम्मद (स.) द्वारा प्रदान किया गया था।
उन्होंने आगे कहा कि ज़ैनुल आबिदीन का यह उपनाम केवल इस संसार तक सीमित नहीं है, बल्कि क़यामत के दिन भी इमाम सज्जाद (अ.स.) को इसी नाम से पुकारा जाएगा।
रिवायतों में आया है कि जब क़यामत के दिन पुकार लगाई जाएगी कि “ज़ैनुल आबिदीन कहाँ हैं?तो इमाम सज्जाद (अ.स.) क़यामत की पंक्तियों के बीच चलते हुए आएँगे और अपने रब के सामने अपना परिचय देंगे। यह रिवायत उनके महान आध्यात्मिक और इबादती मुकाम को दर्शाती है।
उन्होने सहिफ़ा सज्जादिया के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मानवता के लिए इमाम सज्जाद (अ.स.) की सबसे बड़ी विरासत सहिफ़ा सज्जादिया है।
उन्होंने कहा कि यह ग्रंथ वास्तव में दुआओं पर आधारित एक पूर्ण प्रशिक्षण विद्यालय है जो मनुष्य की व्यक्तिगत, नैतिक और सामाजिक जीवन तथा ईश्वर से संबंध के विभिन्न पहलुओं में मार्गदर्शन करता है। यह पवित्र पुस्तक एक दैवीय चमत्कार है, जो इमाम सज्जाद (अ.) की ज़बान से ईश्वर से प्रार्थना के रूप में प्रकट हुई।
हुज्जतुल इस्लाम तबातबाई अश्क़ज़री ने महान मुहद्दिस व शोधकर्ता इब्ने शहरे आशूब का हवाला देते हुए कहा कि अपनी प्रसिद्ध पुस्तक मनाक़िब आले अबी तालिब में वे लिखते हैं कि बसरा के कुछ साहित्यकारों ने जब सहिफ़ा ए सज्जादिया को देखा तो पहले उसे महत्व नहीं दिया, लेकिन जब उनमें से एक ने वैसा ही ग्रंथ लिखने का प्रयास किया तो वह उसे पूरा नहीं कर सका और उसी प्रयास के दौरान उसकी मृत्यु हो गई।
उन्होंने कहा कि यह घटना सहिफ़ा ए सज्जादिया की आध्यात्मिक और दैवीय शक्ति का स्पष्ट प्रमाण है।
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