हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , ख़ुरासान रिज़वी में वली-ए-फ़क़ीह के नुमाइंदे आयतुल्लाह सैयद अहमद अलमुल होदा ने हौज़ा-ए-इल्मिया ख़ुरासान के मुआविन-ए-इल्मी हुज्जतुल इस्लाम मेंहदी रज़ाई से मुलाक़ात के दौरान कहा,आज हौज़ा-ए-इल्मिया में इस्लामी निज़ाम और मुल्क की निज़ामत से जुड़े फ़िक़्ह पर दरकार तवज्जो मौजूद नहीं है और इस ख़ला को तालीमी प्रोग्रामों में मक्सूदाना तौर पर पूरा किया जाना चाहिए, ताकि तुल्लाब इसके बुनियादी उसूलों को सही तौर पर समझ सकें और इस मैदान में ज़िम्मेदारी का एहसास और इल्मी जज़्बा उनमें मज़बूत हो।
उन्होंने इस बात पर ज़ोर देते हुए कि फ़िक़्ह-ए-हुकूमती इस्लामी निज़ाम की क़तई ज़रूरत है, कहा, ज़रूरी है कि ख़ारिज़ के दुरूस में हज़रत इमाम ख़ुमैनी (रह) की फ़िक्री मंज़ूमा और बुनियादी उसूलों से इल्हाम लिया जाए और उन्हें अमल में लाया जाए, ताकि यह रुझान धीरे-धीरे हौज़ा की तालीमी सक़ाफ़त का हिस्सा बन सके।
ख़ुरासान रिज़वी में वली-ए-फ़क़ीह के नुमाइंदे ने मज़ीद कहा: मैंने गुज़िश्ता सालों में फ़िक़्ह-ए-हुकूमती, आम अवामी मुक़ावमत और अम्नियत जैसे मौज़ूआत पर बहसें पेश की हैं और तवक़्क़ो है कि दीगर असातिज़ा भी इन मैदानों में दाख़िल हों, बल्कि पेश किए गए मवाद पर तनक़ीद और दोबारा जाँच भी करें, लेकिन अफ़सोस कि अब तक इस इल्मी सलाहियत से कम फ़ायदा उठाया गया है।
आयतुल्लाह अलमुल होदा ने कहा कि समाज के रोज़मर्रा और मौजूदा मसाइल का तजज़िया हौज़वी दुरूस के मत्न में शामिल होना चाहिए। अगर यह रास्ता हौज़ा में अपनाया जाए तो तुल्लाब के इल्मी माहौल में सरगर्मी, ताज़गी और ज़माने के मुताबिक़ रहने की रूह मज़बूत होगी और हौज़ा इस्लामी इंक़िलाब की फ़िक्री रहनुमाई में अपना बुनियादी किरदार अदा कर सकेगा।
इस मुलाक़ात के इब्तिदा में, हौज़ा-ए-इल्मिया ख़ुरासान के मुआविन-ए-इल्मी हुज्जतुल इस्लाम मेहदी रज़ाई ने हौज़ा के निज़ाम-ए-जामे तालीम, अब तक की गई कार्रवाइयों, मंसूबों और तालीमी पैकेजों पर एक रिपोर्ट पेश की और तब्दीली व रोज़-आमदी के सफ़र में हौज़ा की इल्मी और तालीमी कामयाबियों की वज़ाहत की।
आपकी टिप्पणी