हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , रहबर की विशेषज्ञ परिषद के सदस्य और प्रमुख धर्मगुरु हुज्जतुल इस्लाम वाल मुस्लिमीन सैयद मोहम्मद मेंहदी मीरबाक़री ने हज़रत फ़ातिमा मासूमा (स.अ.) के हरम में आयोजित एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि दुनिया में चल रहा संघर्ष मूल रूप से दो प्रकार का है। एक वह जो सत्ता और धन के लिए होता है और आमतौर पर भौतिक शक्तियों के बीच चलता रहता है, जबकि दूसरा संघर्ष ईश्वरीय पैग़म्बरों और ताग़ूती शक्तियों के बीच तौहीद और शिर्क के मुद्दे पर होता है।
उन्होंने पवित्र कुरआन का हवाला देते हुए कहा कि भौतिक शक्तियाँ हालाँकि सतही तौर पर एकजुट दिखती हैं, लेकिन उनके दिल एक-दूसरे से जुड़े नहीं होते, क्योंकि वे केवल अपने हितों के ग़ुलाम होते हैं। इसके विपरीत, पैग़म्बरों (अ.स.) का संघर्ष ईश्वर की उपासना और मानवता के मार्गदर्शन के इर्द-गिर्द रहा है।
हुज्जतुल इस्लाम मीरबाक़री ने कहा कि अल्लाह तआला ने सत्य की विजय का वादा किया है और इतिहास में हज़रत मूसा (अ.स.), हज़रत इब्राहीम (अ.स.) और हज़रत नूह (अ.स.) के उदाहरण इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि ईश्वरीय सहायता भौतिक गणनाओं से ऊपर होती है।
उन्होंने आगे कहा कि कुरआन एक ओर रक्षात्मक तैयारी का आदेश देता है और दूसरी ओर उस पर घमंड करने से मना करता है, क्योंकि वास्तविक सहारा केवल अल्लाह की शक्ति है। मोमिन शत्रु की धमकियों से इसलिए नहीं डरता क्योंकि वह अल्लाह की मदद पर विश्वास रखता है।
उन्होंने कहा कि इस्लामी गणतंत्र ईरान वैश्विक अहंकारी (साम्राज्यवादी) व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता और आज मुस्लिम उम्माह में प्रतिरोध अक्ष की भूमिका निभा रहा है। दुश्मन वास्तव में ईरान की भौतिक शक्ति से नहीं बल्कि इस्लामी सभ्यता की बढ़ती हुई सॉफ्ट पावर से भयभीत है।
अंत में उन्होंने कहा कि ईरानी क़ौम ने इस्लाम का परचम ऊँचा कर रखा है, जो आध्यात्मिक और नैतिक शक्ति का प्रतीक है, और यही कारण है कि अहंकारी शक्तियाँ इसके खिलाफ हर तरह की साजिशों में लगी हुई हैं।
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