हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , बच्चों के ज़ेहन में ख़ुदा से जुड़े सवालों के जवाब देने से पहले सबसे ज़रूरी बात यह है कि उनके साथ समझ-बूझ और बातचीत का माहौल बनाया जाए। ये सवाल हुज्जतुल इस्लाम ग़ुलाम रज़ा हैदरी अबहरी की किताब
«बच्चों के लिए क़ुरआनी ख़ुदा-शिनासी» से लिए गए हैं, जो सादा लेकिन गहरे सवालों के ज़रिए बच्चों को ख़ुदा के बारे में सोचने का रास्ता दिखाती है।
प्यारे बच्चो!
क्या कभी ऐसा हुआ है कि तुमने ख़ुदा से कोई चीज़ माँगी हो, लेकिन तुम्हें लगा हो कि तुम्हारी दुआ क़ुबूल नहीं हुई?
शायद तुमने दिल में सोचा हो:फिर मैंने दुआ क्यों की?
सबसे पहले यह बात अच्छी तरह जान लो:
ख़ुदा बहुत मेहरबान है, और वही हमें दुआ करने की दावत देता है।
क़ुरआन में ख़ुदा फ़रमाता है:मैं क़रीब हूँ, और जब कोई मुझे पुकारता है, तो मैं उसकी दुआ क़ुबूल करता हूँ।
अगर ख़ुदा हमारी मदद नहीं करना चाहता, तो वह हमें कभी दुआ करने को न कहता।
लेकिन अब एक अहम सवाल:
अगर ख़ुदा हर इंसान की हर दुआ को, बिल्कुल उसी वक़्त और उसी तरह पूरी कर दे जैसा वह चाहता है, तो क्या होगा?
मिसाल के तौर पर,एक किसान दुआ करता है कि बारिश हो जाए ताकि उसकी फ़सल अच्छी हो।
उसी वक़्त एक मुसाफ़िर दुआ करता है कि बारिश न हो ताकि वह भीगे नहीं।
बताओ, ख़ुदा किसकी दुआ क़ुबूल करे?
या यह देखो:
एक दुकानदार दुआ करता है कि चीज़ें महँगी हो जाएँ ताकि उसे ज़्यादा फ़ायदा हो।
लोग दुआ करते हैं कि चीज़ें सस्ती हों ताकि आसानी से ख़रीद सकें।
देखा?
कुछ दुआएँ आपस में टकरा जाती हैं।
एक और ज़रूरी बात:
कभी-कभी हम ऐसी चीज़ माँगते हैं जो हमें अच्छी लगती है,
लेकिन ख़ुदा जानता है कि वह हमारे लिए अच्छी नहीं है।
जैसे:एक बच्चा दुआ करता है कि वह रोज़ बहुत ज़्यादा मिठाई खा सके,लेकिन ख़ुदा जानता है कि ज़्यादा मिठाई पेट-दर्द और दाँत ख़राब होने का सबब बनती है।
या:
बहुत से लोग दुआ करते हैं कि वे बहुत अमीर हो जाएँ,लेकिन ख़ुदा जानता है कि कुछ लोग ज़्यादा दौलत पाकर या तो ग़लत रास्ते पर चले जाते हैं
या पहले से ज़्यादा परेशान हो जाते हैं।
ख़ुदा हमसे बहुत प्यार करता है,
और इसी लिए वह हमारी हर ख़्वाहिश पूरी नहीं करता।
क़ुरआन में आया है:कुछ चीज़ें तुम्हें पसंद होती हैं, लेकिन वे तुम्हारे लिए नुक़सानदेह होती हैं।
कभी-कभी ख़ुदा कहता है,अभी नहीं… बाद में।
हम इंसान जल्दबाज़ होते हैं,
हम चाहते हैं कि सब कुछ फ़ौरन हो जाए।
लेकिन ख़ुदा हमेशा सबसे बेहतर वक़्त जानता है।
मिसाल के तौर पर:तुम दुआ करते हो कि तुम्हें एक छोटी सी किताब मिल जाए,
ख़ुदा तुम्हें थोड़ा सब्र देता है
और फिर तुम्हें कई अच्छी और फ़ायदेमंद किताबें अता कर देता है।
हमें लगता है कि शायद ख़ुदा हमारी बात नहीं सुन रहा,हालाँकि हक़ीक़त यह होती है कि वह हमारी सोच से भी बेहतर चीज़ हमारे लिए तैयार कर रहा होता है।
याद रखो:
दुआ, ख़ुदा से बात करने का नाम है।
बिल्कुल ऐसे ही,जैसे किसी बहुत मेहरबान दोस्त से बात की जाती है।
तुम किसी भी वक़्त,
किसी भी जगह,और किसी भी ज़बान में ख़ुदा से बात कर सकते हो।
यह अपने आप में एक बहुत बड़ी नेमत है।
और अगर ख़ुदा तुम्हारी दुआ उसी तरह पूरी न करे जैसी तुम चाहते हो,
तो भी तुम खाली हाथ नहीं लौटते:
या तो वही चीज़ मिल जाती है
या उससे बेहतर चीज़ मिलती है
या तुम्हारे लिए अज्र और सवाब लिखा जाता है
और सबसे अहम बात:तुम्हारा दिल मुतमइन हो जाता है।
इसलिए
कभी दुआ करना मत छोड़ो
और कभी मायूस मत हो।
दुआ हमेशा हमारे फ़ायदे में होती है,
क्योंकि ख़ुदा हमारी सोच से कहीं ज़्यादा मेहरबान है।
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