लेखकः मौलाना साजिद मुहम्मद रिज़वी
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी ! इंसान की ज़िंदगी में कुछ पल ऐसे होते हैं जो आम दिनों जैसे नहीं होते। वह सिर्फ़ वक़्त नहीं, बल्कि ख़ास नेमत होते हैं। वह सिर्फ़ महीने नहीं, बल्कि अल्लाह की विशेष कृपा (ख़ास रहमत) होते हैं। उन्हीं बरकत भरे लम्हों में से एक वह घड़ी है जब माहे मुबारक रमज़ान का चाँद नज़र आता है और दिलों में उम्मीद, आँखों में रौशनी और रूह में एक नई ताज़गी महसूस होने लगती है।
रमज़ान कोई साधारण महीना नहीं है। यह इबादत का महीना है, आत्म-सुधार (इस्लाह-ए-नफ़्स) का महीना है, दिल को पाक करने और चरित्र (किरदार) को मज़बूत बनाने का सुनहरा अवसर है। खुशकिस्मत हैं वे लोग जो इस महीने का स्वागत तैयारी, लगन और समझ (शऊर) के साथ करते हैं।
क़ुरआन और रमज़ान का गहरा संबंध
रमज़ान की महानता सिर्फ़ इस वजह से नहीं कि इसमें रोज़े रखे जाते हैं, बल्कि इसलिए कि इसी महीने में अल्लाह तआला ने इंसानियत की रहनुमाई के लिए अपना पवित्र कलाम, क़ुरआन मजीद, नाज़िल फ़रमाया। इसी हक़ीक़त को बयान करते हुए अल्लाह तआला फ़रमाता है:
"شَهْرُ رَمَضَانَ الَّذِي أُنزِلَ فِيهِ الْقُرْآنُ هُدًى لِلنَّاسِ وَبَيِّنَاتٍ مِّنَ الْهُدَىٰ وَالْفُرْقَانِ"
(सूरह अल-बक़रह 2:185)
तरजुमा: रमज़ान वह महीना है जिसमें क़ुरआन उतारा गया, जो इंसानों के लिए मार्गदर्शन (हिदायत) है, और सच व झूठ के बीच साफ़ फ़र्क़ करने वाली रोशन दलील है।
यानी अल्लाह ने खुद रमज़ान की पहचान क़ुरआन से कराई है। अगर रमज़ान आए और हमारा क़ुरआन से नाता मज़बूत न हो, तो समझ लीजिए हमने इस महीने की असली रूह को नहीं पाया।
इस्तिक़बाल-ए-रमज़ान का पहला कदम यही है कि हमारे घरों में तिलावत की आवाज़ गूँजे, बच्चे भी क़ुरआन पढ़े, और हम उसे समझकर अपनी ज़िंदगी में लागू करने का इरादा करें।
हदीस-ए-रसूल (स) और रमज़ान की फ़ज़ीलत
क़ुरआन ने जब रमज़ान की अज़मत बयान कर दी, तो हमारे प्यारे नबी (स) ने भी इस महीने की रूहानी फज़ीलत को यूँ समझाया:
"إِذَا جَاءَ رَمَضَانُ فُتِّحَتْ أَبْوَابُ الْجَنَّةِ وَغُلِّقَتْ أَبْوَابُ النَّارِ وَصُفِّدَتِ الشَّيَاطِينُ"
(सहीह बुख़ारी)
अनुवाद: जब रमज़ान आता है तो जन्नत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, जहन्नम के दरवाज़े बंद कर दिए जाते हैं और शैतानों को बाँध दिया जाता है।
सोचिए! जब जन्नत के दरवाज़े खुले हों, जहन्नम के दरवाज़े बंद हों और शैतान क़ैद हो, तो फिर रुकावट क्या रह जाती है? रुकावट सिर्फ़ हमारी लापरवाही (ग़फ़लत) है। इसलिए रमज़ान का स्वागत करने का मतलब है कि हम अपनी ग़फ़लत छोड़ दें और इबादत की राह पकड़ लें।
रमज़ान का इस्तिक़बाल कैसे करें?
जब यह महीना इतना महान है तो सवाल उठता है कि इसका स्वागत किस तरह किया जाए?
रमज़ान का इस्तिक़बाल सिर्फ़ तारीख़ बदलने से नहीं होता, बल्कि नीयत बदलने से होता है।
*कुछ ज़रूरी बातें:*
1. तौबा और इस्तिग़फ़ार
दिल को साफ़ करें। दिल में अगर किसी के लिए नफ़रत या जलन हो तो उसे निकाल दें। साफ़ दिल में ही रहमत उतरती है।
2. नीयत की नई शुरुआत
यह इरादा करें कि यह रमज़ान हमारी ज़िंदगी का सबसे अच्छा रमज़ान होगा। कौन जाने यह आख़िरी मौका हो।
3. क़ुरआन से जुड़ाव
रोज़ थोड़ा-थोड़ा क़ुरआन पढ़े। कोशिश करें कि उसका मतलब भी समझें।
4. नमाज़ की पाबंदी
ख़ास तौर पर फ़ज्र की नमाज़ और जमाअत की नमाज़ की आदत डालें।
5. दूसरों की मदद
रमज़ान सिर्फ़ भूखे रहने का नाम नहीं, बल्कि गरीबों और ज़रूरतमंदों का ख़याल रखने का महीना है।
रोज़े का असली मक़सद
अल्लाह तआला फ़रमाता है:
> "يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا كُتِبَ عَلَيْكُمُ الصِّيَامُ ... لَعَلَّكُمْ تَتَّقُونَ"
(सूरह अल-बक़रह 2:183)
तरजुमा: ऐ ईमान वालों! तुम पर रोज़े फ़र्ज़ किए गए ताकि तुम परहेज़गार बनो।
यानी रोज़े का मक़सद सिर्फ़ भूखा-प्यासा रहना नहीं, बल्कि तक़वा पैदा करना है, अल्लाह का डर और उसकी याद दिल में बसाना है।
- आइए! इस रमज़ान का स्वागत दिखावे से नहीं, दिल की सच्चाई से करें।
- सिर्फ़ इफ़्तार की तैयारी न करें, बल्कि अपनी आख़िरत की भी तैयारी करें।
- सिर्फ़ खाने की मेज़ न सजाएँ, बल्कि अपने दिल को भी सजाएँ।
- शायद यही रमज़ान हमारी ज़िंदगी बदल दे।
- शायद यही महीना हमारे गुनाहों को माफ़ करा दे।
अल्लाह तआला हमें इस माहे मुबारक रमज़ान की क़द्र करने और उसकी बरकतों से पूरा फ़ायदा उठाने की तौफ़ीक़ अता फ़रमाए। आमीन।
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