मंगलवार 24 मार्च 2026 - 17:08
कूफ़ा में सफ़ीर-ए-हुसैनी हज़रत मुस्लिम बिन अकील अलैहिस्सलाम की आमद

हौज़ा / 5 शव्वाल 60 हिजरी को सफ़ीर-ए-हुसैनी, वफ़ा और बसीरत के पैकर हज़रत मुस्लिम बिन अकील अलैहिस्सलाम कूफ़ा में दाख़िल हुए, ताकि अपने आक़ा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क़ियाम के लिए ज़मीनी हक़ायक़ का जायज़ा लें और अहल-ए-कूफ़ा की बैअत को अमली शक्ल दें। यही आमद आगे चलकर वाक़ेआ-ए-कर्बला का तमहीदी बाब बनी।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,5 शव्वाल 60 हिजरी को सफ़ीर-ए-हुसैनी, वफ़ा और बसीरत के पैकर हज़रत मुस्लिम बिन अकील अलैहिस्सलाम कूफ़ा में दाख़िल हुए, ताकि अपने आक़ा इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के क़ियाम के लिए ज़मीनी हक़ायक़ का जायज़ा लें और अहल-ए-कूफ़ा की बैअत को अमली शक्ल दें। यही आमद आगे चलकर वाक़ेआ-ए-कर्बला का तमहीदी बाब बनी।

जब 60 हिजरी में यज़ीद बिन मुआविया को इक्तेदार मिला, तो उसने अपनी बैअत को लाज़िम क़रार दिया और सियासी फ़िज़ा में जब्र का अनासिर वाज़ेह हो गए। मदीना में जब इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से बैअत का मुतालबा किया गया, तो आपने उसे उसूली बुनियाद पर मुस्तरद फरमाया। इस इनकार ने एक अख़लाक़ी व दीनदाराना मुज़ाहमत की बुनियाद रखी।

कूफ़ा, जो अमीरुल मोमिनीन अली अलैहिस्सलाम के दौर में दारुल-ख़िलाफ़त रह चुका था, अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की मोहब्बत का मरकज़ था। चुनांचे वहां से हज़ारों ख़ुतूत मक्का पहुँचे, जिनमें इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम को दावत दी गई कि आप तशरीफ़ लाएँ।

इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने हिकमत से काम लेते हुए पहले तहक़ीक़ का फ़ैसला किया और अपने मोतबर चचाज़ाद भाई हज़रत मुस्लिम बिन अकील अलैहिस्सलाम को कूफ़ा रवाना किया।

कूफ़ा पहुँचकर उन्होंने पहले हज़रत मुख़्तार बिन अबी उबैदा और बाद में हज़रत हानी बिन उरवा के घर को अपना मरकज़ बनाया। लोग जूक़ दर
जूक़ आते, बैअत करते और अहद-ए-वफ़ा बाँधते। र'वायतों के मुताबिक 12 से 18 हज़ार अफ़राद ने बैअत की। शहर में उम्मीद की एक नई लहर दौड़ गई।

मगर जल्द ही हालात बदल गए। उबैदुल्लाह बिन ज़ियाद को कूफ़ा भेजा गया, जिसने डर, लालच और सियासी चालों से माहौल को बदल दिया। क़बायली सरदारों को ख़रीद लिया गया, अवाम को डराया गया और हामियों को सज़ा दी गई। नतीजतन, हज़ारों की बैअत सिमट कर चंद अफ़राद तक रह गई।

आख़िरकार एक दिन ऐसा आया कि मस्जिद-ए-कूफ़ा में हज़रत मुस्लिम अलैहिस्सलाम तन्हा रह गए। यह तारीख़ का दिल दहला देने वाला मंज़र था, मगर उनकी अज़मत का बुलंद मरहला भी। उन्होंने हक़ से दस्तबरदार होना क़बूल न किया।

आख़िर उन्हें गिरफ़्तार किया गया और दारुल-इमारह की छत पर शहीद कर दिया गया। उनका जिस्म कूफ़ा की गलियों में घसीटा गया, मगर उनकी क़ुर्बानी तारीख़ में हमेशा ज़िंदा हो गई।

5 शव्वाल हमें यह पैग़ाम देता है कि सफ़ीर होना सिर्फ़ पैग़ाम पहुँचाना नहीं, बल्कि उस पर जान निछावर करना भी है।

सलाम हो हज़रत मुस्लिम बिन अकील अलैहिस्सलाम पर, जिन्होंने कूफ़ा की तन्हाई में वफ़ा की ऐसी मिसाल क़ायम की कि तारीख़ आज भी उनके नाम से रौशन है۔

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