रविवार 5 जुलाई 2026 - 09:52
19 मुहर्रम; कर्बला के क़ैदीयो का काफ़ला कूफ़ा से शाम की ओर रवाना हुआ

हौज़ा / 19 मुहर्रमुल हराम 61 हिजरी, तारीख़-ए-कर्बला का वह दर्दनाक और फ़ैसला-कुन मरहला है जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अहल-ए-बैत (अ.स.) और जानिसारों के लुटे हुए क़ाफ़िले को कूफ़ा से शाम की ओर रवाना किया गया। यह वही मुक़द्दस क़ाफ़िला था जिसने मैदान-ए-कर्बला में फ़र्ज़ंद-ए-रसूल (स.) हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, हज़रत अब्बास अलमदार अलैहिस्सलाम, हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम, जवानान-ए-बनी हाशिम और वफ़ादार अस्हाब की अज़ीम क़ुर्बानियों को अपनी आँखों से देखा था। लेकिन इन तमाम मसाइब के बावजूद न उनके ईमान में कोई लग्ज़िश आई और न उनके अज़्म व इस्तिक़ामत में कोई कमी पैदा हुई।

लेखक : मौलाना सय्यद अली हाशिम आब्दी

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,19 मुहर्रमुल हराम 61 हिजरी, तारीख़-ए-कर्बला का वह दर्दनाक और फ़ैसला-कुन मरहला है जब हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम के अहल-ए-बैत (अ.स.) और जानिसारों के लुटे हुए क़ाफ़िले को कूफ़ा से शाम की ओर रवाना किया गया। यह वही मुक़द्दस क़ाफ़िला था जिसने मैदान-ए-कर्बला में फ़र्ज़ंद-ए-रसूल (स.) हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, हज़रत अब्बास अलमदार अलैहिस्सलाम, हज़रत अली अकबर अलैहिस्सलाम, जवानान-ए-बनी हाशिम और वफ़ादार अस्हाब की अज़ीम क़ुर्बानियों को अपनी आँखों से देखा था। लेकिन इन तमाम मसाइब के बावजूद न उनके ईमान में कोई लग्ज़िश आई और न उनके अज़्म व इस्तिक़ामत में कोई कमी पैदा हुई।

कर्बला की सरज़मीन अभी शोहदा-ए-हक़ के ख़ून से मुअत्तर थी। अहल-ए-बैत (अ.) के ख़ेमे जला दिए गए थे, बच्चे यतीम हो चुके थे और ख़वातीन को असीर बना लिया गया था। इसी हालत में इस मुक़द्दस क़ाफ़िले को कूफ़ा से शाम की तरफ़ रवाना कर दिया गया। ज़ाहिरी तौर पर यह असीरी का सफ़र था, लेकिन हक़ीक़त में यही सफ़र पैग़ाम-ए-कर्बला की आलमगीर इशाअत का ज़रिया बना।

हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने इस सफ़र के हर मरहले में बेमिसाल सब्र, इस्तिक़ामत, बसीरत और शुजाअत का मुज़ाहिरा किया। अगर हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम ने कर्बला में अपने मुक़द्दस ख़ून से दीन-ए-इस्लाम को हयात-ए-नौ बख़्शी, तो हज़रत ज़ैनब सलामुल्लाह अलैहा और हज़रत इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम ने कूफ़ा और शाम में अपने तारीखी ख़ुत्बों के ज़रिए उस क़ुर्बानी के हक़ीक़ी मक़सद को उम्मत के सामने आश्कार कर दिया। उनकी हक़गोई ने ज़ुल्म के ऐवानों को लरज़ा दिया और बातिल के चेहरे से नक़ाब हटा दी।

ज़ालिम हुक्मरानों ने अहल-ए-बैत-ए-रसूल (स.) को हर मुमकिन अज़ीयत पहुँचाने की कोशिश की। उन्हें शोहदा के बे-सर जनाज़ों के दरमियान से गुज़ारा गया, बाज़ारों और गलियों में फिराया गया और क़ैद व बंद की सख़्तियाँ बर्दाश्त कराई गईं। लेकिन आले-मुहम्मद (स.) ने हर आज़माइश का सामना सब्र, रज़ा और तवक्कुल के साथ किया। इसी सब्र ने ज़ुल्म को शिकस्त दी और असीरी को तारीख़ की अज़ीमतरीन फ़त्ह में बदल दिया।

वाक़िआ-ए-कर्बला हमें यह भी सिखाता है कि जब इक्तिदार, दुनियातलबी और ख़्वाहिशात-ए-नफ़्स इंसान पर ग़ालिब हो जाएँ, तो वह हक़ को पहचानने के बावजूद उसका साथ छोड़ देता है। तारीख़ ने साबित कर दिया कि दुनिया की ख़ातिर हक़ से मुँह मोड़ने वाले रुस्वा हुए, जबकि हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम और अहल-ए-बैत-ए-अतहार अलैहिमुस्सलाम का नाम इज़्ज़त, अज़मत और हक़परस्ती की अलामत बनकर हमेशा के लिए ज़िंदा हो गया।

शाम के दरबार में हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम के तारीखी ख़ुत्बों ने यज़ीदी इक्तिदार की हक़ीक़त को दुनिया के सामने बेनक़ाब कर दिया। यज़ीद का प्रोपेगेंडा दम तोड़ गया और यह हक़ीक़त वाज़ेह हो गई कि कर्बला में शहीद होने वाले बाग़ी नहीं थे, बल्कि दीन-ए-मुहम्मदी (स.) के हक़ीक़ी मुहाफ़िज़ थे, जबकि ज़ुल्म व सितम करने वाले तारीख़ के मुजरिम बन गए।

क़ाफ़िला-ए-असीरान-ए-कर्बला का सफ़र आज भी इंसानियत को यह दर्स देता है कि हक़ का रास्ता आज़माइशों से ज़रूर गुज़रता है, लेकिन उसका अंजाम इज़्ज़त और कामयाबी है। ज़ुल्म, जब्र, क़ैद व बंद और मसाइब अहल-ए-हक़ के अज़्म को कमज़ोर नहीं करते, बल्कि उन्हें और मज़बूत बनाते हैं।

यही पैग़ाम हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम, हज़रत ज़ैनब कुबरा सलामुल्लाह अलैहा और हज़रत इमाम ज़ैनुल आबिदीन अलैहिस्सलाम ने अपने किरदार, सब्र और क़ुर्बानी के ज़रिए इंसानियत को अता फ़रमाया।

आज मुहर्रमुल हराम के अय्याम में जब इन मसाइब को याद किया जाता है, तो अहल-ए-ईमान के दिल ग़म-ए-हुसैन (अ.) से लबरेज़ हो जाते हैं। यह ग़म मायूसी का नहीं, बल्कि ईमान, वफ़ादारी, हक़पसंदी और मुहब्बत-ए-अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की तज्दीद का नाम है। वाक़िआ-ए-कर्बला और क़ाफ़िला-ए-असीरान-ए-अहल-ए-बैत (अ.) का सफ़र हमें हमेशा यह पैग़ाम देता रहेगा कि बातिल वक़्ती तौर पर ग़ालिब दिखाई दे सकता है, मगर दाइमी फ़त्ह हमेशा हक़ ही का मुक़द्दर होती है।

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