हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, अल-अजहर जैसी प्रतिष्ठित संस्था से अपेक्षा की जाती है कि वह क्षेत्रीय मुद्दों पर निष्पक्ष, सटीक और व्यापक दृष्टिकोण के साथ बोले। लेकिन बयान में ईरान की निंदा पर जोर देते हुए क्षेत्रीय तनाव के अन्य प्रमुख कारकों—जैसे अमेरिका की सैन्य उपस्थिति, इजराइल का समर्थन और फिलिस्तीन मुद्दे—की अनदेखी की गई है। साथ ही, ईरानी सैन्य और नागरिक हस्तियों की शहादत जैसी घटनाओं का उल्लेख न करके बयान को "अधूरी रिवायत" करार दिया गया है।
आलोचनाओं का एक अन्य बिंदु धार्मिक ग्रंथों का उपयोग है। बयान में कुरान की आयतों को उन आरोपों के समर्थन में लाया गया है, जिनकी क्षेत्रीय रिपोर्टों से पुष्टि नहीं होती। यह तर्क दिया गया है कि ईरान के हमले अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर थे, न कि अरब देशों की नागरिक आबादी पर—ऐसे में धार्मिक ग्रंथों का इस तरह इस्तेमाल "न्यायसंगत नहीं" माना जा रहा है।
विश्लेषकों के अनुसार, सबसे बड़ी चिंता यह है कि जब कोई धार्मिक संस्था किसी राजनीतिक विवाद में एक पक्ष लेती है, तो उसकी बात धार्मिक फैसले की तरह ली जाती है—जिससे मौजूदा विभाजन और गहरा सकता है। इससे इस्लामी एकता को मजबूत करने की अपेक्षित भूमिका कमजोर पड़ती है।
अल-अजहर की सदियों पुरानी प्रतिष्ठा उसकी स्वतंत्रता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर टिकी है। ऐसे में बयान पर व्यापक प्रतिक्रियाएँ यह संकेत देती हैं कि धार्मिक अधिकारिता की विश्वसनीयता को लेकर संवेदनशीलता पहले से कहीं अधिक है।
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