हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,मौला! आज हम फिर आपके दर पर खड़े हैं। मगर इस बार हमारी आवाज़ में सिर्फ दुआ नहीं, एक जलता हुआ दर्द है। एक सुलगती हुई फ़रियाद है। एक ऐसा कर्ब है जो सदियों से हमारे सीनों में दफ़्न है!
यब्नल हसन! क्या आप सुनते हैं बक़ीअ की वो ख़ामोश चीखें…? वो क़ब्रें जो बे-निशान कर दी गईं, वो मज़ारात जो मिटा दिए गए, वो चिराग़ जो बुझा दिए गए…
मौला! जन्नतुल बक़ीअ आज भी आपको पुकार रही है। हर टूटी हुई क़ब्र, हर बिखरी हुई मिट्टी, हर ख़ामोश साया चीख-चीख कर कह रहा है:
"ऐन साहिबज़-ज़मान?!"
या साहिबज़्ज़मान! हमारी आँखें रो रही हैं… मगर बक़ीअ की मिट्टी ख़ून रो रही है! हमारे दिल तड़प रहे हैं मगर तारीख़ खुद सिसक रही है! ये सिर्फ क़ब्रें नहीं गिराई गईं मौला,
ये हमारे दिलों को तोड़ा गया है। ये हमारी पहचान को मिटाने की कोशिश की गई है, ये अहले बैत अलैहिमुस्सलाम की मोहब्बत को दबाने की जसारत की गई है!
मौला! हम कब तक ये दर्द उठाएँ…? कब तक ये सन्नाटा बर्दाश्त करें…? कब तक बक़ीअ की वीरानी पर आँसू बहाते रहें…?
ऐ मेरे इमाम! अगर कर्बला में नैज़े थे… तो बक़ीअ में ख़ामोशी के ख़ंजर हैं! अगर वहाँ ख़ून बहा था… तो यहाँ तारीख़ को दफ़्न किया गया है! अगर वहाँ सर कटे थे… तो यहाँ पहचानें मिटाई गई हैं!
या बक़ीयतल्लाह! हम आपको पुकारते हैं। टूटे हुए दिलों के साथ। लरज़ती हुई आवाज़ों के साथ। बहते हुए आँसुओं के साथ…
आईए मौला… आईए! जन्नतुल बक़ीअ आपकी मुन्तज़िर है, वो क़ब्रें आपकी राह देख रही हैं, वो मिट्टी आपके क़दमों की आहट सुनना चाहती है!
मौला! हम कमज़ोर हैं… हम बिखरे हुए हैं, मगर हमारे दिलों में एक आग है… एक इश्क़ है… एक अहद है!
हम अहद करते हैं या इमाम कि हम बक़ीअ को नहीं भूलेंगे! कि हम इस मज़लूमियत को ज़िंदा रखेंगे! कि हम हर आँसू को सदा बनाएँगे। हर सदा को तहरीक बनाएँगे… और हर तहरीक को इन्क़िलाब बनाएँगे!
या साहिबज़्ज़मान! हमें अपनी निगाह-ए-करम से देख लीजिए, हमें अपनी नुसरत में शामिल कर लीजिए, हमें वो ताक़त दे दीजिए कि हम हक़ के लिए खड़े हो सकें, हमें वो जुरअत दे दीजिए कि हम बातिल के सामने झुक न सकें!
मौला! जन्नतुल बक़ीअ की वीरानी अब बर्दाश्त नहीं होती, ये सन्नाटा अब दिल को चीरता है, ये ख़ामोशी अब रूह को ज़ख़्मी करती है…
या इमाम! एक नज़र… सिर्फ एक नज़र! और ये वीरानियाँ गुलज़ार बन जाएँगी, ये ख़ामोश क़ब्रें फिर से बोल उठेंगी, ये मिट्टी फिर से नूर बन जाएगी!
"अल्लाहुम्मा अज्जिल लिवलिय्यिकल फ़राज… अल्लाहुम्मा अज्जिल लिवलिय्यिकल फ़राज… अल्लाहुम्मा अज्जिल लिवलिय्यिकल फ़राज"
या बक़ीयतल्लाह! हम मुन्तज़िर हैं, रोते हुए, तड़पते हुए, जलते हुए दिलों के साथ…
हम मुन्तज़िर हैं उस दिन के जब आप आएँगे और बक़ीअ फिर से ज़िंदा हो जाएगा!!!
अस्सलामु अलैक या साहिबज़्ज़मान, हमारी फ़रियाद सुन लीजिए मौला, हम टूट चुके हैं…
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