हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,आज विश्व जिस दौर से गुज़र रहा है,वह मात्र राजनीतिक संघर्ष नहीं,बल्कि सत्य और असत्य के बीच एक खुला युद्ध है। एक ओर पीड़ितों की व्यथाएं हैं, तो दूसरी ओर अत्याचारियों की शक्ति और उनके समर्थकों की चुप्पी।खेद का विषय यह है कि इस्लामी जगत जो कभी न्याय और निष्पक्षता का ध्वजवाहक था,आज बिखराव, स्वार्थपरता और उदासीनता का शिकार प्रतीत होता है।
यह एक कटु सत्य है कि जहाँ मुसलमानों को एक इकाई बनकर पीड़ितों के पक्ष में खड़े होना चाहिए था, वहीं वे आपसी मतभेदों,स्वार्थों और सत्ता की राजनीति में उलझकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो चुके हैं। अनेक मुस्लिम राष्ट्र आज प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से वैश्विक साम्राज्यवादी शक्तियों, विशेषकर अमेरिका और यहूदीवाद के हितों की रक्षा करते प्रतीत होते हैं।
यहूदीवाद, जो केवल एक राजनीतिक विचारधारा नहीं, बल्कि एक आक्रामक और विस्तारवादी योजना है।
उन्होंने फ़िलिस्तीन,विशेषकर ग़ज़ा को मलबे में तब्दील कर दिया।मासूम बच्चों, स्त्रियों और असहाय मनुष्यों का लहू बहाया गया, फिर भी विश्व चेतना मौन रही।अत्यंत विषादपूर्ण यह है कि इस अत्याचार के समक्ष अनेक मुस्लिम शासक केवल कथनी तक ही सीमित रहे, जबकि कतिपय ने तो अपने निजी स्वार्थों के चलते मौन धारण कर इस अन्याय को बल प्रदान किया।
विशेषतःअरब जगत के शासकों का आचरण अत्यंत खेदजनक है।एक ओर तो “इस्लाम के दो पवित्रतम स्थल”(मक्का और मदीना) से संबंध और धार्मिक नेतृत्व का दावा, और दूसरी ओर राजसी प्रासाद,विलासितापूर्ण समारोह और पाश्चात्य जीवनशैली यह पाखंड उम्मत के घावों पर नमक छिड़कने के सदृश्य है। जब उम्मत का एक अंश लहूलुहान हो, तब दूसरे अंश का भोग-विलास में डूबा होना एक निर्विवाद सत्य के रूप में प्रकट होता है।
ऐसे अंधकारमय दौर में कुछ नेतृत्व आशा की किरण बनकर उभरते हैं।शहीद-ए-मिल्लत आयतुल्लाह अल-उज़्मा ख़ामेनेई और उनके शहीद-ए-वाफ़ा साथियों ने जो दृढ़ता,साहस और वैचारिक परिपक्वता का प्रदर्शन किया, वह इतिहास में सुनहरे अक्षरों से लिखा जाएगा।
उन्होंने न केवल अपने रुख़ पर अटल रहने का हौसला दिखाया, बल्कि अपने व्यावहारिक जीवन से यह साबित भी किया कि नेतृत्व का वास्तविक मापदंड सादगी, बलिदान और उसूलों का पालन है यह एक अकाट्य सत्य है कि जब दुनिया के अधिकांश शासक अपनी सुख-सुविधाओं और हितों के दास बन चुके हैं,वहाँ ईरानी नेतृत्व ने स्वयं को और अपने परिवार को भी इसी संघर्ष का हिस्सा बनाया।यह व्यवहार इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि उनका संघर्ष व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं,बल्कि एक विचारधारा और उम्मत के सम्मान के लिए है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल दर्शक बनकर तटस्थ न रहें।इतिहास साक्षी है कि मौन अक्सर अत्याचारी को बल प्रदान करता है। जैसा कि कवि ने कहा है:
"न कहने से भी वाक्पटुता का गौरव छीन लिया जाता है
अत्याचार सहने से भी अत्याचारी की सहायता होती है।
इस विकट काल में, सबसे बड़ी आवश्यकता है - जागृति,एकता और विवेक।हमें संप्रदायिक, भाषाई और क्षेत्रीय मतभेदों से ऊपर उठकर शत्रु को पहचानना होगा और सत्य का पक्ष लेना होगा।यही वह मार्ग है जो हमें सम्मान दिला सकता है और उत्पीड़ितों के लिए आशा का प्रकाश स्तंभ बन सकता है।
मौलाना तहसीन रज़ा क़ुम, ईरान
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