हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, वेटिकन में ईरान के राजदूत और शोध संस्थान 'उर्वतुल वुस्क़ा' के प्रमुख हुज्जतुल इस्लाम वल मुस्लेमीन मुहम्मद हुसैन मुख्तारी ने अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के ईरानी जनता के प्रति अपमानजनक बयान पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है।
उन्होंने कहा कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने बेशर्मी से ईरानी राष्ट्र, उसके इतिहास और प्राचीन सभ्यता का अपमान किया है। यह भाषा अतिशयोक्ति, अपमान और शक्ति प्रदर्शन पर आधारित है, जो 'दूसरे' को तुच्छ समझने वाली सोच से पैदा होती है।
तर्क की दृष्टि से इस प्रकार की बात में कई भ्रांतियाँ हैं:
- सामान्यीकरण की भ्रांति: एक पूरे राष्ट्र को उसकी विशाल सांस्कृतिक विविधता के बावजूद एक सरल नकारात्मक छवि में सीमित कर देना।
- अपमान की भ्रांति: तर्क के बजाय एक पूरे राष्ट्र के अस्तित्व पर हमला करना।
- शक्ति की भ्रांति: यह मान लेना कि 'सामर्थ्य रखने' का अर्थ 'अधिकार रखना' है, जबकि नैतिक वैधता के बिना शक्ति का कोई मूल्य नहीं।
कांट के शब्दों में, मनुष्य 'स्वयं में साध्य' हैं, साधन नहीं। किसी भी राष्ट्र को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए अपमानित या नष्ट नहीं किया जा सकता।
ऐतिहासिक दृष्टि से ईरान:
ईरान का इतिहास केवल फ़ारसी भाषियों की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के इतिहास का एक मूलभूत अध्याय है। हख़ामनी साम्राज्य से लेकर इस्लामी काल तक, ईरान ने दर्शन, चिकित्सा और गणित में विश्व स्तरीय योगदान दिया। इब्न सीना, ख्वारिज्मी और अबूरैहान अल-बिरूनी जैसे विद्वानों ने वैश्विक विज्ञान के इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। ईरान की विशेषता इसकी ऐतिहासिक निरंतरता है — बदलाव के बावजूद अपनी सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना।
नैतिक और दार्शनिक विश्लेषण:
किसी राष्ट्र को 'पाषाण युग' में वापस ले जाने की धमकी देना, उस राष्ट्र को 'गरिमा से युक्त कर्ता' से 'नष्ट करने योग्य वस्तु' में बदल देना है। यह मानवीय गरिमा का सीधा उल्लंघन है। यदि यह नियम सामान्य हो जाए, तो यह अराजकता, स्थायी युद्ध और वैश्विक व्यवस्था के विनाश का कारण बनेगा।
हिंसक लोकलुभावनवाद (पॉपुलिज़म):
यह भाषा 'हिंसक लोकलुभावनवाद' का एक रूप है, जो 'हम' और 'उनके' के बीच द्वंद्व पैदा करता है और दूसरे को राक्षसी रूप देता है। इसका उद्देश्य भय पैदा करना, भावनाओं को भड़काना और 'बड़े दूसरे' के अपमान के माध्यम से राजनीतिक लामबंदी करना है। यह संवाद को अस्वीकार करता है और वास्तविक समझ को असंभव बना देता है।
निष्कर्ष:
भावनात्मक विवाद में पड़ने के बजाय इस प्रकार के राजनीतिक प्रवचन की दार्शनिक आलोचना प्रस्तुत करता है। राजनीति, यदि मानवीय गरिमा और संवाद की तर्कसंगतता से अलग हो जाए, तो अपनी वैधता खो देती है। ऐसे बयानों की निंदा केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि एक तर्कसंगत और नैतिक आवश्यकता है।
कोई भी राष्ट्र, चाहे उसके पास कितनी भी शक्ति क्यों न हो, किसी दूसरे राष्ट्र को उसके इतिहास और संस्कृति से वंचित करने का अधिकार नहीं रखता। यदि इस प्रकार की भाषा को अनुत्तरित छोड़ दिया गया, तो यह धीरे-धीरे मौखिक हिंसा और फिर वास्तविक हिंसा को सामान्य बना देगी। इसलिए इसका मुकाबला किसी विशेष देश की रक्षा नहीं, बल्कि मानवीय सह-अस्तित्व के मूलभूत सिद्धांतों की रक्षा है।
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