मंगलवार 14 अप्रैल 2026 - 12:00
हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम के युग के एक अत्यंत महत्वपूर्ण रहस्य का पूर्ण:

हौज़ा / शहीद क्रांति के नेता ने किताब “इंसान २५० साल” में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के दौर-ए-इमामत के एक महत्वपूर्ण राज़ की ओर इशारा किया है जो इतिहास के दिल में एक बड़े परिवर्तन को जन्म देने वाला था।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,शहीद क्रांति के नेता ने किताब “इंसान २५० साल” में इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम के दौर-ए-इमामत के एक महत्वपूर्ण राज़ की ओर इशारा किया है जो इतिहास के दिल में एक बड़े परिवर्तन को जन्म देने वाला था।

जब इमाम बाकिर अलैहिस्सलाम का निधन हुआ तो इस अवधि में इमाम बाकिर और इमाम सज्जाद अलैहिस्सलाम द्वारा किए गए अनेक कार्यों के परिणामस्वरूप,परिस्थितियाँ बहुत हद तक पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि व आलिहि व सल्लम के परिवार के पक्ष में बदल चुकी थीं।

मैं दो शब्दों में आपके लिए इमाम बाकिर और इमाम सादिक़ अलैहिमुस्सलाम की योजना उजागर करना चाहता हूँ; ऐसी योजना जो उस समय निश्चित रूप से एक रहस्य थी।वही रहस्य, जिनके बारे में आपने सुना होगा कि मसलन जाबिर बिन यज़ीद जुअफ़ी राज़दारों में से थे और जो भी हमारे राज़ को फैलाए उस पर ख़ुदा की लानत हो, वग़ैरह। वे ही रहस्य, जिन्हें यदि उस समय ज़ाहिर किया जाता तो वह लानत का कारण बनते।

मैं इन्हीं बातों को उजागर करना चाहता हूँ, लेकिन आज इन्हें उजागर करने में कोई हर्ज़ नहीं; बल्कि यह ज़रूरी है कि लोग जानें कि इमाम का मक़सद क्या था।

इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की योजना यह थी कि इमाम बाकिर अलैहिस्सलाम के शहजत के बाद मामलों को समेटकर एक खुला क़ियाम शुरू करें और बनी उमय्या की हुकूमत जो हर दिन बदलती हुई हालत और उमवी निज़ाम की चरम कमज़ोरी का निशान थी को उलट दें।

ख़ुरासान, रय, इस्फ़हान, इराक़, हिजाज़, मिस्र, मोरक्को और सभी मुस्लिम-आबादी वाले इलाक़ों से जहाँ-जहाँ इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम का राजनीतिक संगठन यानी शिया, फैला हुआ था—फ़ौजें मदीना आएँ; और इमाम वहाँ से शाम की तरफ़ चढ़ाई करें शाम की हुकूमत को ख़त्म करें, ख़ुद ख़िलाफ़त का परचम बुलंद करें और मदीना में पैग़म्बर सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की हुकूमत क़ायम करें।

यह इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की योजना थी।
इसलिए जब इमाम बाक़िर अलैहिस्सलाम के आख़िरी दिनों में उनकी ख़िदमत में बात होती है और उनसे पूछा जाता है कि “क़ाइम-ए-आल-ए-मुहम्मद” कौन है, तो हज़रत इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम की तरफ़ देखकर फ़रमाते हैं: “ऐसा लगता है कि मैं देख रहा हूँ कि क़ाइम-ए-आल-ए-मुहम्मद वही हैं।
बेशक, आप जानते हैं कि क़ाइम-ए-आल-ए-मुहम्मद”एक आम नाम है, कोई ख़ास नाम नहीं; और यह विशेष रूप से वली-ए-अस्र सलवातुल्लाह अलैह का नाम नहीं है।

हज़रत वली-ए-अस्र सलवातुल्लाह अलैह आल-ए-मुहम्मद के आख़िरी क़ाइम हैं; लेकिन जो भी व्यक्ति समय-समय पर आल-ए-मुहम्मद में से उठ खड़ा हुआ है—चाहे उसे विजय मिली हो या न मिली हो—उसे क़ाइम-ए-आल-ए-मुहम्मद माना जाता है। 

और वे रिवायतें, जिनमें कहा गया है: “जब हमारा क़ाइम क़ियाम करेगा तो यह काम करेगा, वह अदल फैलाएगा, वह सुख-समृद्धि पैदा करेगा,” उनका मतलब सिर्फ़ हज़रत वली-ए-अस्र नहीं था; बल्कि उस समय मुराद यह थी कि आल-ए-मुहम्मद में से जो भी हक़ और अदल की हुकूमत क़ायम करने के लिए उठेगा, वह ये काम करेगा। 

और यह बात सही भी थी; इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम उस दिन के क़ाइम-ए-आल-ए-मुहम्मद बनने वाले थे। ऐसी स्थिति में इमाम सादिक़ अलैहिस्सलाम इमामत के पद पर पहुँचते हैं।

लेखक :तहसीन रज़ा कुम,ईरान

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