हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार ,हौज़ा ए इल्मिया के प्रमुख आयतुल्लाह अली रज़ा आराफी ने 'उस्ताद और मुअल्लिम सप्ताह' के अवसर पर एक संदेश जारी कर सभी शिक्षकों और मुरब्बियों को श्रद्धांजलि दी है। उनके संदेश का पाठ कुछ निम्नलिखित है:
بسم الله الرحمن الرحیم
هُوَ الَّذِی بَعَثَ فِی الْأُمِّیِّینَ رَسُولًا مِّنْهُمْ یَتْلُو عَلَیْهِمْ آیَاتِهِ وَیُزَکِّیهِمْ وَیُعَلِّمُهُمُ الْکِتَابَ وَالْحِکْمَةَ
शिक्षक दिवस की हार्दिक बधाई। मैं सभी गौरवशाली शहीदों की आत्माओं को सलाम करता हूँ, ख़ासतौर पर शहीद रहबर इमाम शहीद आयतुल्लाह ख़ामेनेई शहीद उस्तादों और शिक्षकों को जो शिक्षा और प्रशिक्षण, विश्वविद्यालयों और हौज़ात ए इल्मिया से जुड़े थे विशेष रूप से शहीद उस्ताद आयतुल्लाह मुतह्हरी (र.ह) को श्रद्धांजलि रेश करता हु।
हर दिन उस्तादों और रहनुमाओं के प्रकाश से रोशन और सफल होती है, शहीद मुतहहरी की शहादत की वर्षगाँठ उन पाकबाज़ और बलिदानी शिक्षकों को याद करने का अवसर है, जो इस दुनिया से विदा हो चुके हैं, ख़ासकर वे शहीद जो उस्तादों और शिक्षकों की पंक्ति में थे।
साथ ही यह दिन सभी शैक्षणिक, सांस्कृतिक, हौज़वी और विश्वविद्यालय संस्थानों में मौजूद हमारे प्रिय उस्तादों के प्रति प्रेम और प्रतिबद्धता को दोहराने, आभार और शुक्रिया अदा करने का भी अवसर है।
इस्लामी और हौज़वी नज़रिए से उस्ताद का दर्जा आसमानी दर्जा है। यह अल्लाह के खूबसूरत नामों का प्रतिबिंब है और नबुव्वत रिसालत और इमामत के सूरज की किरण है।
उस्ताद और शिक्षक का सबसे बड़ा कर्तव्य विद्यार्थियों और प्रिय नवयुवकों का पूर्ण और संतुलित प्रशिक्षण करना और उन्हें उचित मार्गदर्शन देना है। यही कारण है कि शिक्षा एक ज्ञान भी है, एक कला और कौशल भी है, और यह ईमान, प्रेम, समर्पण और बलिदान पर आधारित है। इसी आधार पर उस्ताद, शिक्षक और मुरब्बी का हक़ सबसे बड़े ईश्वरीय और मानवीय अधिकारों में से एक है।
हौज़ात ए इल्मिया की परंपरा में उस्ताद का स्थान बहुत ऊँचा और सदा याद रखा जाने वाला है। उस्ताद और शागिर्द (विद्यार्थी) का रिश्ता स्थायी और मजबूत रिश्ता होता है। हौज़े के सिस्टम में शागिर्दी और उस्तादी की परंपराओं में अनेक रहस्य और हिकमतें छिपी हैं।
मैं अपने दिल की गहराइयों से सभी रहनुमाओं, उस्तादों, शिक्षकों और मुरब्बियों को, विशेष रूप से बुज़ुर्ग उस्तादों को, सलाम, श्रद्धांजलि और शुक्रिया अदा करता हूँ। और मैं उन सभी उस्तादों का भी शुक्रिया अदा करता हूँ जिन्होंने हक़ और बातिल के इस संघर्ष में और अमेरिकी-सियोनी युद्ध के दिनों में जो ईरान, इस्लाम, इस्लामी क्रांति, मुस्लिम उम्माह और मेहवर-ए-मुक़ावमत के ख़िलाफ़ था साहस और बलिदान के साथ भूमिका निभाई और सड़कों, चौराहों, प्रचार तथा व्याख्या के मोर्चों पर अपनी प्रिय जनता, अपने विद्यार्थियों, शागिर्दों, विद्वानों और सम्मानित धर्मगुरुओं के साथ मिलकर लोगों के साथी और मार्गदर्शक बने रहे।
मुझे उम्मीद है कि यह भूमिका निभाना यह ईमानी और क्रांतिकारी उपस्थिति सदा जारी रहेगी, और यह कि बुज़ुर्ग उस्तादों के रिश्ते शुरुआती स्तर से लेकर बाहरी इज्तिहाद और विशेषज्ञता के उच्च पाठ पढ़ाने वाले उस्तादों तक विद्यार्थियों, शागिर्दों और प्रशासकों के साथ क़ायम रहें और प्रिय विद्यार्थियों की शैक्षणिक और आध्यात्मिक उन्नति का कारण बनें, और हौज़ा, रूहानियत और राष्ट्र की पंक्तियों को मजबूती प्रदान करें।
ए अल्लाह, तू ईरान की जनता, मेहवर-ए-मुक़ावमत, मुस्लिम उम्माह और हज़रत वली-ए-अस्र इमाम मेहदी के सैनिकों के लिए विजय और सफलता निर्धारित कर। वलायत और मर्जईयत की छाया को सदा बनाए रख और इस्लाम तथा ईरान के सशस्त्र बलों को गौरवान्वित और सफल बना।
अली रज़ा अराफ़ी
प्रमुख हौज़ा ए इल्मिया ईरान
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