बुधवार 6 मई 2026 - 09:09
हौज़ा ए इल्मिया की ज़िम्मेदारी 'जन-आंदोलन' को 'जेहाद-ए-तबयीन' के मैदान में मार्गदर्शन करना है

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन रज़ाई तेहरानी ने देश के सामाजिक परिदृश्यों में जनता की निरंतर और व्यापक उपस्थिति का उल्लेख करते हुए, 'जन आंदोलन' के साकार होने को क्रांति के नेताओं के वादों की पूर्ति का एक उदाहरण बताया और इस बात पर जोर दिया कि हौज़ा ए इल्मिया का आज का मुख्य मिशन इस जन आंदोलन को सही दिशा में मार्गदर्शन देना, जेहाद-ए-तबयीन को मजबूत करना और दुश्मन के संज्ञानात्मक युद्ध का बुद्धिमानी से मुकाबला करना है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के संवाददाता के साथ एक विशेष साक्षात्कार में मशहद के हौज़ा ए इल्मिया के उच्च स्तरों के प्रोफेसर हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन अली रज़ाई तेहरानी ने पिछले कुछ हफ्तों में देश के सामाजिक परिदृश्यों में लोगों की निरंतर उपस्थिति का उल्लेख करते हुए, इस जन आंदोलन को दिशा देने में रूहानियत और हौज़ा ए इल्मिया की केंद्रीय भूमिका पर जोर दिया।

मशहद के उच्च धार्मिक शिक्षा केंद्र के प्रोफेसर ने कहा कि पिछले साठ दिनों से लोग सड़कों पर हैं और यह शहीद नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई के उस कथन का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि "जब भी इस्लामी निज़ाम पर कोई खतरा आता है, खुदा लोगों को उठाता है"।

हुज्जतुल-इस्लाम रज़ाई तेहरानी ने इस बात पर जोर दिया कि इस पड़ाव पर सबसे बड़ी चुनौती इस जन-सैलाब को सही रास्ते पर रखना है। उन्होंने कहा, "यह जिम्मेदारी हौज़ा इल्मिया के विद्वानों और धार्मिक छात्रों के कंधों पर है। यह काम केवल निजी तौर पर बात करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके लिए बड़े स्तर पर प्रबंधन, संगठन और मीडिया प्रबंधन की भी आवश्यकता है।"

इस वरिष्ठ विद्वान ने समाज में धार्मिक वर्ग की भूमिका को रेखांकित करते हुए कहा कि हौज़ा के लोग वास्तव में 'देश के सर्वोच्च नेता के विचार और संस्कृति के एंटीना' होते हैं। यह उनका कर्तव्य है कि वे नेता के इशारों को सटीकता से पहचानें और उन्हें समाज में प्रवाहित करें। उन्होंने स्पष्ट किया कि रूहानियत का काम केवल लोगों के साथ खड़ा होना नहीं है, बल्कि लोगों का नेतृत्व और सांस्कृतिक मार्गदर्शन करना भी शामिल है।

हुज्जतुल-इस्लाम रज़ाई तेहरानी ने मीडिया, विशेषकर सरकारी टेलीविजन को, जनता की उपस्थिति दिखाते समय अत्यधिक सतर्कता बरतने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि जहाँ लोगों की भीड़ दिखाना ज़रूरी है, वहीं यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कैमरों के लालच में कोई असामाजिक या अनैतिक व्यवहार उभार कर न दिखाया जाए।

उन्होंने आगाह किया कि हो सकता है कि भीड़ में कुछ ऐसे लोग भी हों जिनकी पोशाक या हरकतें ठीक न हों, लेकिन उन्हें बार-बार दिखाकर सामान्य नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि दुश्मन इसी तरह की तस्वीरों का इस्तेमाल सांस्कृतिक हमले के लिए करते हैं।

मशहद के इस प्रोफेसर ने विश्वास दिलाया कि जो 95 प्रतिशत से अधिक लोग सामाजिक क्षेत्रों में सक्रिय हैं, वे मूल्य-उन्मुख और ईमानदार नागरिक हैं। उन्होंने कहा कि बाकी लोगों को अपनी ओर खींचने का माहौल बनाना चाहिए, न कि उनकी गलतियों को उजागर करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संज्ञानात्मक युद्ध और 'जेहाद-ए-तबयीन' के मैदान में आज रूहानियत की विद्वत्तापूर्ण उपस्थिति पहले से कहीं ज्यादा जरूरी है। यह जन-आंदोलन एक अमूल्य पूंजी है, और इसे सही दिशा देना ही हौज़ा इल्मिया की असली रिसालत है।

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