मंगलवार 19 मई 2026 - 11:30
किसी भी धर्म के धार्मिक स्थलों और उपासना स्थलों पर बलपूर्वक कब्ज़ा करना मानवीय शराफत के खिलाफ है: मौलाना अली हैदर फरिश्ता

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मध्य प्रदेश के इंदौर खंडपीठ के उच्च न्यायालय के हालिया फैसले को, जिसमें भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को सरस्वती मंदिर घोषित किया गया है, गलत, अनुचित, ऐतिहासिक साक्ष्यों, सरकारी अभिलेखों के विपरीत और स्वयं पुरातत्व विभाग के पिछले रुख से विरोधाभासी बताया है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने मध्य प्रदेश के इंदौर खंडपीठ के उच्च न्यायालय के हालिया फैसले को, जिसमें भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर को सरस्वती मंदिर घोषित किया गया है, गलत, अनुचित, ऐतिहासिक साक्ष्यों, सरकारी अभिलेखों के विपरीत और स्वयं पुरातत्व विभागके पिछले रुख से विरोधाभासी बताया है।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रवक्ता डॉ. सय्यद कासिम रसूल इलियास ने एक प्रेस बयान में भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले की कड़ी आलोचना करते हुए कहा कि यह फैसला ऐतिहासिक साक्ष्यों, ऐतिहासिक राजस्व अभिलेखों, औपनिवेशिक काल के दस्तावेजी रिकॉर्डों और सदियों पुराने मुस्लिम उपासना संबंध के विरुद्ध है। इसके अलावा यह फैसला पूजा स्थलों से संबंधित अधिनियम (प्लेसेस ऑफ वर्शिप एक्ट 1991) की भावना के भी सीधे विपरीत है।

मजमा उलमा व खुतबा हैदराबाद दक्कन की ओर से भी मध्य प्रदेश के धार शहर में स्थित प्राचीन मस्जिद कमाल मौला पर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के फैसले को ऐतिहासिक साक्ष्यों के विरुद्ध होने के कारण अग्राह्य (नामंज़ूर) बताया गया है।

हुज्जतुल-इस्लाम वल-मुस्लेमीन मौलाना अली हैदर फरिश्ता, सर्वोच्च संरक्षक मजमा उलमा व खुतबा हैदराबाद दक्कन ने एक बयान में कहा है कि किसी भी धर्म के धार्मिक स्थलों और उपासना गृहों पर बलपूर्वक कब्जा करना मानवीय शराफत के खिलाफ और खुला अत्याचार व अन्याय है। सूत्रों से पता चला है कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और मस्जिद कमाल मौला मध्य प्रदेश की प्रबंधन समिति अब सुप्रीम कोर्ट में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के विवादास्पद फैसले के खिलाफ चुनौती देने की तैयारी में है। वैसे भी, अत्याचार के खिलाफ पूरी कोशिश से विरोध करना हर मुसलमान का संवैधानिक अधिकार है।

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