हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने नमाज़ियों को तक़वा अपनाने की नसीहत करते हुए कहा कि हम अल्लाह तआला का जितना भी शुक्र अदा करें, वह कम है कि उसने हमें अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) और मासूम इमामों (अ) की विलायत और इमामत जैसी महान नेमत से नवाज़ा है।
ईद-ए-ग़दीर की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि ग़दीर एक आसमानी फैसला था, जबकि सक़ीफ़ा एक ज़मीनी योजना थी। ग़दीर पैग़म्बर (स) की स्पष्ट घोषणा थी, जबकि सक़ीफ़ा मानवीय परामर्श का परिणाम था। ग़दीर में रसूलुल्लाह (स) स्वयं संबोधित कर रहे थे, जबकि सक़ीफ़ा में विभिन्न क़बीलों के बीच चर्चा चल रही थी। ग़दीर दिव्य संदेश का मैदान था, जबकि सक़ीफ़ा राजनीतिक हितों का मंच था।
उन्होंने आगे कहा कि ग़दीर में "जिसका मैं मौला हूँ, उसके अली भी मौला हैं" की घोषणा गूँज रही थी, जबकि सक़ीफ़ा में "हम में से एक अमीर और तुम में से एक अमीर" का नारा लगाया गया। ग़दीर उम्मत की एकता का मानक था, जबकि सक़ीफ़ा नेतृत्व निर्धारण के विवाद का केंद्र बन गया। ग़दीर विलायत का घोषणापत्र था, जबकि सक़ीफ़ा ख़िलाफ़त का समझौता था। ग़दीर ईलाही प्रसन्नता का प्रतीक था, जबकि सक़ीफ़ा समय की राजनीतिक आवश्यकता का प्रतिनिधित्व करता था। ग़दीर धर्म की पूर्णता की घोषणा थी, जबकि सक़ीफ़ा राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करने का एक प्रयास था।
मौलाना ज़ैदी ने कहा कि ग़दीर में विलायत की बैअत थी, जबकि सक़ीफ़ा में शासन की बैअत थी। ग़दीर का केंद्र मार्गदर्शन था और सक़ीफ़ा का केंद्र राजनीति। ग़दीर ने इमाम को निर्धारित किया, जबकि सक़ीफ़ा ने शासक का चयन किया। ग़दीर पैग़म्बरी मिशन की निरंतरता की घोषणा थी, जबकि सक़ीफ़ा ख़िलाफ़त की शुरुआत का दावा। ग़दीर का स्रोत ईश्वरीय वह्य था, जबकि सक़ीफ़ा को सहाबा के इज्तेहाद का परिणाम बताया गया। ग़दीर एक दिव्य वचन था और सक़ीफ़ा मानवीय समझौता। ग़दीर का आधार श्रेष्ठता और योग्यता थी, जबकि सक़ीफ़ा का आधार राजनीतिक हित। ग़दीर ने उम्मत को इमाम दिया, जबकि सक़ीफ़ा ने उम्मत को ख़लीफ़ा दिया। ग़दीर का प्रश्न था, "अल्लाह किसे चाहता है?" जबकि सक़ीफ़ा का प्रश्न था, "लोग किसे चाहते हैं?"
मौलाना सय्यद रज़ा हैदर ज़ैदी ने कहा कि वर्तमान युग में ग़दीर ने हमें आयतुल्लाह सैयद अली ख़ामेनेई जैसा नेता और हिज़्बुल्लाह जैसे मुजाहिद दिए हैं, जबकि सक़ीफ़ा की सोच ने ऐसे शासकों को जन्म दिया जो कभी इज़राइल और कभी अमेरिका के सामने झुकते दिखाई देते हैं।
उन्होंने कहा कि ग़दीर ने हमें अत्याचार के सामने डटकर खड़े रहने का साहस दिया, जबकि सक़ीफ़ा ने अत्याचार को वैधता प्रदान की।
इस आपत्ति का उत्तर देते हुए कि "यदि ग़दीर के संबंध में पैग़म्बर की स्पष्ट घोषणा मौजूद थी, तो सहाबा ने सक़ीफ़ा में ख़लीफ़ा का चुनाव क्यों किया?", मौलाना ज़ैदी ने कहा कि स्वयं रसूलुल्लाह (स) के जीवनकाल में भी कई बार उनके आदेशों की अवहेलना की गई थी। उहुद के मैदान में आदेश का उल्लंघन हुआ, सुलह-ए-हुदैबिया के समय आपत्तियाँ उठाई गईं, लश्कर-ए-उसामा में शामिल होने के आदेश का पालन नहीं किया गया और वाक़िआ-ए-क़िरतास में भी पैग़म्बर के आदेश का विरोध किया गया। इसलिए यदि उनके जीवनकाल में अवज्ञा संभव थी, तो उनके विसाल (देहावसान) के बाद भी ऐसा होना असंभव नहीं था।
मौलाना ज़ैदी ने कहा कि ग़दीर एक विचारधारा, एक शिक्षण परंपरा और एक संपूर्ण व्यवस्था है, और ग़दीर को वही व्यक्ति सही अर्थों में समझ सकता है जो आशूरा के संदेश को समझता हो।
उन्होंने कहा कि ग़दीर और आशूरा न्याय तथा विलायत के दो महत्वपूर्ण चरण हैं। ये दोनों एक ही ईश्वरीय मिशन के दो पहलू हैं; ग़दीर ने नेतृत्व और विलायत की घोषणा की, जबकि आशूरा ने उस विलायत की रक्षा के लिए महान बलिदान प्रस्तुत किया। उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आशूरा को केवल शोक और मातम तक सीमित रखने के बजाय अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष और सामूहिक उत्तरदायित्व के रूप में समझना आवश्यक है।
वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों पर टिप्पणी करते हुए मौलाना ज़ैदी ने कहा कि दुनिया में संसाधनों की कमी नहीं है, बल्कि न्याय और निष्पक्षता की कमी है। कुछ शक्तियाँ विश्व के संसाधनों और निर्णयों पर नियंत्रण बनाए हुए हैं, जबकि कमज़ोर राष्ट्र अत्याचार, वंचना और अन्याय का शिकार हैं।
उन्होंने अमीरुल मोमिनीन इमाम अली (अ) की शासन व्यवस्था को न्याय, समानता, जवाबदेही और पीड़ितों के समर्थन का सर्वोत्तम उदाहरण बताते हुए कहा कि ग़ज़्ज़ा, यमन और अन्य क्षेत्रों में जारी अत्याचार इस बात का संकेत हैं कि मानवता ग़दीर के न्याय और विलायत के संदेश से दूर हो चुकी है। उन्होंने बल देकर कहा कि वास्तविक न्याय, मानवीय गरिमा और विश्व शांति की स्थापना के लिए ग़दीर के सिद्धांतों की ओर लौटना अनिवार्य है।
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