रविवार 24 मई 2026 - 12:07
बहरैन में शिया विरोधी कदमों में तेज़ी;अहम शिया सांस्कृतिक संस्थान बंद

हौज़ा / बहरैन में शिया विरोधी कदमों के सिलसिले में सरकार ने वर्ष 2026 के आदेश संख्या 19 के तहत "जमीयतुल तौआयतिल इस्लामियाह" को समाप्त करने की घोषणा कर दी है जो देश में शियाओं का सबसे प्रमुख सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थान माना जाता है।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी के अनुसार , बहरैन में शिया-विरोधी कदमों के सिलसिले में सरकार ने वर्ष 2026 के आदेश संख्या 19 के तहत "जमीयत अत-तौआयतिल इस्लामियाह" (इस्लामिक जागरूकता सोसायटी) को समाप्त करने की घोषणा कर दी है, जो देश में शियाओं का सबसे प्रमुख सांस्कृतिक और सामाजिक संस्थान माना जाता है।

यह संस्थान व्यावहारिक रूप से किसी भी राजनीतिक या दलीय गतिविधि से दूर रहा है और अपनी स्थापना के आरंभ से ही धार्मिक, सामाजिक और शैक्षिक सेवाएं प्रदान करता रहा है, हालाँकि बहरैनी सरकार के हालिया फैसले को शिया समुदाय के खिलाफ जारी दबाव और प्रतिबंधों की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है।

यह संस्थान वर्ष 1972 में आयतुल्लाह शेख ईसा क़ासिम के नेतृत्व में बहरैन के प्रतिष्ठित उलेमाओं के हाथों स्थापित किया गया था और बाद में यह बहरीन और खाड़ी क्षेत्र के सबसे महत्वपूर्ण शिया सांस्कृतिक केंद्रों में गिना जाने लगा।

जमीयत का बंद किया जाना यह पहला मामला नहीं है। बहरैनी अधिकारियों ने पहली बार फरवरी 1984 में इस संस्थान को बंद किया था और यह प्रतिबंध 2001 तक बना रहा। बाद में "राष्ट्रीय घोषणापत्र" पर जनमत संग्रह के बाद राजनीतिक माहौल में अपेक्षाकृत नरमी आने पर इसे फिर से गतिविधि की अनुमति मिली। फिर जून 2016 में शिया धार्मिक हस्तियों और संस्थानों के खिलाफ व्यापक कार्रवाइयों के दौरान एक बार फिर इस संगठन को बंद कर दिया गया।

9 जून 2022 को हालाँकि तहलील का आदेश वापस ले लिया गया और संस्थान ने फिर से गतिविधियाँ शुरू कीं, लेकिन इस दौरान भी उस पर विभिन्न कानूनी और प्रशासनिक प्रतिबंध लागू रहे। संस्थान के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए गए, बोर्ड बंद किया गया और कई गतिविधियाँ स्थगित कर दी गईं। यहाँ तक कि जमीयत के प्रमुख और तीन कार्यकर्ताओं को भी गिरफ्तार किया गया।

ताज़ा आदेश के बाद जमीयत अत-तौआयतिल इस्लामियाह" एक बार फिर बंदी के नए चरण में प्रवेश कर गई है जिसके बाद बहरैन में धार्मिक स्वतंत्रता, शिया अधिकारों और सरकार के "सहिष्णुता" व "शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व" के दावों पर सवाल और अधिक गहरे हो गए हैं।

पर्यवेक्षकों के अनुसार, पिछले 54 वर्षों के दौरान इस संस्थान की गतिविधियाँ पूरी तरह से सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक प्रकृति की रही हैं, इसके बावजूद बार-बार इसका बंद किया जाना इस बात का संकेत है कि बहरैनी सरकार देश की सबसे बड़ी धार्मिक आबादी के प्रभाव और प्रसार को सीमित करने की नीति पर चल रही है, जिससे सामाजिक विश्वास और राष्ट्रीय एकता अधिक प्रभावित हो रही है।

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