रविवार 24 मई 2026 - 20:33
लखनऊ में दो दिवसीय "तफहीम-ए-शरीयत" कार्यशाला, मस्जिदों और सामाजिक संस्थाओं को जनता के मार्गदर्शन का प्रभावी माध्यम बनाने पर जोर

लखनऊ में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तत्वावधान में दारुल उलूम नदवतुल उलमा के अल्लामा हैदर हसन खान टोंकी हॉल में आयोजित दो दिवसीय "तफहीम-ए-शरीयत" कार्यशाला संपन्न हो गई। इसमें विद्वानों, चिंतकों, कानूनविदों और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने भाग लिया।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी: लखनऊ में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के तत्वावधान में दारुल उलूम नदवतुल उलमा के अल्लामा हैदर हसन खान टोंकी हॉल में आयोजित दो दिवसीय "तफहीम-ए-शरीयत" कार्यशाला संपन्न हुई। इसमें विद्वानों, चिंतकों, कानूनविदों और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लोगों ने भाग लिया।

कार्यशाला में इस बात पर जोर दिया गया कि वर्तमान दौर में इस्लाम और मुसलमानों की पारिवारिक एवं सामाजिक व्यवस्था के संबंध में फैलाई जा रही गलतफहमियों को समझदारी, सकारात्मक संवाद और व्यावहारिक उदाहरण पेश करके दूर करने की आवश्यकता है।

लखनऊ में दो दिवसीय "तफहीम-ए-शरीयत" कार्यशाला, मस्जिदों और सामाजिक संस्थाओं को जनता के मार्गदर्शन का प्रभावी माध्यम बनाने पर जोर

कार्यशाला को संबोधित करते हुए बोर्ड के अध्यक्ष मौलवी खालिद सैफुल्लाह रहमानी ने कहा कि आज मीडिया और सोशल मीडिया के जरिए युवा पीढ़ी के मन में संदेह और भ्रम पैदा किए जा रहे हैं, इसलिए जरूरी है कि धर्म की सही शिक्षाओं को सरल और प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जाए। उन्होंने कहा कि किसी भी समाज के सुधार के लिए पारिवारिक स्थिरता, आपसी सम्मान, न्याय और नैतिक मूल्यों को बढ़ावा देना अनिवार्य है।

कार्यशाला में वक्ताओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि धार्मिक शिक्षाओं को केवल किताबों तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक जीवन में लागू करना समय की महत्वपूर्ण आवश्यकता है। कार्यशाला के संयोजक मौलवी सैयद बिलाल अब्दुल हयी हसनी नदवी ने कहा कि मस्जिदें, शैक्षणिक संस्थान और सामाजिक समागम जनता के मार्गदर्शन और सकारात्मक बौद्धिक जागरूकता के प्रभावी केंद्र बन सकते हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि जुमे के खुतबों और सार्वजनिक सभाओं के माध्यम से मानवता, न्याय, पारिवारिक स्थिरता, महिलाओं के सम्मान और सामाजिक सद्भाव जैसे विषयों को आम किया जाए।

विभिन्न सत्रों में कानूनविदों ने संवैधानिक अधिकारों, धार्मिक स्वतंत्रता, पारिवारिक कानूनों और सामाजिक न्याय से संबंधित मामलों पर विचार व्यक्त किए। वक्ताओं ने कहा कि समाज में बढ़ती मानसिक बेचैनी, पारिवारिक टूट-फूट और नैतिक संकट का समाधान मजबूत पारिवारिक प्रणाली, आपसी जिम्मेदारी और नैतिक प्रशिक्षण में छिपा है। इस अवसर पर युवाओं और महिलाओं के बीच जागरूकता पैदा करने और आधुनिक संचार माध्यमों के सकारात्मक उपयोग की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।

लखनऊ में दो दिवसीय "तफहीम-ए-शरीयत" कार्यशाला, मस्जिदों और सामाजिक संस्थाओं को जनता के मार्गदर्शन का प्रभावी माध्यम बनाने पर जोर

कार्यशाला के दौरान प्रश्नोत्तर के कई सत्र भी हुए, जिनमें प्रतिभागियों ने सामाजिक, पारिवारिक और कानूनी मुद्दों से संबंधित प्रश्न पूछे। वक्ताओं ने इस बात पर सहमति जताई कि समाज में सद्भाव, न्याय, सहनशीलता और मानवता के प्रति प्रेम को बढ़ावा देने के लिए निरंतर शैक्षिक और बौद्धिक संवाद आवश्यक है।

समापन सत्र को संबोधित करते हुए मौलवी फजलुर रहीम मुजद्दिदी ने कहा कि जनता तक सही और प्रामाणिक जानकारी पहुंचाने के लिए व्यवस्थित और निरंतर प्रयासों की आवश्यकता है। अंत में मौलवी हकीम अम्मार अब्दुल अली हसनी नदवी ने आधुनिक संचार माध्यमों के प्रभावी उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि वर्तमान दौर में बौद्धिक मार्गदर्शन और सामाजिक सुधार एक साझा सामूहिक जिम्मेदारी बन चुकी है। कार्यशाला का समापन दुआ (प्रार्थना) के साथ हुआ।

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