हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने अपने संबोधन में ईद-ए-ग़दीर की महानता, इमाम अली की विलायत तथा मानवता के मार्गदर्शन में ग़दीर की मूलभूत भूमिका पर विस्तार से प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि तक़वा मनुष्य की पहली जिम्मेदारी है, और ईद-ए-ग़दीर का वास्तविक संदेश भी यही है कि इंसान अपनी जिंदगी में हलाल और हराम का ध्यान रखते हुए इमामुल मुत्तक़ीन हज़रत अली (अ) के मार्ग पर चले।
मौलाना रिज़वी ने कहा कि ग़दीर केवल एक ऐतिहासिक घटना या हज़रत अली (अ.स.) के प्रति प्रेम की घोषणा का नाम नहीं है, बल्कि यह वह दिन है जब मानवता की सबसे बड़ी आवश्यकता—इलाही मार्गदर्शन की पूर्णता—साकार हुई।
उन्होंने कहा कि अल्लाह ने मानवता के मार्गदर्शन के लिए एक लाख चौबीस हजार पैगम्बरों को भेजा और ग़दीर के दिन विलायत और इमामत की घोषणा के माध्यम से धर्म को पूर्ण तथा अपनी नेमत को सम्पूर्ण कर दिया।
उनके अनुसार, यदि किसी व्यक्ति को संसार की सारी भौतिक सुविधाएँ और नेमतें मिल जाएँ, लेकिन उसे सही मार्गदर्शन प्राप्त न हो, तो वह वास्तविक सफलता हासिल नहीं कर सकता। जबकि ग़दीर मनुष्य को वह दिव्य मार्गदर्शन प्रदान करती है जो उसे दुनिया और आख़िरत दोनों की सफलता और सौभाग्य तक पहुँचाती है।
मौलाना सय्यद रूह ज़फ़र रिज़वी ने कहा कि ग़दीर वास्तव में क़ुरआन मजीद के वास्तविक व्याख्याकार, शिक्षक और प्रवक्ता के परिचय का दिन है। इसी दिन पैगम्बर मुहम्मद ने हज़रत अली (अ) को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त करके उम्मत को ऐसा नेता प्रदान किया, जो क़ुरआन की सही शिक्षाओं को क़यामत तक सुरक्षित रखने वाला है।
उन्होंने ग़दीर को इंसान ए कामिल की निरंतरता और ईश्वरीय कृपा के पूर्ण प्रकट होने का दिन बताते हुए कहा कि अल्लाह ने अपने बंदों को असहाय नहीं छोड़ा, बल्कि विलायत और इमामत की एक स्थायी व्यवस्था स्थापित की।
मौलाना रिज़वी ने कहा कि सच्चा ग़दीरी वही है जो केवल अपने अधिकारों का ध्यान न रखे, बल्कि दूसरों के अधिकारों की रक्षा भी करे। आज जब दुनिया अत्याचार और अन्याय से जूझ रही है, तब अलवी शिक्षाएँ और ग़दीरी चिंतन ही मानवता को वास्तविक न्याय और समानता प्रदान कर सकते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि विलायत सभी इबादतो की स्वीकृति का आधार है।अहलुल बैत (अ) के इमामों की शिक्षाओं के अनुसार नमाज़, रोज़ा, हज और अन्य धार्मिक कर्मों की स्वीकार्यता विलायत से जुड़ी हुई है।
मौलाना सय्यद रूह ज़फ़र रिज़वी ने उपस्थित लोगों को ग़दीर के संदेश पर चिंतन करने, इस्लामी इतिहास का अध्ययन करने और घोषणा-ए-ग़दीर की वास्तविकता को समझने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि ईद-ए-ग़दीर के श्रेष्ठ कार्यों में अल्लाह के बंदों को प्रसन्न करना, जरूरतमंदों की सहायता करना तथा समाज में प्रेम, भाईचारा और सहानुभूति को बढ़ावा देना शामिल है।
इस अवसर पर उन्होंने इमाम जाफ़र सादिक़ की एक रिवायत का उल्लेख करते हुए कहा कि ईद-ए-ग़दीर के दिन एक दिरहम सदक़ा देना सामान्य दिनो मे दो हज़ार दिरहम खर्च करने के बारबर सवाब रखता है।
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