हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, क़ुम अल मुक़द्दस में हज़रत फ़ातिमा मासूमा सलामुल्लाह अलैहा के पवित्र रौज़े में शहीद रहबर की याद में आयोजित कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मजलिस-ए-ख़ुबरेगान-ए-रहबरी के सदस्य और शूरा-ए-निगहबान के फ़क़ीह आयतुल्लाह सय्यद अहमद ख़ातमी ने कहा कि ईरान और इराक में शहीद नेता के अंतिम संस्कार और दफ़न के अवसर पर जनता की असाधारण भागीदारी उनकी अभूतपूर्व लोकप्रियता का स्पष्ट प्रमाण है।
उन्होंने कहा कि दुनिया के विभिन्न मीडिया संस्थानों ने इस सभा को इतिहास के बड़े जनसमूहों में शामिल किया और इसे इस्लामी क्रांति तथा उसके विचारों के प्रति जनता के समर्थन का प्रतीक बताया। उनके अनुसार, लाखों लोगों की भागीदारी ने यह सिद्ध कर दिया कि जनता अपने नेता और क्रांति के साथ मजबूती से खड़ी है।
आयतुल्लाह ख़ातमी ने कहा कि शहीद रहबर की लोकप्रियता का रहस्य उनका मजबूत ईमान, निष्ठा, अच्छा चरित्र और जनता के साथ उनका घनिष्ठ संबंध था। उन्होंने कुरआन की एक आयत का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह ईमान और नेक कार्य करने वालों के लिए लोगों के दिलों में प्रेम पैदा कर देता है, और शहीद नेता इस ईश्वरीय वचन का व्यावहारिक उदाहरण थे।
उन्होंने आगे कहा कि शहीद इमाम ने अपना पूरा जीवन इस्लामी व्यवस्था, देश की प्रगति, राष्ट्रीय स्थिरता और जनता की सेवा के लिए समर्पित कर दिया। वे हमेशा जनता के बीच रहते थे, शहीदों के परिवारों से मुलाकात करते थे और देश के विभिन्न क्षेत्रों की समस्याओं से सीधे परिचित होते थे, जिसके कारण जनता के साथ उनका गहरा संबंध स्थापित हुआ।
आयतुल्लाह ख़ातमी ने कहा कि अंतिम संस्कार के दौरान जनता द्वारा उठाए गए लाल झंडे और लगाए गए नारे इस बात का संकेत थे कि शहीद नेता के खून को भुलाया नहीं जाएगा। उन्होंने कहा कि शहीद इमाम के खून का बदला लेने की मांग केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि कुरआन की शिक्षाओं से प्रमाणित है, क्योंकि कुरआन अत्याचार करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई और पीड़ितों के समर्थन की बात करता है।
उन्होंने अहल-ए-बैत अलैहिमुस्सलाम की शिक्षाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि सत्य और न्याय के लिए खून का बदला लेने की मांग इस्लामी इतिहास का हिस्सा रही है। जिस प्रकार "या लिसारातिल हुसैन" (हे हुसैन के खून का बदला लेने वालों) का नारा आज भी जीवित है, उसी प्रकार शहीद नेता के खून का बदला लेने की मांग भी जारी रहेगी।
अपने भाषण के अंत में आयतुल्लाह ख़ातमी ने कहा कि अंतिम संस्कार में जनता की भारी भागीदारी ने यह संदेश दिया कि ईरानी राष्ट्र इस्लामी क्रांति, विलायत-ए-फ़क़ीह और अपने राष्ट्रीय सिद्धांतों से जुड़ा हुआ है। उन्होंने कहा कि पिछले कई दशकों के अनुभवों ने साबित कर दिया है कि देश की सफलता और स्थिरता का रहस्य नेतृत्व का अनुसरण और राष्ट्रीय एकता में निहित है, और ईरानी जनता भविष्य में भी इसी संकल्प के साथ अपने विचारों और मूल्यों की रक्षा करती रहेगी।
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