लेखक: मौलाना सय्यद करामत हुसैन शऊर जाफ़री
हौज़ा न्यूज़ एजेंसी। युद्धों का फैसला हमेशा युद्धभूमि में नहीं होता। कई बार असली संघर्ष इस बात का होता है कि कौन अपनी अर्थव्यवस्था, बुनियादी ढाँचे, ऊर्जा, संचार व्यवस्था और राष्ट्रीय मनोबल को अधिक समय तक सुरक्षित रख सकता है। इसी कारण आज ईरान के बारे में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उसके पास कितनी मिसाइलें हैं, बल्कि यह है कि यदि उसके बिजलीघर, तेल प्रतिष्ठान, परिवहन तंत्र और संचार सुविधाएँ बड़े पैमाने पर हमलों का निशाना बन जाएँ, तो क्या वह अपने प्रतिरोध को जारी रख सकेगा?
कल्पना कीजिए कि किसी समय ईरान के बिजलीघर, रिफाइनरियाँ, पुल, राजमार्ग, रेलवे लाइनें और संचार केंद्र लगातार हमलों की चपेट में आ जाएँ। ऐसी स्थिति निश्चित रूप से किसी भी देश के लिए अत्यंत कठिन होगी, क्योंकि आधुनिक देशों की शक्ति केवल उनकी सेना पर नहीं, बल्कि उनके मजबूत बुनियादी ढाँचे पर भी निर्भर करती है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल इस दबाव के कारण ईरान हथियार डाल देगा या अपनी नीतियों से पीछे हट जाएगा?
ईरान की रणनीति का अध्ययन करने वाले अनेक विश्लेषकों का मानना है कि तेहरान कई वर्षों से लंबी और थका देने वाली लड़ाई की संभावना को ध्यान में रखकर अपनी रक्षा और आर्थिक योजनाएँ तैयार करता रहा है।
इसी संदर्भ में कुछ हलकों में यह दावा भी किया जाता है कि हाल के वर्षों में चीन के सहयोग से ईरान ने कई संवेदनशील संस्थानों, अस्पतालों, शैक्षणिक केंद्रों, औद्योगिक इकाइयों और अन्य महत्वपूर्ण प्रतिष्ठानों को वैकल्पिक ऊर्जा व्यवस्था, विशेषकर सौर ऊर्जा, से जोड़ने का प्रयास किया है, ताकि केंद्रीय बिजली व्यवस्था पर उसकी निर्भरता कम हो सके।
हालाँकि इन दावों की स्वतंत्र स्रोतों से पूरी तरह पुष्टि उपलब्ध नहीं है, इसलिए इन्हें अंतिम सत्य के रूप में प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि युद्ध की परिस्थितियों में वैकल्पिक ऊर्जा और बिखरे हुए बुनियादी ढाँचे का महत्व पूरी दुनिया में स्वीकार किया गया है।
दूसरी ओर, होरमुज़ जलडमरूमध्य केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा है। दुनिया के तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है, इसलिए इसका सामरिक और भौगोलिक महत्व अत्यंत अधिक है। यदि कभी ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है कि ईरान अपने राष्ट्रीय अस्तित्व और राज्य की सुरक्षा को सीधे खतरे में महसूस करे, तो अनेक सैन्य और रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार वह होरमुज़ जलडमरूमध्य तथा क्षेत्र की ऊर्जा व्यवस्था को अपने रक्षा दबाव के एक प्रभावी साधन के रूप में इस्तेमाल करने की क्षमता रखता है। ऐसी स्थिति में युद्ध किसी एक देश या क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि उसके प्रभाव पूरी दुनिया में महसूस किए जाएँगे।
तेल और गैस की आपूर्ति प्रभावित होगी, समुद्री व्यापार में गंभीर बाधाएँ आएँगी, ऊर्जा की कीमतें असाधारण रूप से बढ़ सकती हैं, महँगाई नई ऊँचाइयों पर पहुँच सकती है और वैश्विक अर्थव्यवस्था एक गहरे संकट की ओर बढ़ सकती है।
यदि संघर्ष और अधिक फैलता है, तो खाड़ी के अन्य देश भी इसके प्रभाव से सुरक्षित नहीं रह पाएँगे। क्षेत्र के तेल और गैस भंडार, रिफाइनरियाँ, निर्यात टर्मिनल, तटीय औद्योगिक केंद्र, समुद्री जल को मीठा बनाने वाले बड़े संयंत्र, बिजलीघर और अन्य महत्वपूर्ण आर्थिक प्रतिष्ठान भी संभावित लक्ष्य बन सकते हैं।
ऐसी स्थिति में केवल तेल का बाज़ार ही प्रभावित नहीं होगा, बल्कि खाड़ी देशों की पानी, बिजली और अन्य मूलभूत नागरिक आवश्यकताएँ भी गंभीर रूप से प्रभावित हो सकती हैं।
चूँकि इन देशों की बड़ी आबादी समुद्री जल को मीठा बनाने वाले संयंत्रों पर निर्भर करती है, इसलिए यदि इन प्रतिष्ठानों को नुकसान पहुँचता है तो करोड़ों लोगों के सामने पेयजल का गंभीर संकट उत्पन्न हो सकता है।
इस प्रकार युद्ध की आग केवल सैन्य मोर्चों तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उसके दुष्प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा, व्यापार और मानव जीवन के लगभग हर क्षेत्र को प्रभावित करेंगे।
यह भी एक वास्तविकता है कि खाड़ी के देशों की इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका है। यदि उनकी भूमि या वहाँ स्थित विदेशी सैन्य ठिकाने किसी बड़े संघर्ष का हिस्सा बनते हैं, तो पूरा क्षेत्र और अधिक जटिल परिस्थितियों का सामना कर सकता है। इसलिए अनेक विश्लेषकों का मानना है कि क्षेत्रीय देशों के लिए समझदारी इसी में है कि वे तनाव कम करने और कूटनीतिक समाधान तलाशने के हर संभव प्रयास करें, क्योंकि व्यापक युद्ध की कीमत अंततः पूरी दुनिया को चुकानी पड़ सकती है।
यदि ऊर्जा प्रतिष्ठान, तेल की आपूर्ति और खाड़ी के समुद्री मार्ग गंभीर रूप से प्रभावित होते हैं, तो वैश्विक अर्थव्यवस्था केवल अस्थायी मंदी तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि ऊर्जा संकट, आपूर्ति में बाधा, महँगाई और वित्तीय अनिश्चितता की ऐसी लहर पैदा हो सकती है, जिसके प्रभाव दुनिया के लगभग हर देश तक पहुँचेंगे।
हालाँकि एक बुनियादी तथ्य हमेशा ध्यान में रखना चाहिए कि यह पूरा परिदृश्य केवल संभावनाओं पर आधारित है, न कि पहले से तय घटनाओं पर। युद्ध में निर्णय केवल सैन्य शक्ति से नहीं होते, बल्कि राजनीतिक नेतृत्व, कूटनीति, अंतरराष्ट्रीय दबाव, आंतरिक स्थिरता और अप्रत्याशित परिस्थितियाँ भी उन्हें प्रभावित करती हैं। इसलिए यह कहना कि निश्चित रूप से ऐसा ही होगा या वैसा ही होगा, उचित विश्लेषण नहीं माना जा सकता।
फिलहाल इतना अवश्य कहा जा सकता है कि यदि कभी यह संघर्ष अपने सबसे खतरनाक चरण में प्रवेश करता है, तो उसके परिणाम केवल ईरान या अमेरिका तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरी दुनिया उसके राजनीतिक, आर्थिक और मानवीय प्रभावों को महसूस करेगी। इसलिए शक्ति प्रदर्शन से कहीं अधिक आवश्यकता बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता और कूटनीतिक समझ की है, क्योंकि किसी बड़े युद्ध में अंततः कोई भी वास्तविक विजेता नहीं होता।
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